अनोखा जुगाड़: 3 महीने तक अंधेरे में डूबा रहता था ये गांव, लोगों ने बना लिया खुद का सूरज, देखें Video
रोम, 28 अगस्त। पृथ्वी पर जीवन के लिए सूर्य की रोशनी बेहद जरूरी है, यह सिर्फ हम इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि जानवरों, पेड़-पौधों के भी अस्तित्व की वजह है। हर 24 घंटे के अंतराल में सूरज की रोशनी से पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों को रोशन करता है, लेकिन कई ऐसे क्षेत्र भी है जहां महीने तक सूर्य की किरण देखने के लिए लोग तरस जाते हैं। हमारी धरती अजीबोगरीब संभावनाओं से भरी हुई है, यहां ऐसी प्राकृतिक घटनाएं होती हैं जिस समझ पाना कभी-कभी वैज्ञानिकों के बस में भी नहीं होता।

सूर्य की रोशनी भी है जरूरी
नॉर्थ पोल और साउथ पोल के बारे में तो आप सभी ने पढ़ा ही होगा, यहा मौजूद देशों में महीनों तक या तो सूरज अस्त नहीं होगा या फिर उगेगा ही नहीं। हालांकि आज हम आपको इटली के ऐसे गांव के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां तीन महीने तक लोग सूर्य की रोशनी देखने के लिए तरस जाते हैं। हालांकि अब गांव वालों ने इस समस्या का समाधान भी खोज निकाला है, जिसके बारे में जानकर हर कोई हैरान है। दरअसल, गांव ने अपना खुद का सूरज बना लिया है।

गांव वालों ने बना डाला अपना सूरज
चौंकिए मत जनाब, ये कोई असली का सूर्य नहीं बल्कि गांव तक रोशनी पहुंचाने के लिए एक आर्टीफिशियल सूरज लोगों ने मिलकर बनाया है। हम बात कर रहे हैं इटली में स्थित विगल्लेना गांव की जो चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों की वजह से तलहटी में बसे गांव में सूरज की रोशनी नहीं आ पाती। यहां करीब 200 लोग रहते हैं और सूरज के दर्शन किए उन्हें लंबा अरसा बीत जाता है। भौगोलिक स्थिति की वजह से यहां नवंबर से फरवरी तक सूर्य की रोशनी नहीं आती।

नवंबर से फरवरी के बीच अंधेरे में रहता था गांव
नवंबर से फरवरी के बीच दिन के समय भी पूरा गांव अंधेरे में डूबा रहता था, इस वजह से वहां रह रहे लोगों के सेहत पर भी बुरा असर पड़ता था। इस समस्या का समाधान गांव के ही एक आर्किटेक्ट और इंजीनियर ने निकाला और एक आर्टीफिशियल सूरज बना डाला। साल 2006 में इंजीनियर ने गांव के मेयर की मदद से पहाड़ों की चोटी पर 40 वर्ग किलोमीटर का एक शीशा लगवा दिया। शीशे को इस तरह लगाया गया कि उस पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी का पतिबिंब सीधे गांव पर गिरे।

दिन में इतने घंटे रोशन रहता है गांव
पहाड़ की चोटी पर लगाया गया ये शीशा दिन में 6 घंटे के लिए गांव को रोशन करता है। शीशे का वजह करीब 1.1 टन है और इसमें 1 लाख यूरो का खर्च आया। इस कारीगरी में तकनीक की भी मदद ली गई है, पहाड़ पर लगाए गए शीशों को कंप्यूटर द्वारा कंट्रोल किया जाता है। अपना खुद का सूरज बनाने के बाद विगल्लेना गांव दुनियाभर में चर्चा का केंद्र बन गया, अब तो यहां टूरिस्ट भी इस कारीगरी को देखने आते हैं।

कैसे आया आइडिया?
विगल्लेना गांव के मेयर पियरफ्रेंको मडाली ने बताया कि इस आर्टीफिशियल सूरज का आइडिया किसी वैज्ञानिक का नहीं बल्कि एक आम इंसान का है। यह आइडिया तब सामने आया जब सर्दियों के मौसम में लोग धूप ना मिलने की वजह से घरों में ही रहा करने लगे। शहर ठंड और अंधेरे की वजह से बंद हो जाता था। करीब 87 लाख रुपए की लागत से एक आर्टीफिशियल सूरज को तैयार किया गया। अब सर्दियों में भी गांव को सूरज की रोशनी मिलती है।
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