Iran-Saudi Arabia: चीन बना मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा पावर, क्या ये अमेरिका के पतन की शुरुआत है?
China role in Mideast rivals: अमेरिका भले ही अभी भी खुद को सुपरपावर मानता हो, लेकिन हकीकत ये है, कि चीन बड़ी तेजी से उससे यह कुर्सी छीनने में लगा हुआ है। वह अब बड़े देशों के झगड़े खुद ही सुलझाने लगा है।

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सऊदी अरब और ईरान 7 साल बाद कूटनीतिक संबंधों की बहाली पर सहमत हो गए हैं। शुक्रवार को बीजिंग की मेजबानी में चार दिनों तक चली वार्ता के बाद वर्षों से टूट चुके राजनयिक संबंधों को फिर से जोड़ने पर ये दोनों देश सहमत हुए हैं। दोनों देशों ने दो महीने के भीतर एक-दूसरे देशों में दूतावास को खोलने पर सहमति जताई है। इस दौरान दोनों देशों ने एक दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करने और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने की भी शपथ ली है। दोनों देशों ने वार्ता के दौर की मेजबानी और प्रायोजन के लिए चीन को धन्यवाद दिया है।
लंबे अर्से से दोनों देशों में दुश्मनी
अंतरराष्ट्रीय हलकों में इसे एक बड़ी घटना बताया जा रहा है। ईरान और सऊदी अरब में लंबे समय से टकराव चल रहा है। दोनों देश लंबे वक्त से एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। लंबे समय से चल रहे संघर्ष की मुख्य वजह क्षेत्रीय प्रभुत्व बताया जाता रहा है। हालांकि दोनों ही देशों के मध्य दुश्मनी की वजह धर्म भी है। इनका धर्म भले इस्लाम हो मगर ये क्रमशः शिया और सुन्नी प्रभुत्व वाले देश हैं। धर्म का यह बंटवारा लगभग पूरे मिडिल-ईस्ट में दिखता है। यहां सिया बहुत देश ईरान के प्रभाव में हैं तो सुन्नी बहुल देश अपनी समस्या को लेकर सऊदी अरब का मुंह देखते हैं।
ईरान और सऊदी अरब में दुश्मनी क्यों है?
सुन्नी प्रभुत्व वाला सऊदी अरब इस्लाम का जन्म स्थल है और इसे एकस्वर में इस्लामिक दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जगह माना जाता रहा है। ऐसे में सऊदी हमेशा से ही खुद को सभी मुस्लिम देशों का नेता मानता आया है। कुछ दशक पहले सिया देश ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति से सऊदी अरब को बड़ी चुनौती मिली। इसके बाद दोनों ही देश वर्षों से पूरे क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करने में जुटे रहे, जिस वजह से बार-बार टकराव की स्थिति बनती रही। सऊदी अरब पर हमेशा ये आरोप लगता रहा है कि वह वहाबी चरमपंथ को बढ़ावा देता है, उनकी फंडिंग करता है। वहीं ईरान पर यह आरोप लगता है कि वह हिजबुल्लाह को समर्थन देता और उसे हथियार उपलब्ध कराता है।

दो 'बिल्लियों' के बीच हित साधता 'बंदर'
ईरान और सऊदी अरब के बीच विवाद में एक बड़ा फैक्टर अमरीका है। सऊदी अरब अमरीकी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार रहा है, सुरक्षा सहित अपनी कई जरूरतों के लिए वह अमरीका पर निर्भर है। जबकि ईरान को लेकर अमेरिका की नजरें हमेशा टेढ़ी ही रही हैं। अमेरिका, ईरान को अलग थलग करने के लिए उस पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगाता रहा है। इस बीच परिदृश्य में कतर की भी भूमिका रही है। कतर यूं तो सुन्नी बहुल देश है मगर वह सऊदी अरब को नेता नहीं मानता। हाल के दशकों में उसकी संपन्नता बढ़ती गई है ऐसे में सऊदी के लिए चुनौती बनता रहा है।
चीन की एंट्री से बदला खेल

अमेरिका इन सुन्नी देशों के बीच पंच की भूमिका निभाता रहा है। लेकिन अब इससे बढ़कर मुस्लिम देशों के बीच चीन ने एंट्री मारी है। इसे मध्य पूर्व में चीन की बढ़ती भूमिका के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि यदि ईरान और सऊदी अरब दशकों की दुश्मनी भूलकर एक होने में सफल रहते हैं तो जल्द दी अमेरिका की नंबर-1 की कुर्सी खत्म हो जाएगी। प्रोफेसर और स्तंभकार अशोक स्वैन, जो अपनी भू-राजनीतिक टिप्पणी के लिए जाने जाते हैं ने कहा कि ईरान और सऊदी के बीच शांति की बहाली के साथ मध्य पूर्व की राजनीति का अमेरिकी वर्चस्व आधिकारिक रूप से समाप्त हो गया है।
अमेरिका के प्रभाव में गिरावट
प्रोफेसर डेरेक ग्रॉसमैन ने ट्विटर पर लिखा है कि इस तरह की कूटनीतिक पहलों की अगुआई करने वाला चीन इस बात का और सबूत है कि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी प्रभाव में गिरावट आ रही है। ऐसा कहा जाता है कि दुनिया के हर विवाद में किसी न किसी रूप में अमेरिका की भूमिका होती है। लेकिन जिस प्रकार अमेरिका को कोई खबर लगे बिना दोनों देश चीन के नेतृत्व में एक होने गए हैं यह दर्शाता है कि अब चीन ने अमेरिका की दादागिरी पर लगाम लगा दिया है। हालांकि इस समझौते को लेकर अमेरिका ने मामले को सामान्य बनाने की पूरी कोशिश की है।
अमेरिका ने कहा कि उसे मध्य पूर्व के पुराने प्रतिद्वंद्वियों के बीच संबंधों की बहाली के बारे में पहले से पता था। उसे खुद सऊदी अरब ने ये जानकारी दी थी। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद प्रवक्ता जॉन किर्बी ने साफ किया कि इस बातचीत में अमेरिका सीधे तौर पर शामिल नहीं था। वहीं व्हाइट हाउस की प्रवक्ता केरिन जीन-पियरे ने कहा कि अमेरिका में यमन में युद्ध के समाप्त होने के किसी भी कोशिश का समर्थन करता है। यही वजह है कि हमने राष्ट्रपति को इन गर्मियों में इस इलाके का दौरा करते हुए देखा।
समझौते पर किसने क्या कहा?
ईरान और सऊदी के बीच संबंध बेहतर होने की खबरों का जहां पाकिस्तान से लेकर ओमान और इराक ने स्वागत किया है वहीं इजरायल के पूर्व पीएम नेफ्ताली बेनेट ने इसे लेकर पीएम नेतन्याहू पर निशाना साधा है। नफ्ताली बेनेट ने ट्वीट किया कि सऊदी अरब और ईरान के संबंधों की बहाली इजरायल के लिएए एक गंभीर और खतरनाक बदलाव है। उन्होंने दोनों देशों की इस बातचीत को ईरान की राजनीतिक जीत बताया है। उन्होंने कहा कि ये नेतन्याहू सरकार की एक बड़ी विफलता है और ईरान के विरूद्ध क्षेत्रीय गठबंधन बनाने की कोशिशों को एक बड़ा झटका लगा है।
कम रपटीली नहीं है दोस्ती की राह
बहरहाल, चीन की मध्यस्थता में जो समझौता हुआ है, इससे यही कहा जा सकता है कि आने वाला घटना क्रम देखना बड़ा ही दिलचस्प होगा। अगर सऊदी अरब और ईरान शत्रुता भुलाकर करीब आते हैं तो इससे ओपेक देशों की अमेरिका से दूरी बढ़ेगी और ईरान और मजबूत होगा। हालांकि मिडिल ईस्ट में अभी कई क्षेत्रीय चुनौतियां हैं। ईरान और सऊदी अरब के हित यमन, लेबनान और सीरिया में टकराते हैं। इतना ही नहीं सऊदी अरब के 90 फीसदी हथियार अमेरिका देता है और तमाम टेक्नोलॉजी भी उसके भरोसे हैं। ऐसे में ये कहना कि मिडिल ईस्ट के देशों के बीच याराना कायम हो जाएगा और चारोंओर शांति कायम हो जाएगी, अभी जल्दबाजी होगी। इसलिए बेहतर है कि इंतजार किया जाए तभी पता लगेगा कि कागज पर हुआ यह समझौता धरातल पर कितना उतर पाया है।












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