ईरान बनाम पाकिस्तान... आतंकवादियों को पालना है जिनकी पहचान, दोनों बलूचों का ही क्यों मिटा रहे नामोनिशान?
Iran Vs Pakistan: ईरान और पाकिस्तान ने अपनी 909 किलोमीटर लंबी सीमा पर एक-दूसरे के इलाकों पर हवाई हमले किए हैं। दोनों देशों ने दावा किया है, कि हमले पड़ोसी देश में शरण लिए हुए "आतंकवादी" समूहों के खिलाफ किए गए हैं, जिसका मकसद दोनों देशों ने अपनी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करना बताया है।
लेकिन, सवाल ये उठ रहे हैं, कि आखिर इन दोनों देशों में घमासान क्यों मचा है, जबकि दोनों ही देशों की पहचान और विदेश नीति बहुत हद तक आतंकवाद पर आधारित रही है। सबसे पहले हम जान लेते हैं, कि मौजूदा संघर्ष की केन्द्र में कौन कौन से आतंकी संगठन हैं, फिर हम बात करेंगे, कि ईरान और पाकिस्तान में संघर्ष की वजह क्या है?

जैश अल-अदल
ईरान और पाकिस्तान के बीच चल रहा संघर्ष मंगलवार देर रात शुरू हुई, जब ईरानी मिसाइलों और ड्रोन ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के पंजगुर में जैश अल-अदल के ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया। ईरान का कथित लक्ष्य जैश अल-अदल (जेएए) के दो गढ़ बलूचिस्तान में थे, जो ईरान के सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले कई सुन्नी सलाफिस्ट आतंकवादी समूहों में से एक है।
जैश अल-अदल का शाब्दिक रूप से "न्याय की सेना" होता है, जिसका पुराना नाम जुंदाल्लाहल था। जुंदाल्लाह के नेता अब्दोलमालेक रिगी को कुछ साल पहले ईरान ने एक नाटकीय घटनाक्रम में हवाई जहाज को लैंड करवाकर पकड़ा था और फिर मार डाला गया था। जिसके बाद जुंदाल्लाह का नया नाम जैश अल-अदल रखा गया।
जैश अल-अदल का गठन पाकिस्तान की आर्मी ने किया था और इसके जरिए पाकिस्तान ने लगातार ईरान को ब्लैकमेल किया है।
यहां ध्यान देने वाली बात ये है, कि जैश अल-अदल का मुख्यालय बलूचिस्तान में है, लेकिन इसका बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले बलूच लिबरेशन आर्मी से कोई लेना-देना नहीं है।
जैश अल-अदल की मांग ईरान में ईरानी सरकार से बलूची सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की मान्यता हासिल करना है। हालांकि, 2013 के बाद से सीमा के पास ईरानी चौकियों और सुरक्षा बलों पर लगातार घातक हमलों के कारण तेहरान इसे एक आतंकवादी समूह मानता है और ईरान इसे जैश अल-ज़ुल्म कहता है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है "अन्याय की सेना"।
ईरान का आरोप रहा है, कि जैश अल-अदल के जरिए पाकिस्तान उसके बलूचिस्तान क्षेत्र को अशांत करता है।
ईरान की तस्नीम समाचार एजेंसी ने बताया है, कि दिसंबर के मध्य में, जैश अल-अदल ने "ईरान के दक्षिण-पूर्व में सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत के रस्क शहर में एक पुलिस स्टेशन पर हमला किया था, जिसके परिणामस्वरूप 11 ईरानी पुलिस बल शहीद हो गए थे।"
जेएए मुख्य रूप से ईरानी सुरक्षा कर्मियों को निशाना बनाता है, लेकिन इसने ईरानी सरकारी अधिकारियों और शिया नागरिकों पर घात लगाकर, हत्या, हमले, हिट-एंड-रन छापे, अपहरण और आत्मघाती बम विस्फोटों से भी हमला किया है।
कथित तौर पर अब्दोलरहीम मुल्लाज़ादेह JAA का वर्तमान नेता है, हालांकि उसके बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कुछ ज्ञात नहीं है।
बलूच लिबरेशन फ्रंट, बलूच लिबरेशन आर्मी
पाकिस्तान ने गुरुवार सुबह ईरान के हमले का जवाब दिया, जिसमें दो बलूच आतंकवादी समूहों - बलूच लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के ईरान स्थित ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया गया। इन दोनों संगठनों को पाकिस्तान "आतंकवादी संगठन" मानता है।
बीएलएफ की स्थापना जुम्मा खान मैरी ने 1964 में दमिश्क, सीरिया में की थी। यह 1968-73 में ईरान में और फिर 1973-78 में पाकिस्तान में बलूच विद्रोह में सबसे आगे था। हालांकि, दोनों देशों में नष्ट होने के बाद, 1980 तक यह संगठन नक्शे से गायब हो गया और इसके संस्थापक भागकर अफगानिस्तान चले गए।
2004 में अल्लाह नज़र बलूच के नेतृत्व में बीएलएफ फिर से उभरा। तब से इसने पाकिस्तान में, बलूचिस्तान के भीतर और बाहर नागरिकों, पत्रकारों, सरकारी अधिकारियों और सैन्य कर्मियों पर हमलों की जिम्मेदारी ली है।
बीएलएफ को बीएलए के साथ मिलकर काम करने के लिए जाना जाता है, जिसकी स्थापना 2000 के आसपास हुई थी और इसने 2004 में पाकिस्तान में बलूचों के लिए एक अलग देश के लिए आंदोलन चलाना शुरू किया और फिर हिंसक हमले शुरू किए। वर्तमान में इसका नेतृत्व बशीर ज़ेब कर रहा है और बीएलएफ की तरह इसने भी पाकिस्तान में कई हमले किए हैं।
विशेष रूप से, ये दोनों बलूच आतंकवादी समूह पाकिस्तान में चीनी गैस और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को निशाना बनाने और चीनी श्रमिकों को मारने के लिए जाने जाते हैं। इन दोनों संगठनों ने पाकिस्तान में रहने वाले चीनी नागरिकों पर कई हमले किए हैं।
दोनों देशों की विदेश नीति में आतंकवाद
पाकिस्तान और ईरान ने अपनी विदेश नीति में हमेशा आतकवाद को आगे रखा है। मिडिल ईस्ट की राजनीति में प्रभाव जमाने के लिए ईरान जहां हूती विद्रोही, हिज्बुल्लाह और हमास जैसे आतंकी संगठनों का समर्थन करता है, वहीं पर पाकिस्तान भी दर्जन भर से ज्यादा आतंकी संगठनों को पालता आया है।
पाकिस्तान ने जैश ए मोहम्मद, हिब्जुल मुजाहिद्दीन समेत कई ऐसे आतंकी संगठनों को बनाया, जो कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा दे सकें, जिसकी वजह से हजारों लोग कश्मीर में मारे गये।
इसके अलावा, अफगानिस्तान में तालिबान को बनाने में भी पाकिस्तान का ही हाथ था, जिसका मकसद था, अफगानिस्तान को काबू में रखना। तालिबान के जरिए पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को नर्क बना दिया। हालांकि, इसका नतीजा उल्टा निकला है। मौजूदा तालिबान प्रशासन ने अब पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानना शुरू कर दिया है।
ईरान-पाकिस्तान क्यों लड़ रहे हैं?
हालांकि, इस बात की संभावना न्यूनतम है, कि पाकिस्तान और ईरान सीधे जंग में जा सकते हैं, क्योंकि दोनों ही देश गंभीर आर्थिक संकट में फंसे हुए हैं। दोनों ही देशों की तरफ से अब जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वो सधी हुई हैं।
ईरान ने पाकिस्तान एक दूसरे के साथ 900 किलो मीटर लंबी सीमा रेखा साझा करते हैं और दोनों ही देशों के बीच के सीमावर्ती क्षेत्र सालों से खतरनाक और अशांत रहे हैं। इसके अलावा, बलूचिस्तान क्षेत्र, जिसका एक हिस्सा ईरान के पास और दूसरा हिस्सा पाकिस्तान के पास है, वो दशकों से अशांत रहा है और इस क्षेत्र में दर्जन भर से ज्यादा आतंक संगठन अभी भी एक्टिव हैं।
पिछले दिनों ईरान में कई आत्मघाती हमले हुए हैं और ईरान का पाकिस्तान में घुसकर हमला, जैश-ए-अदल के खिलाफ कार्रवाई है और इस हमले के जरिए ईरान की कोशिश अमेरिका को ये संदेश भेजना भी हो सकता है, कि मिडिल ईस्ट की ये लड़ाई पश्चिम एशिया में भी फैल सकती है।

बलूचों का ही क्यों हो रहा नुकसान?
बलूचिस्तान की अलग मांग के साथ बलूच लिबरेशन आर्मी जंग लड़ रहा है, लेकिन जैश-ए-अदल संगठन में भी बलूचिस्तान के ही लोग शामिल हैं। इसके अलावा, ईरान और पाकिस्तान ने मौजूदा हमलों के बाद कहा है, कि उन दोनों ने इन हमलों में अपने अपने नागरिकों को ही मारा है।
ईरान ने पाकिस्तान में बलूच विद्रोह को दबाने में काफी अहम भूमिका निभाई थी, लिहाजा कई एक्सपर्ट्स का कहना है, कि ये पाकिस्तान और ईरान की बलूचों के खिलाफ कोई नई स्ट्रैटजी हो सकती है, क्योंकि दोनों ही देश आतंकवाद के मामलों के एक्सपर्ट हैं और दोनों ही देश अपने ही फैलाए आतंकवाद के पीड़ित भी हैं।
लेकिन, एक्सपर्ट्स का मानना है, कि ईरान और पाकिस्तान, दोनों ही बलूचों को सालों से मारते रहे हैं और इस बार भी अगर हालात बिगड़ते हैं, तो सबसे ज्यादा बलूचों का ही नुकसान होगा। ईरानी बलूचिस्तान में भी बलूच नागरिकों के खिलाफ खतरनाक ऑपरेशंस चलाए गये हैं और ईरान सरकार, आये दिन बलूच क्रांतिकारियों को फांसी पर लटकाती रहती है, जिससे बलूच ऑपरेशंस कमजोर पड़ा है।
फिलहाल इस बात की संभावना ना के बराबर है, कि ये जंग बढ़ेगा, लेकिन अगर ये संघर्ष बढ़ता है, तो इसमें कोई शक नहीं, कि बलूचों का ही कत्ल किया जाएगा।












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