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Diplomacy: तालिबान से दोस्ती के लिए भारत ने नैतिकता को ताक पर क्यों रख दिया? द ग्रेट जियो-पॉलिटिकल गेम समझिए

Diplomacy: काबुल पर कब्जे के बाद तालिबान ने अफगानिस्तान में महिलाओं के तमाम अधिकार खत्म कर दिए हैं, सरकार ने सभी जातियों के लिए दरवाजे बंद हो चुके हैं, सख्त शरिया कानून लागू है और अवहेलना करने पर कोड़े बरसाने से लेकर अंक काटने तक की सजा के प्रावधान किए गये हैं। यानि, अफगानिस्तान में मानवाधिकार जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं बचा है।

लेकिन, इन सबके बीच भारत और तालिबान के बीच रिश्ते सामान्य हो चुके हैं और तालिबान की ख्वाहिश है, कि भारत एक बार फिर से अफगानिस्तान में विकास कार्यों को शुरू करे। यानि, भारत उस तालिबान के साथ रिश्ते बना रहा है, जिसे उसने अभी तक मान्यता नहीं दी है।

india afghanistan relation

लिहाजा, सवाल ये उठते हैं, कि भारत ने नैतिकता की जगह विदेश नीति में व्यावहारिकता को क्यों तरजीह दी है?

इस सवाल का जवाब समझने से पहले जानना जरूरी हो जाता है, कि तालिबान और भारत के संबंधों का इतिहास क्या रहा है?

तालिबान के साथ भारत के कैसे रहे हैं संबंध? (How have been India's relations with the Taliban?)

साल 2000 में पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त विजय के नांबियार ने तालिबान के दूत मुल्ला अब्दुल सलाम जईफ के साथ एक बैठक की थी और माना था, कि काबुल में सत्ता पर काबिज तालिबान के साथ भारत के जुड़ाव की संभावनाएं नहीं हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अविनाश पालीवाल की किताब, 'माई एनिमीज एनिमी: इंडिया इन अफ़गानिस्तान, फ्रॉम द सोवियत इनवेज़न टू द यूएस विड्रॉल (2017)' के अनुसार, भारतीय उच्चायुक्त ने कहा था, कि "मुझे एहसास हुआ, कि ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे हम (तालिबान और भारत) किसी भी तरह की समझ में एक-दूसरे से वास्तव में जुड़ेंगे।" नांबियार का मानना ​​था, कि तालिबान "पाकिस्तानी तर्क के घेरे" में मजबूती से फंसा हुआ है, जिससे भारत के लिए उनके साथ गंभीरता से जुड़ना मुश्किल है।"

लेकिन, करीब 25 साल बीतने के बाद इस साल जनवरी के पहले हफ्ते में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री और तालिबान शासन के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी के बीच दुबई में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई है। इस दौरान विक्रम मिस्री के साथ कई भारतीय डिप्लोमेट्स मौजूद थे।

साल 2021 में काबुल में अशरफ गनी की सरकार के पतन के बाद ये पहला मौका था, जब दोनों देशों के शीर्ष अधिकारियों के बीच मुलाकात हुई थी, जाहिर तौर पर इसका मतलब यही है, कि भारत, तालिबान के साथ भागीदारी बना रहा है।

दोहा में भारत-तालिबान की पहली बैठक (India-Taliban Relation)

31 अगस्त 2021 को, जब अफगानिस्तान से आखिरी अमेरिकी विमान ने उड़ान भरी थी, उसके कुछ घंटों के बाद भारत ने तालिबान के साथ अपना पहला आधिकारिक संपर्क किया था। उस वक्त काबुल में सत्ता पर काबिज हुए तालिबान ने भारत से बातचीत का अनुरोध किया था।

जिसके बाद भारतीय राजदूत दीपक मित्तल ने कतर की राजधानी दोहा में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई से भारतीय दूतावास में मुलाकात की थी। मोहम्मद अब्बास स्टेनकजई, तालिबान के वो नेता हैं, जिन्होंने देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) से पढ़ाई की थी और भारत में रहने का उनके पास अच्छा खासा अनुभव था।

स्टेनकजई को तालिबान की सरकार में उप-विदेश मंत्री बनाया गया और उन्होंने उस दौरान कहा था, कि "भारत इस उपमहाद्वीप के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और तालिबान, भारत के साथ सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक और व्यापारिक संबंध अतीत की तरह ही जारी रखना चाहता है।"

दोहा बैठक के कुछ दिनों बाद, तत्कालीन विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने कहा था, कि बातचीत "सीमित" रही है, और तालिबान ने संकेत दिया है, कि वे भारत की चिंताओं को "संभालने" के तरीके में "उचित" रहेंगे।

लेकिन, जब तालिबान की तरफ से बनाए गये सरकार में जातीय अल्पसंख्यकों और महिलाओं को कोई जगह नहीं दी गई, तो भारत ने "समावेशी व्यवस्था" का आह्वान किया। नई दिल्ली ने कहा, कि एक "निकट पड़ोसी और (अफगान) लोगों के मित्र" के रूप में, स्थिति भारत के लिए "सीधी चिंता" का विषय है।

भारत और तालिबान के अधिकारियों के बीच हुई बैठक से कुछ दिन पहले, तत्कालीन ISI प्रमुख जनरल फैज हमीद तालिबान की सरकार बनाने में मार्गदर्शन देने के लिए काबुल गए थे।

भारत ने काबुल में भेजा टेक्निकल टीम

उसी साल सितंबर में भारत ने तालिबान को "अफगानिस्तान में सत्ता और अधिकार के पदों पर बैठे लोगों" के रूप में वर्णित किया, और पहली बार तालिबान को अफगानिस्तान का एक पक्ष स्वीकार किया।

फिर दिसंबर 2021 में, भारत ने अफगानिस्तान को 1.6 टन आवश्यक दवाइयां भेजीं, जो नई दिल्ली में सत्तारूढ़ शासन को अफगानिस्तान के लोगों से अलग देखने के लिए किए गए राजनीतिक आह्वान का संकेत था और इसके साथ ही, भारत ने तालिबान के साथ बातचीत करने का एक रास्ता भी खोल दिया।

जून 2022 की शुरुआत में, पहली बार एक आधिकारिक भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने अफगानिस्तान में "मानवीय सहायता" की देखरेख करने के लिए काबुल का दौरा किया। विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव जे पी सिंह के नेतृत्व में टीम ने विदेश मंत्री मुत्तकी से मुलाकात की थी।

उसी महीने के अंत में, नई दिल्ली ने देश के पूर्व में खोस्त और पक्तिका प्रांतों में एक घातक भूकंप से प्रभावित अफगान लोगों के लिए सहायता भेजी, और सहायता के वितरण का कॉर्डिनेशन करने के लिए काबुल में दूतावास में एक "तकनीकी टीम" तैनात करने का कदम भी उठाया। तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद भारत ने अपना दूतावास खाली कर दिया था।

दिल्ली में अफगानिस्तानी दूतावास

दिसंबर 2022 में भारत ने विश्वविद्यालयों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने के तालिबान के आदेश पर चिंता जताते हुए एक समावेशी सरकार के लिए अपने आह्वान को दोहराया, जो अफगान समाज के सभी पहलुओं में महिलाओं और लड़कियों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करती है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने 30 अगस्त 2021 को भारत की अध्यक्षता में अपनाए गए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2593 का हवाला दिया, जिसमें मानवाधिकारों और महिलाओं के अधिकारों को बनाए रखने की आवश्यकता के बारे में बात की गई थी और अफगानिस्तान में बातचीत के जरिए राजनीतिक समाधान की मांग की गई थी।

फिर, अक्टूबर 2023 में, नई दिल्ली में अफगान दूतावास में तैनात पूर्व सरकार के राजदूत ने संसाधनों और कर्मियों की कमी और "अफगानिस्तान के सर्वोत्तम हितों की सेवा करने के लिए अपेक्षाओं को पूरा करने में नाकामी" का हवाला देते हुए काम करना बंद कर दिया। अशरफ गनी सरकार की तरफ से नियुक्त राजदूत के दूतावास छोड़ने के बाद, मुंबई और हैदराबाद में तैनात दो अफगान राजनयिकों ने मिशन चलाने के लिए स्वेच्छा से काम किया।

और अब जनवरी 2024 में, काबुल में स्थित भारतीय राजनयिकों ने मुत्ताकी के साथ अपनी पहली बैठक की।

तालिबान के प्रमुख नेताओं के साथ बातचीत में भारतीय अधिकारियों को यह अहसास हुआ है, कि तालिबान भारत के साथ जुड़ने के लिए तैयार है और देश के बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए सहायता की तलाश कर रहा है। उन्हें शासन और क्षमता में भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि कई प्रशिक्षित अफगान देश छोड़ चुके हैं।

वहीं, दिल्ली को इस बात का भी अहसास है, कि चीन जैसे देश, कैसे अफगानिस्तान से अमेरिका के निकलने पर बनी खाली जगह को भरने की कोशिश कर रहे हैं, लिहाजा नई दिल्ली पीछे नहीं रह सकती है।

लिहाजा, इस बैठक के दौरान जब भारत ने तालिबान के नेताओं के साथ 'महिलाओं के मुद्दे' को नहीं उठाया और जब इसको लेकर सवाल उठे, तो नई दिल्ली ने कहा, कि वह उस देश के लोगों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है, और "यथार्थवादी तरीके से" कार्य करेगी।

भारत के लिए 'यथार्थवादी तरीके से काम करना" ही जियो-पॉलिटिक्स के लिहाज से अच्छा है।

क्योंकि, दुनिया में, खासकर अफगानिस्तान के आसपास काफी कुछ बदल रहे हैं।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच रिश्ते काफी खराब हो चुके हैं, ईरान काफी कमजोर हो चुकी है, रूस खुद यूक्रेन में जंग लड़ रहा है और व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी हो चुकी है।

लिहाजा, भारत के लिए अब सबसे अच्छा रास्ता यही निकलता है, कि तालिबान के साथ भागीदारी को आगे ले जाया जाए, क्योंकि दांव पर अफगानिस्तान में 3 अरब ड़ॉलर से ज्यादा का भारतीय निवेश है। भारत की मुख्य चिंता सुरक्षा है और नई दिल्ली ये सुनिश्चित करना चाहती है, कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत के खिलाफ ना हो पाए और तालिबान ने भारत को ये आश्वासन दिया है।

भारत ने अफगानिस्तान को बड़ी मात्रा में मानवीय, चिकित्सा और खाद्य सहायता भेजी है, और शरणार्थियों के पुनर्वास और क्रिकेट संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा की है। जो निश्चित तौर पर व्यावहारिक है और इस फैसले को डिप्लोमेसी की जरूरत के तौर पर देखा जाना चाहिए।

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