'भारत के लिए हम नहीं बनेंगे खतरा', बांग्लादेशी आतंकी संगठन जमात-ए-इस्लामी का ऐलान, करना चाहिए भरोसा?

Jamaat-e-Islami on India: प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन और बांग्लादेश में प्रमुख इस्लामी संगठन जमात-ए-इस्लामी के महासचिव ने गुलाम परवार दावा किया है, कि उनका संगठन "भारत और भारत के लोगों का मित्र" होगा। उन्होंने कहा है, कि यह संगठन भारत के लिए कोई खतरा नहीं होगा, भारत-बांग्लादेश सीमाएं स्थिर रहेंगी और संगठन की तरफ से कोई आतंकवादी गतिविधि नहीं की जाएगी।

जमात-ए-इस्लामी के नेता का बयान काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसपर पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी ISI के पालतू होने के आरोप हैं और इसने पाकिस्तान के इशारे पर भारत में आतंकवाद फैलाने की कोशिश की है।

Jamaat-e-Islami on India

भारत को लेकर क्या बोले गुलाम परवार?

साल 2001 से 2006 के बीच जमात-ए-इस्लामी पार्टी से सांसद रहे गुलाम परवार को शेख हसीना सरकार ने 20 जुलाई को गिरफ्तार किया था और शेख हसीना के देश से भागने के दो दिन बाद ही उन्हें रिहा कर दिया गया।

उन्होंने भारतीय मीडिया ऑउटलेट इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा है, कि "भारत एक मित्र देश है...भारत के लोग हमारे दुश्मन नहीं हैं। मोदी सरकार की नीति ने गैर-अवामी लीग दलों को भारत विरोधी करार दिया है। उन्हें लगता है, कि सिर्फ अवामी लीग ही उन्हें सुरक्षित रख सकती है और अगर हमारी जैसी इस्लामी पार्टियां आती हैं, तो यह आतंकवादियों के लिए प्रजनन स्थल बन जाएगा। यह एक गलत धारणा है।"

2020 से जमात-ए-इस्लामी के महासचिव परवार ने कहा, "हम भारत के लोगों को आश्वस्त कर सकते हैं, कि हम भारत के लिए कोई खतरा नहीं बनेंगे, सीमाएं स्थिर रहेंगी और हमारी तरफ से कोई आतंकवादी गतिविधि नहीं होगी।"

जमात-ए-इस्लामी को 2013 में डी-रजिस्टर कर दिया गया था और इसलिए, यह चुनाव लड़ने के योग्य नहीं है। हालांकि, जमात के लिए 'मन परिवर्तन' कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल है, क्योंकि घरेलू राजनीति में संगठन का रिकॉर्ड इसकी कट्टरपंथी विचारधारा और आतंकी नेटवर्क के संरक्षण से परिभाषित होता है, जिसने भारत के भीतर कई सुरक्षा चुनौतियां पेश की हैं।

बांग्लादेशी अधिकारियों ने कहा है, कि अंतरिम सरकार के लिए चुनौती जमात के साथ जुड़ाव की रूपरेखा तैयार करना है, जो एक प्रतिबंधित संगठन है।

वहीं, जमात प्रमुख और पूर्व उद्योग मंत्री मोतीउर रहमान निजामी को 1 अप्रैल 2004 की रात चटगांव में 10 ट्रक हथियार और गोला-बारूद की खेप के लिए दोषी ठहराया गया था और बाद में मौत की सजा सुनाई गई थी। उस दौरान पुलिस और तटरक्षक बल ने 10 ट्रकों को रोका था और चटगांव यूरिया फर्टिलाइजर के एक घाट पर भारी मात्रा में अवैध हथियार और गोला-बारूद जब्त किया था। हथियार और गोला-बारूद कथित तौर पर उल्फा आतंकवादी संगठन को भेजे जाने थे, जिसका मकसद भारत में अशांति फैलाना था। उल्फा, भारत के नॉर्थ ईस्ट में उग्रवाद फैलाने के लिए जाना जाता है।

बांग्लादेश के सर्वोच्च न्यायालय ने देश के मुक्ति संग्राम के दौरान मानवता के विरुद्ध अपराध करने के लिए उनकी मृत्युदंड को बरकरार रखा था और 11 मई 2016 को निजामी को फांसी दे दी गई।

1986 से जमात के साथ जुड़े 66 साल के परवर अकाउंटिंग में मास्टर्स कर चुके हैं और उन्होंने अपने इंटरव्यू में कहा, कि पुलिस उत्पीड़न के कारण उन्हें फोन बदलने पड़े हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उनके कार्यालय में बहुत ज्यदा सुरक्षा नहीं थी और दफ्तर के बाहर सिर्फ एक गार्ड मौजूद था। जबकि, कुछ लोग उनसे मिलने के लिए इंतजार कर रहे थे।

5 अगस्त को परवार जेल में थे, जब उन्होंने टीवी पर देखा, कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने देश छोड़ दिया है और भारत चली गई हैं।

उन्होंने इंटरव्यू में कहा, कि "मैंने जेल में टीवी पर समाचार देखा, और अवामी लीग के शासन का काला दौर अब समाप्त हो गया है।"

वहीं, 5 अगस्त के बाद हिंदुओं के खिलाफ होने वाली किसी भी हिंसा में जमात के शामिल होने से उन्होंने इनकार कर दिया, जिसमें कम से कम 5 लोगों की हत्या कर दी गई। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, हिंदुओं को निशाना बनाकर 200 से ज्यादा हमले किए गये हैं, लेकिन जमात ने एक भी घटना में शामिल होने से इनकार कर दिया।

उन्होंने कहा, कि "हमलों के पीछे आपराधिक तत्व हैं, जिन्होंने स्थिति का फायदा उठाया है, कुछ पिछली दुश्मनी के कारण, कुछ स्थानीय विवादों के कारण, और उनके साथ कानून के अनुसार निपटा जाना चाहिए। अधिकारियों को जांच करनी चाहिए और न्याय करना चाहिए... इस्लामी दर्शन के मुताबिर, हम अपने भाइयों के खिलाफ हिंसा में विश्वास नहीं करते हैं।"

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