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जेवियर माइली ने संभाला अर्जेंटीना के राष्ट्रपति का पद, बोले- देश का खजाना खाली, कठोर फैसले लेना जरूरी

दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना को रविवार को अपना नया राष्ट्रपति मिल गया है। जेवियर माइली ने राष्ट्रपति पद के लिए शपथ ले ली है। अर्जेंटीना के राष्ट्रपति ने अपने पहले भाषण में देश की सबसे खराब आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए कठोर नीतियों को अपनाने की बात कही है और जनता को इसके लिए तैयार रहने को कहा है।

जेवियर माइली अर्थशास्त्री रह चुके हैं। माइली देश की आर्थिक स्थिति को उबारना चाहते हैं और इसके लिए खर्च में कटौती के उपाय अपनाने की घोषणा कर चुके हैं। उनके सामने देश की तीन अंकों के पार हो चुकी मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने की एक बड़ी चुनौती है। माइली को घोर कट्टर दक्षिणपंथी नेता माना जाता है। यही वजह है कि उनको लोग 'अर्जेंटीना का ट्रंप' भी कहते हैं।

Javier Milei sworn

53 वर्षीय नेता ने रविवार को ब्यूनस आयर्स में कांग्रेस के बाहर दिए पहले भाषण में हजारों समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि देश की कमर दशकों की खराब आर्थिक नीतियों से टूट चुकी है, इसलिए आर्थिक संकटों से उबरने के लिए जरूरी है कि कड़वे फैसले लिए जाए, क्योंकि महंगाई 200 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है।

माइली ने हजारों लोगों की भीड़ के सामने कहा कि देश के पास पैसे ही नहीं हैं। माइली ने कहा, "आज, यह अर्जेंटीना के लिए एक नए युग की शुरुआत है। आज हम पतन और पतन के एक लंबे और दुखद इतिहास को समाप्त करते हैं, और हम पुनर्निर्माण की राह पर चलते हैं।"

जेवियर माइली के शपथ ग्रहण समारोह में यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की और ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो सहित कई विश्व नेता शामिल हुए। इजराइल के विदेश मंत्री एली कोहेन ने भी जेवियर माइली के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लिया और उन्हें इजराइल का स्पष्ट समर्थक कहा।

बता दें कि माइली को 19 नवंबर को हुए मतदान में अर्जेंटीना के राष्ट्रपति के रूप में चुना गया था। उन्हें 55.9 प्रतिशत वोट मिले, जबकि उनके विरोधी सर्जियो मस्सा को 44 प्रतिशत वोट मिले थे।

अर्जेंटीना की आर्थिक चुनौतियां

अर्जेंटीना के सामने भारी-भरकम चुनौती है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार 10 अरब डॉलर होने का अनुमान है, जबकि वार्षिक मुद्रास्फीति 143 फीसदी हो चुकी है और लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि देश में कभी भी मंदी आ सकती है। हालत ये है कि देश के पास निवेश करने के लिए पूंजी ही नहीं है।

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