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कारगिल की जंग के समय अटल बिहारी वाजपेयी ने अमेरिका से कहा विश्‍व के नक्शे से गायब हो जायेगा पाकिस्‍तान!

वॉशिंगटन। प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा था और इन चुनौतियों में से ही एक था कारगिल का युद्ध। वाजेपयी 19 फरवरी 1999 को शांति की पहल करते हुए बस लेकर लाहौर पहुंचे और इसी वर्ष मई में भारत को कारगिल की जंग तोहफे में मिली। पाक के साथ शांति की कोशिशों के बदले वाजपेयी को एक के बाद संकटों का सामना करना पड़ा। कारगिल का युद्ध फिर, कंधार हाइजैक और फिर संसद पर हमला। लेकिन इतनी चुनौतियां भी उनके मनोबल को छू नहीं सकी। हर बार उन्‍होंने असाधारण नेतृत्‍वकर्ता का परिचय दिया और संकट से देश को बाहर निकाला। हर तरह के दबाव में भी वाजपेयी दृढ़ रहे और उनकी इसी दृढ़ता का एक किस्‍सा कारगिल युद्ध से भी जुड़ा हुआ है।

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परमाणु हमले की तैयारी में था पाक

कारगिल की जंग के समय अमेरिकी राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन के करीबी और सीआईए अधिकारी रहे ब्रूस रीडिल को आज तक याद है कि वाजपेयी को उनका रुख बदलने के लिए राजी करना व्‍हाइट हाउस के लिए काफी मुश्किल हो गया था। वाजपेयी अड़े थे कि पाकिस्‍तान को अपनी सेनाओं को वापस बुलाना पड़ेगा और वाजपेयी के इन्‍हीं इरादों ने नवाज को भी झुकने पर मजबूर कर दिया था।

रीडिल के मानें तो पाकिस्‍तान ने इस युद्ध के दौरान परमाणु हमले की भी तैयारी कर ली थी। रीडिल ने यह बात क्लिंटन के राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे सैंडी बर्जर की मृत्‍यु के दौरान लिखी गई श्रद्धांजलि के दौरान सार्वजनिक की थी। सीआईए की ओर से क्लिंटन को इस प्‍लान के बारे में बता दिया था। चार जुलाई 1999 को क्लिंटन की मुलाकात पाक के पूर्व पीएम नवाज शरीफ से होने वाली थी। इसी मुलाकात के दौरान क्लिंटन ने जब वाजपेयी को कॉल किया और उन्‍हें इससे जुड़ी जानकारी दी जो वाजपेयी ने कुछ इस तरह से जवाब दिया, 'मैं इस बात को लेकर आश्‍वस्‍त हूं कि भारत का 50 प्रतिशत हिस्‍सा खत्‍म हो जाएगा लेकिन यह भी जान लीजिए कि अगर परमाणु हमला हुआ तो फिर कल सुबह तक पाकिस्‍तान का नामों-निशां दुनिया के नक्‍शे से मिट जाएगा।'

क्लिंटन का न्‍यौता भी ठुकराया

ब्रूस रीडिल, क्लिंटन के विशेष सहायक थे और उन्‍होंने कारगिल की जंग से जुड़ा यह किस्‍सा एक इंटरव्‍यू के दौरान बताया था। क्लिंटन ने युद्ध के समय वाजपेयी को नवाज के साथ फेस-टू-फेस मुलाकात के लिए इनवाइट किया था लेकिन भारतीय पीएम ने इस बात से साफ इनकार कर दिया था। पीएम वाजपेयी ने सुरक्षा की स्थितियों का हवाला देते हुए क्लिंटन का न्‍यौता ठुकरा दिया था। क्लिंटन ने जुलाई 1999 में शरीफ को बता दिया था कि वाजपेयी सिर्फ पाकिस्‍तानी सेना को सीमा में वापस देखना चाहते हैं और वह इस पर अड़े हैं। इस बात पर नवाज काफी नाराज भी हुए और उन्‍होंने अपनी नाराजगी क्लिंटन के सामने भी जाहिर की थी।

रीडिल के मुताबिक शरीफ काफी कन्‍फ्यूज थे और उन्‍हें देखकर लग रहा था कि उन्‍हें युद्ध का खतरा है। रीडिल के मुताबिक अमेरिका ने भी शरीफ को तुरंत ही इस बात की इत्तिला दे दी थी कि पाकिस्‍तान की सेना को तुरंत एलओसी से पीछे हटना पड़ेगा। पहले तो क्लिंटन ने अपनी करीबी रिक इंडरफर्थ और थॉमस पिकेरिंग के जरिए इस संदेश को निजी तौर पर मई 1999 में संघर्ष के शुरू हरेने पर शरीफ और पाकिस्‍तान में मौजूद भारत के राजदूत तक पहुंचाया था। लेकिन इसके दो दिन बाद तत्‍कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री मै‍डलिन अलब्राइट ने शरीफ को फोन किया और साथ ही पाक सेना के चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ से भी बात की।

अमेरिका ने पाक को दी हिदायत

रीडिल के मुताबिक निजी तौर पर भेजे गए ये संदेश व्‍यर्थ गए और फिर अमेरिका ने सार्वजनिक तौर पर पाकिस्‍तान से कहा कि वह एलओसी का सम्‍मान करे। जून में क्लिंटन ने शरीफ और वाजपेयी दोनों को ही अमेरिका बुलाया था। शरीफ काफी बेचैन थे क्‍योंकि कार‍गिल की जंग में पाकिस्‍तान अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर अलग-थलग पड़ गया था। पाक को इस हालत में अमेरिका का हस्‍तक्षेप चाहिए थे। जून के अंतिम दिनों में शरीफ ने सीधे तौर पर क्लिंटन से हस्‍तक्षेप के लिए कहा। दो जुलाई को शरीफ ने क्लिंटन को फोन किया और हस्‍तक्षेप की अपील की। शरीफ ने क्लिंटन ने कश्‍मीर का मुद्दा सुलझाने के लिए भी मदद मांगी थी।

क्लिंटन की शरीफ को दो टूक

क्लिंटन ने शरीफ को साफ-साफ कह दिया था कि अगर पाकिस्‍तान, एलओसी से अपनी सेनाओं को वापस बुलाता है तो ही वह उनकी कोई मदद करेंगे। क्लिंटन ने वाजपेयी को भी फोन किया था और उन्‍हें पता लग गया था कि वाजपेयी इस रुख पर टस से मस नहीं होंगे। वाजपेयी किसी भी तरह से समझौते के लिए तैयार नहीं थे। क्लिंटन ने वाजपेयी को भरोसे में लिया और साफ कर दिया था कि वह पाकिस्‍तान की बात नहीं सुनेंग और न ही एलओसी का उल्‍लंघन करने पर उन्‍हें किसी तरह का कोई पुरस्‍कार देने वाले हैं। क्लिंटन ने वाजपेयी को बता दिया था कि अमेरिका लाहौर शांति प्रक्रिया को लेकर प्रतिबद्ध है।

तीन जुलाई को शरीफ ने क्लिंटन से कहा कि वह मदद के लिए तुरंत वॉशिंगटन पहुंच रहे हैं। क्लिंटन ने भी उन्‍हें चेतावनी देते हुए कहा था कि वह तभी अमेरिका आएं तब सेनाओं की वापसी का फैसला लेने को तैयार हों। रीडिल के मुताबिक क्लिंटन ने साफ-साफ कहा था, 'मैं आपकी तभी मदद करुंगा जब आपकी सेनाएं एलओसी से पीछे हटेंगी।' शरीफ ने उन्‍हें कहा कि वह चार जुलाई को अमेरिका आएंगे। क्लिंटन ने 4 जुलाई को शरीफ से बातचीत शुरू की और उन्‍हें शिकागो ट्रिब्‍यून का एक कार्टून पकड़या। इस कार्टून में पाकिस्‍तान और भारत को आपस में परमाणु बम से लड़ते हुए दिखाया गया था। क्लिंटन ने शरीफ को याद दिलाया कि अमेरिका ने अरब-इजरायल संघर्ष में तभी मध्‍यस्‍थता की थी जब दोनों पक्षों ने इसकी मांग की थी। लेकिन कश्‍मीर के केस में ऐसा नहीं था।

शरीफ को जारी करना पड़ा बयान

क्लिंटन ने शरीफ को सलाह दी कि लाहौर शांति प्रक्रिया ही इस मुद्दे को हल करने का सर्वश्रेष्‍ठ तरीका है। क्लिंटन ने शरीफ के कहने पर नई दिल्‍ली फोन मिलाया और वाजपेयी से बात की। उन्‍होंने वाजपेयी को बता दिया कि वह भी इस बात पर दृढ़ हैं कि पाकिस्‍तान को एलओसी से अपनी सेनाएं वापस बुलानी पड़ेंगी। इसके बाद वाजपेयी के पास ज्‍यादा कुछ नहीं था कहने को और उन्‍होंने क्लिंटन से कहा, 'फिर आप मुझसे क्‍या चाहते हैं मैं क्‍या कहूं।' रीडिल के मुताबिक एक घंटे के बाद जब राष्‍ट्रपति और शरीफ की बातचीत दोबारा शुरू हुई तो राष्‍ट्रपति ने टेबल पर एक संक्षिप्‍त बयान रख दिया जिसे शरीफ को पढ़ना था और जिसमें एलओसी से सेनाओं की वापसी से जुड़ा एग्रीमेंट था। इस बयान में ही युद्धविराम और लाहौर प्रक्रिया का फिर से बहाल करने की भी बातें थीं। ये भी पढ़ें-वाजपेयी के कार्यकाल में 22 वर्षों बाद कोई अमेरिकी राष्‍ट्रपति आया भारत, बिल क्लिंटन ने पांच दिन भारत में तो पांच घंटे बिताए पाकिस्‍तान

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