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इराक युद्ध के 20 साल: क्या ये अमेरिका के इतिहास का सबसे खराब राजनैतिक फैसला था?

भले ही सद्दाम हुसैन को दुनिया तानाशाह के रूप में जानती है लेकिन इराक पर अमेरिका के हमले की आलोचना आज भी होती है। इराक युद्ध को अमेरिकी इतिहास का सबसे बुरा फैसला बताया जाता है।

Iraq war 20th anniversary

Image: oneindia

अमेरिका ने 2003 में 20 मार्च को ही इराक युद्ध की शुरुआत की थी। अमेरिका ने इस हमले को सबसे बड़े युद्ध के रूप में शुरू किया था। अमेरिका ने जब ये युद्ध शुरू किया था तो उसने इराक पर सामूहिक विनाश के घातक हथियार रखने के आरोप लगाए थे। हालांकि इस भयानक युद्ध के 20 साल पूरे होने के बाद भी अब तक इसके सबूत नहीं मिल पाए। एक वक्त था जब सद्दाम हुसैन को अमेरिका का करीबी माना जाता था फिर आखिर ऐसी क्या वजह थी कि इन दोनों देशों के संबंध इतने कड़वे हो गए?

इस्लामिक क्रांति से डरा सद्दाम हुसैन

इराकी राजनैतिक पटल पर सद्दाम हुसैन के उदय के साथ इसकी कहानी शुरू होती है। इन्होंने इराक में बाथ पार्टी के प्रमुख नेता के रूप में अपना राजनैतिक जीवन शुरू किया। 1979 में सद्दाम हुसैन के अल बक्र के हाथ से सत्ता छीन ली। सद्दाम हुसैन के हाथ में सत्ता आने के बाद धीरे-धीरे इराक अरब देशों में प्रभावशाली होने लगा। लेकिन ये वही दौर था जब ईरान में इस्लामिक क्रांति शुरू हो गई। ईरान में शिया की सत्ता थी, सद्दाम हुसैन खुद सुन्नी था। सद्दाम के लिए दिक्कत की बात ये थी कि जिस देश में वह शासन कर रहा था वह इराक खुद सिया बहुल था।

इराक की करारी हार हुई

सद्दाम हुसैन को डर था कि इस इस्लामिक क्रांति का प्रभाव इराक तक पहुंचा तो एक शिया देश में सुन्नी का शाषण करना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में इसे कमजोर करने के लिए इराक ने पश्चिमी ईरान में सेना उतार दी। शुरुआत में इराक ने ईरान के कई इलाकों पर कब्जा कर लिया। लेकिन धीरे-धीरे ईरान ने वापसी की और इराक के कई इलाके पर कब्जा कर लिया। 8 सालों तक चले इस बीसवीं सदी के सबसे लंबे और परंपरागत युद्ध को फारस खाड़ी का युद्ध भी कहा जाता है। इस युद्ध में लाखों लोगों की जान गई। 1988 में दोनों देशों के बीच युद्ध विराम हुआ।

कुवैत पर इराक का हमला

इस युद्ध में इराक को कुवैत और अमेरिका का समर्थन मिला था। युद्ध के लिए कुवैत ने इराक को खूब सारा कर्ज दिया था। लेकिन यह नाकाफी था। इराक की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। इराक की अर्थव्यवस्था कर्ज में डूब गई। इराक ने कुवैत को कर्ज माफ करने के लिए कहा लेकिन कुवैत ने इससे इनकार कर दिया। इससे सद्दाम हुसैन नाराज हो गया। सद्दाम हुसैन ने आरोप लगाया कि कुवैत तय कोटे से ज्यादा तेल का उत्पादन कर रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत कम हो रही है और इराक को नुकसान हो रहा है।

इराक ने कुवैत पर किया हमला

इसके बाद इराक ने तेल उत्पादन का झूठा आरोप लगाकर कुवैत पर हमला कर दिया। सिर्फ 6 घंटे में इराक ने पूरे कुवैत पर कब्जा कर लिया। अमेरिका ने इराक को तुरंत कुवैत खाली करने को कहा लेकिन उल्टे इराक ने कुवैत को अपना उन्नीसवां प्रांत घोषित कर दिया। सद्दाम हुसैन को इतने पर ही चैन नहीं मिला उसने अगले ही दिन सऊदी अरब की सीमा पर अपनी सेना तैनात कर दी। यह सब अंतरराष्ट्रीय जगत को नागवार गुजरा और संयुक्त राष्ट्र संघ से स्वीकृति लेकर अमेरिका के नेतृत्व में 28 देशों की सेना ने इराक पर हमला कर दिया। इराकी सेना पर जमकर बमबारी हुई। जमीन पर भी युद्ध लड़ा गया। आखिरकार इराकी सेना हार गई और कुवैत को छुड़ा लिया गया।

अमेरिका ने इराक पर लगाए कई प्रतिबंध

यहीं से अमेरिका के इराक आक्रमण की नींव पड़ी। कुवैत पर कब्जा करने पर इराक पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए। इससे उसकी अर्थव्यवस्था और चौपट होने लगी। साल 2000 में अमेरिका में जॉर्ज बुश की सरकार बन गई। उन्होंने सद्दाम हुसैन पर दबाव और बढ़ा दिया। हालांकि सद्दाम हुसैन की हनक कम नहीं हुई। ऐसा कहा जाता है कि सद्दाम ने परमाणु तकनीक हासिल करने की खूब कोशिशें कीं। साल 2001 में अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हो गया। इसके बाद अमेरिका ने अपने हर विरोधी को मिटाने का जैसे प्रण ले लिया।

20 साल पहले शुरू हुआ युद्ध

अमेरिका ने आरोप लगाया कि इराक के पास कई खतरनाक हथियार हैं। उसने दुनिया के देशों को विश्वास में लेकर इराक पर चढ़ाई कर दी। एक लाख से ज्यादा इराकी मारे गए। अरबों डॉलर खर्च हुए। 20 दिन बाद 9 अप्रैल 2003 को सद्दाम हुसैन की सरकार को गिरा दिया गया। लेकिन सद्दाम हुसैन तब भी पकड़ में नहीं आया। 13 दिसंबर 2003 को सद्दाम हुसैन को अमेरिकी सैनिकों ने पकड़ लिया। वो एक बंकर में छिपा था। इसके बाद पुराने नरसंहार के मामले में उसे फांसी दे दी गई।

अमेरिका का सबसे खराब फैसला

अमेरिका अपनी जनता और अंतरराष्ट्रीय दबावों में आकर कई साल पहले इराक छोड़कर चला गया लेकिन युद्ध के 20 साल बाद भी देश की आम जनता हिंसा में वैसे ही पिस रही है जैसे पहले पिस रही थी। इस युद्ध के इतने वक्त बीत जाने के बाद भी दुनियाभर की मीडिया में इस बात को लेकर बहस होती रहती है कि क्या यह जंग जरूरी थी? जैविक हथियारों के प्रोपोगेंडा से शुरू किए गए अमेरिका की जंग में किसका नुकसान किसका फायदा हुआ, इसका आकलन हमेशा होता रहेगा। बहरहाल इराक युद्ध को हाल के वर्षों में पश्चिमी देशों का सबसे खराब राजनीतिक फैसला माना जाता है।

अमेरिका की अर्थव्यवस्था कमजोर हुई

इस युद्ध में अमेरिका ने कई अरब डॉलर खर्च कर दिए मगर सद्दाम हुसैन को खत्म करने के बाद भी अमेरिका इराक में सफल लोकतंत्र बहाली नहीं करा पाया। इराक युद्ध में 1,25,000 लोग मारे गए। सैन्य अभियानों के चलते अगले 10 साल में लगभग ढाई लाख लोग मारे गए। करीब पौने चार लाख लोग जख्मी हुए। युद्ध की वजह से पूरा इराक तबाह हो गया मगर जिस आतंकवाद को नेस्तानाबूत करने की अमेरिका ने कसम खाई थी वह अबतक खत्म नहीं हो पाया। इस्लामिक स्टेट से लेकर अलकायदा तक आज भी अस्तित्व बरकरार है। लेकिन इसका उल्टा असर ये हुआ कि अमेरिका की आर्थिक शक्ति उजड़ती चली गई और अब स्थिति ये है कि वह चीन से कई मामलों में पिछड़ चुका है।

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