South Pars की लपटों में घिरी दुनिया! गैस के बाद आएगा बिजली का संकट? टूटने की कगार पर ग्लोबल सप्लाई चेन

Iran South Pars Attack Impact: मिडिल ईस्ट (Middle East) के युद्ध की लपटें अब सरहदों को पार कर दुनिया भर के घरों और उद्योगों के दरवाजों तक पहुंच गई हैं। बुधवार, 18 मार्च को इजरायल द्वारा ईरान के सबसे बड़े गैस भंडार 'साउथ पार्स' के ऑनशोर रिफाइनरी यूनिट्स और स्टोरेज टैंकों पर किया गया हमला महज एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की रगों में दौड़ने वाली ऊर्जा सप्लाई पर सीधा प्रहार है।

इस हमले के जवाब में ईरान ने भी सऊदी अरब, यूएई और कतर के सबसे बड़े ऊर्जा हब 'रास लफान' (Ras Laffan) पर ड्रोन हमले कर दुनिया को बड़े संकट में डाल दिया है। आइए जानते हैं इस हमले के विनाशकारी परिणाम क्या हो सकते हैं?

South Pars Gas Field Attack

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने इस हमले के बाद कड़ी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि ऊर्जा बुनियादी ढांचे (Energy Infrastructure) को निशाना बनाने के परिणाम 'अनियंत्रित' होंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका असर किसी एक देश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया को इसकी भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी है कि यदि कतर पर दोबारा हमला हुआ, तो अमेरिका 'साउथ पार्स' को पूरी तरह तबाह कर देगा।

दुनिया के सबसे बड़े खजाने 'साउथ पार्स' पर संकट

फारस की खाड़ी में स्थित साउथ पार्स (ईरान) और नॉर्थ डोम (कतर) मिलकर दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस क्षेत्र बनाते हैं।

  • विशाल भंडार: इसमें लगभग 51 ट्रिलियन क्यूबिक मीटर गैस है, जो दुनिया के कुल ज्ञात भंडार का लगभग एक-तिहाई (33%) है।
  • ईरान की रीढ़: यह फील्ड ईरान के कुल गैस उत्पादन का 70-80% हिस्सा प्रदान करता है। असालुयेह (Asaluyeh) स्थित प्रोसेसिंग प्लांट्स और फेज-14 जैसी यूनिट्स को हुए नुकसान से ईरान के घरेलू बिजली उत्पादन और उद्योगों की कमर टूट गई है।
  • वैश्विक प्रभाव: कतर वाला हिस्सा दुनिया की 20% एलएनजी (LNG) जरूरतों को पूरा करता है। रास लफान कॉम्प्लेक्स (300 वर्ग किमी में फैला) को हुए "व्यापक नुकसान" ने वैश्विक सप्लाई चेन को हिला कर रख दिया है।

भारत पर असर: गहरा सकता है रसोई और बिजली का संकट

ईरान के साउथ पार्स और कतर के रास लफान पर हुए हमलों का भारत पर सीधा और विनाशकारी असर पड़ सकता है।

  • 1. आयात पर निर्भरता: भारत अपनी एलएनजी (LNG) जरूरतों के लिए मुख्य रूप से कतर पर निर्भर है और सालाना 1.4 करोड़ टन से अधिक का आयात करता है।
  • 2. महंगाई की मार: भारत अपनी घरेलू एलपीजी (LPG) का करीब 80-85% हिस्सा खाड़ी देशों (कतर, सऊदी अरब आदि) से मंगवाता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव और उत्पादन रुकने से भारत में रसोई गैस, सीएनजी और पीएनजी की कीमतों में भारी उछाल आना निश्चित है।
  • 3. औद्योगिक संकट: गैस की किल्लत से भारत के खाद (Fertilizer) और बिजली संयंत्रों की लागत बढ़ेगी, जिससे अंततः आम उपभोक्ता पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा।

सबकुछ नॉर्मल होने में कितना लगेगा टाइम?

विशेषज्ञों के अनुसार, इतने जटिल ऊर्जा ढांचे की मरम्मत करना कोई आसान काम नहीं है। इतिहास गवाह है कि 2003 के इराक युद्ध और यूक्रेन संकट के दौरान ऊर्जा प्रणालियों को बहाल करने में सालों लग गए थे। डॉयचे बैंक के विश्लेषकों का मानना है कि इस हमले ने पहली बार उत्पादन स्थलों (Upstream facilities) को निशाना बनाया है, जिससे तेल और गैस बाजार लंबे समय तक अस्थिर रहेंगे। ईरान, जो पहले से ही प्रतिबंधों के कारण रोजाना $250 मिलियन का नुकसान झेल रहा था, उसके लिए इन रिफाइनरियों को फिर से खड़ा करना एक वित्तीय असंभवता जैसा होगा।

आर्टिकल में दिए गए आंकड़े अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं।

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