तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन का सऊदी अरब पहुँचना क्या उनकी मजबूरी है

तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान
BANDAR ALGALOUD
तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन गुरुवार को सऊदी अरब पहुँचे. अर्दोआन के इस दौरे को बहुत ही ख़ास और असाधारण माना जा रहा है.

अक्टूबर 2018 में इस्तांबुल स्थित सऊदी वाणिज्य दूतावास में सऊदी अरब के आलोचक पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद अर्दोआन की यह पहली सऊदी यात्रा है.

जानकार मानते हैं कि अर्दोआन के दो दिवसीय दौरे में दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहतर करने के अलावा तुर्की की अर्थव्यवस्था को नज़र में रखते हुए सऊदी से निवेश पर भी बातचीत होगी.

तुर्की के राष्ट्रपति कार्यालय ने जानकारी दी है कि अर्दोआन ने जेद्दा के अल सलाम पैलेस में एक विशेष समारोह में सऊदी शाह सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ से मुलाक़ात की है. इस समारोह में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी मौजूद थे. बाद में अर्दोआन ने क्राउन प्रिंस से मुलाक़ात कर विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की.

https://twitter.com/RTErdogan/status/1519786320905785346

सऊदी अरब की सरकारी समाचार एजेंसी एसपीए ने कहा है, "दोनों नेताओं ने सऊदी अरब और तुर्की के रिश्तों की समीक्षा की और इन्हें बेहतर बनाने के लेकर चर्चा की."

मुलाक़ात को लेकर अर्दोआन ने ट्वीट किया, "हम सभी मौक़ों पर कहते रहे हैं कि खाड़ी क्षेत्र में अपने दोस्तों के स्थिरता और सुरक्षा को हम उतना ही महत्व देते रहे हैं, जितना अपनी स्थिरता और सुरक्षा को देते हैं."

सऊदी अरब के लिए रवाना होने से पहले 28 अप्रैल को अर्दोआन ने अतातुर्क हवाई अड्डे पर मीडिया से कहा कि उनका दौरा दोनों देशों के रिश्तों में 'नए दौर' की शुरुआत साबित होगा.

उन्होंने कहा, "ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवीय रिश्तों वाले दोनों देशों के बीच ये दौरा सहयोग के नए दौर की शुरुआत करेगा. हम राजनीतिक, सैन्य, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में रिश्ते बढ़ाने की कोशिश करेंगे."

उन्होंने सऊदी अरब पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों की भी आलोचना की और कहा कि वो "खाड़ी क्षेत्र में आतंकवाद का विरोध" करते हैं. इन हमलों के लिए सऊदी ने ईरान को ज़िम्मेदार ठहराया था.

तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन
REUTERS/Valentyn Ogirenko
तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन

तुर्की और सऊदी के बीच कैसे बिगड़े रिश्ते

समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार अर्दोआन की यात्रा दोनों देशों के बीच साढ़े तीन साल से जारी तनाव को ख़त्म करने की दिशा में उठाया गया क़दम है.

सऊदी अरब और तुर्की की दुश्मनी ऑटोमन साम्राज्य से ही है जबकि दोनों सुन्नी मुस्लिम बहुल देश हैं. कहा जाता है कि दोनों के बीच मुस्लिम वर्ल्ड के नेतृत्व की होड़ भी है.

बीबीसी के मध्यपूर्व संवाददाता सेबास्टियन अशर कहते हैं कि मुस्लिम ब्रदरहुड और दूसरे इस्लामी समूहों के समर्थन के लिए सऊदी समेत खाड़ी देश के दूसरे मुल्कों से अर्दोआन का तनाव रहा है.

2014 में अर्दोआन ने तुर्की की सत्ता संभाली तो 2015 में किंग सलमान सऊदी अरब की सत्ता की गद्दी पर बैठे. इसके बाद दोनों देशों में स्ट्रेटेजिक कोऑपरेशन काउंसिल बनाया गया.

लेकिन फिर 2017 के खाड़ी संकट के दौरान सऊदी अरब, यूएई और बहरीन ने क़तर के साथ रिश्ते तोड़ लिए और उस पर कई प्रतिबंध लगा दिए.

लेकिन अर्दोआन ने आयात पर निर्भर रहने वाले क़तर को अलग-थलग करने को अमानवीय और इस्लाम की मूल्यों के ख़िलाफ़ करार दिया था. इस घटना के बाद तुर्की और सऊदी अरब के रिश्तों में तनाव बढ़ा.

जमाल ख़ाशोज्जी
Middle East Monitor/Handout via REUTERS
जमाल ख़ाशोज्जी

ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद और बिगड़े रिश्ते

2018 में ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद सऊदी अरब और तुर्की के बीच रिश्तों में तनाव अपने चरम पर पहुँच गया. तुर्की के अधिकारियों ने कहा कि सऊदी एजेंटों ने सऊदी सरकार के 'उच्च पद पर बैठे लोगों' के आदेश पर ये कार्रवाई की थी.

मामले की जाँच आगे बढ़ने से सऊदी अरब नाराज़ हो गया था. दोनों सुन्नी बहुल देशों के बीच रिश्ते बिगड़ने शुरू हो गए थे और सऊदी ने तुर्की की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था.

सऊदी अरब ने अनौपचारिक तौर पर तुर्की से मंगाए जाने वाले अहम चीज़ों पर रोक लगा दी. उसने तुर्की जाने वाले पर्यटकों पर भी रोक लगाई, जिसका बड़ा असर तुर्की की अर्थव्यवस्था पर पड़ा.

इस महीने की शुरुआत में कोर्ट ने ख़ाशोज्जी की हत्या से जुड़े 26 सऊदी संदिग्धों के ग़ायब होने की वजह से मुक़दमे की कार्रवाई रोक दी थी. इसके बाद कोर्ट ने इस केस को सऊदी अरब ट्रांसफर कर दिया था.

इस फ़ैसले पर तुर्की ने कहा था कि इसका राजनीति से कोई नाता नहीं है, लेकिन रॉयटर्स के अनुसार मानवाधिकार समूहों ने तुर्की के इस फ़ैसले की आलोचना की है. हालांकि कई ये भी मान रहे हैं कि कोर्ट के इस अहम फ़ैसले के बाद तुर्की और सऊदी के बीच रिश्ते बेहतर होने की संभावना बनी है.

तुर्की का यू-टर्न

वॉशिंगटन के मिडल-ईस्ट इंस्टीट्यूट के स्कॉलर बिरोल बास्कन ने रॉयटर्स से कहा, "अरब क्रांति की शुरुआत के वक़्त से जिस नीति का पालन तुर्की कर रहा था वो इसे आगे जारी नहीं रख सकता. अपनी आक्रामक विदेश नीति के कारण वो अलग-थलग पड़ रहा था."

हाल के सालों में तुर्की ने क़तर और सोमालिया में अपने सैन्य अड्डे बनाए हैं. सीरिया, लीबिया और नागोर्ना-काराबाख़ को लेकर उसके रुख़ और रूस से रक्षा सिस्टम ख़रीदने की योजना को लेकर पश्चिमी देशों और नेटो के मित्र देशों के साथ उसका तनाव बढ़ा है.

मिडल ईस्ट पॉलिसी काउंसिल में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार 2020 से तुर्की ने खाड़ी देशों को लेकर यू-टर्न ले रहा है और उनके साथ रिश्ते बेहतर करने की कोशिश कर रहा है. इस मुहिम के तहत अर्दोआन मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, इसराइल और सऊदी अरब की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है और मतभेद सुलझाने की कोशिश में है.

अरब न्यूज़ के अनुसार इसी कोशिश के तहत अर्दोआन ने बीते साल मई में सऊदी शाह सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ से फ़ोन पर बात की थी जिसके बाद विदेश मंत्री मेव्लुत चोवाशुग्लू बीते साल मई में दो दिन के दौरे पर सऊदी अरब गए थे.

ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में मध्य पूर्व मामलों के जानकार सैमुएल रमानी ने अख़बार से कहा था, "तुर्की की नीति में बदलाव का कारण अधिक निवेश और व्यापार के मौक़े की उसकी तलाश है. रूस, अमेरिका, यूरोप और चीन जैसी दुनिया की बड़ी ताक़तों के साथ उसके रिश्ते बिगड़ रहे हैं और वो इसमें सुधार चाहता है."

तुर्की की प्राथमिकता है उसके आर्थिक हालात

अगले साल तुर्की में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं. लगातार बढ़ रही महंगाई से जूझ रही देश की अर्थव्यवस्था मुश्किल में है. इस कारण अर्दोआन की लोकप्रियता घटती जा रही है और उनके लिए दोबारा जीत पाना चुनौतीपूर्ण बन गया है.

अर्दोआन की आर्थिक नीति के कारण देश के सामने मुद्रा संकट खड़ा हो गया है. जनवरी 2021 में डॉलर के मुक़ाबले जहां लीरा का मूल्य 7.3 था, वहीं साल ख़त्म होते-होते इसकी क़ीमत गिरकर 16.69 तक पहुंच गई.

तुर्की में सालाना महंगाई दर अब 61.14 फ़ीसदी तक पहुंच गई है, जिसके कारण यहाँ तेल और ज़रूरत के लगभग सभी सामान महंगे हो गए हैं. रूस यूक्रेन युद्ध के बाद यहां हालात और मुश्किल हो गए हैं.

एएफ़पी के अनुसार विश्लेषकों का कहना है कि सऊदी निवेश से तुर्की की अर्थव्यवस्था को फ़ायदा पहुँच सकता है और अर्दोआन की राह थोड़ी आसान हो सकती है.

अर्दोआन की ये कोशिश कामयाब होती भी दिख रही है. दोनों मुल्कों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ने का इशारा तुर्की के विदेश मंत्री नुरूद्दीन नबाती के एक ट्वीट से भी मिलता है.

दो दिन पहले उन्होंने ट्वीट किया कि उन्होंने अपने सऊदी समकक्ष मोहम्मद अल जदान से ऑनलाइन चर्चा की है. उन्होंने लिखा, "दोनों के बीच इस बात को लेकर चर्चा हुई कि दोनों देश अर्थव्यवस्था, निवेश और व्यापार के मामले में कैसे सहयोग बढ़ा सकते हैं."

https://twitter.com/NureddinNebati/status/1519306975850475520

बीते साल की पहली तिमाही के मुक़ाबले 2022 की पहली तिमाही में दोनों देशों के बीच व्यापार में 25 फ़ीसदी तक का इज़ाफा हुआ है.

बीबीसी तुर्की सेवा का कहना है कि टर्किश स्टैस्टिकल इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के अनुसार 2022 के पहले दो महीनों में तुर्की ने सऊदी अरब से 69.3 करोड़ डॉलर का आयात किया, लेकिन वहीं उसका निर्यात दो करोड़ डॉलर के स्तर पर रहा.

लेकिन मार्च में निर्यात बढ़कर 5.8 करोड़ डॉलर तक पहुँच गया. इससे पहली तिमाही के निर्यात का आंकड़ा 7.8 करोड़ हो गया. बीते साल की इसी तिमाही में ये आंकड़ा 7.4 करोड़ डॉलर था. वहीं बीते साल के पहले दो महीनों में सऊदी अरब से तुर्की का आयात 31.3 करोड़ डॉलर का था.

यानी सऊदी अरब से आयात में एक साल में दोगुना इज़ाफा हुआ था जिसका नकारात्मक असर तुर्की के चालू खाते पर पड़ा.

लेकिन मार्च में निर्यात में उस वक्त बढ़ोतरी देखी गई जब ख़ाशोज्जी के मामले को ट्रांसफर करने की दरख़्वास्त दी गई और तुर्की के रुख़ में भी नरमी देखी गई.

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