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इंडियन ऑयल ने रूसी तेल कंपनी को हटाया, इंफोसिस ने रूस से समेटा कारोबार... अमेरिकी धमकी का असर?

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन ऑयल कॉर्प ने अपने लेटेस्ट टेंडर में मांगे गए कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली कंपनियों की लिस्ट में से रूसी तेल कंपनी को बाहर कर दिया है।

नई दिल्ली, अप्रैल 14: क्या अमेरिका और यूरोपीय देशों की धमकी का असर भारत पर होने लगा है और क्या भारत ने रूस से दूरी बनानी शुरू कर दी है? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं, कि एक तरफ भारत सरकार ने कहा है, कि रूस से तेल खरीदने पर अमेरिकी प्रतिबंधों का असर नहीं होता है और भारत रूसी तेल खरीदना जारी रखेगा, लेकिन दूसरी तरफ इंडियन ऑयल ने अपनी लिस्ट से रूसी तेल कंपनी को बाहर कर दिया है। वहीं, भारत की दिग्गड आईटी कंपनी इंफोसिस ने भी रूस से अपना कारोबार समेट लिया है।

लिस्ट से रूसी कंपनी गायब

लिस्ट से रूसी कंपनी गायब

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन ऑयल कॉर्प ने अपने लेटेस्ट टेंडर में मांगे गए कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली कंपनियों की लिस्ट में से रूसी तेल कंपनी को बाहर कर दिया है। जिसको लेकर एक आधिकारिक सूत्र ने कहा कि, इसकी वजह ऑपरेशनल है, ना की रणनीतिक। दरअसल, भारत के शीर्ष रिफाइनर इंडियन ऑयल ने मई और जून लोडिंग के लिए कुछ ग्रेड के कच्चे तेल की खरीद के लिए पिछले सप्ताह एक टेंडर जारी किए थे। सूत्रों के अनुसार, मंगलवार को बंद हुए स्पॉट टेंडर से रूसी तेल कंपनी यूराल, दास, यूजीन द्वीप और थंडर हॉर्स सहित कुछ उच्च सल्फर क्रूड ऑयल कंपनियों को बाहर कर दिया गया और एक संशोधन जारी किया गया। हालांकि, इंडियन ऑयल ने रूसी और अन्य ग्रेड के बहिष्कार का कोई कारण नहीं बताया, लेकिन एक सूत्र ने कहा कि, इसमें बहुत कुछ नहीं देखा जाना चाहिए। सूत्र ने कहा कि, रूसी तेल कंपनियों को लिस्ट से बाहर निकालना, किसी रणनीतिक कारण के बजाय रिफाइनर की आवश्यकता से जुड़ा है।

धमकियों का नहीं है असर?

धमकियों का नहीं है असर?

तेल कंपनी के एक सूत्र ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया कि, रिफाइनर कच्चे तेल को संसाधित करने की अपनी क्षमता, उत्पादों की अपेक्षित मांग और कच्चे तेल की सोर्सिंग की लागत के आधार पर कई प्रकार के ग्रेड चुनते हैं। कच्चे तेल की कुछ किस्में, कुछ प्रोडक्ट्स के उत्पादन के लिए अधिक उपयुक्त होती हैं। भारत पर अमेरिका से रूसी तेल की खरीद में कटौती करने का जबरदस्त दबाव रहा है, और बाडेन प्रशासन इसे यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के रूप में देखता है। और अमेरिका के अधिकारियों की तरफ से भारत के खिलाफ कई बार बयान जारी किए गये हैं और अमेरिका के डिप्टी एनएसएस दलीप सिंह ने तो यहां तक कह दिया, कि अगर चीन भारत की सीमा पर हमला करता है, को रूस बचाने नहीं आएगा।

ज्यादा तेल नहीं खरीदता है भारत

ज्यादा तेल नहीं खरीदता है भारत

हालांकि, अमेरिकी धमरियां एक तरफ, लेकिन भारत कच्चे तेल का आयात हमेशा से ही रूस से काफी कम करते आया है और इसकी सबसे बड़ी वजह रास्ता है, क्योंकि रूसी तेल खरीदने के लिए भारत को कोई उपयुक्त रास्ता नहीं मिल पाता है, जिससे तेल की लागत कम पड़े। रूसी तेल की भारतीय खरीद परंपरागत रूप से कम रही है, और भारत अपनी जरूरत का मात्र 1-2% कच्चे तेल का आयात ही रूस से करता है। हालांकि, जब यूक्रेन युद्ध के बीच रूस ने सिर्फ 35 डॉलर प्रति बैरल के दर पर भारत को कच्चा तेल बेचने का ऑफर दिया, तो भारत सरकार ने खरीददारी बढ़ा दी, जिसका विरोध अमेरिका और यूरोपीय देशों की तरफ किया गया।

रूस ने डिस्कॉउंट कर दिया कम

रूस ने डिस्कॉउंट कर दिया कम

वहीं, इकोनॉमिक टाइम्स से एक सूत्र ने कहा कि, रूसी तेल कंपनी की तरफ से जो छूट दी गई थी, वो अब खत्म हो गई है और अब रूसी तेल कंपनी यूराल अब ब्रेंट ऑयल के लिए सिर्फ 2 डॉलर प्रति बैरल की छूट दे रही है, जैसा जनवरी में था। वहीं, मार्च में क्रूड ऑयल के लिए छूट 32 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। जिससे भारतीय तेल बाजार में रूसी तेल खरीदने के लिए आकर्षण बढ़ा है, लेकिन अब जबकि छूट खत्म हो गई है, तो भारत ने एक बार फिर से रूसी तेल खरीदना काम कर दिया है। भारत साफ कर चुका है, कि वो किसी की दवाब में आये बगैर अपने हित को देखते हुए काम करेगा। लेकिन, रिपोर्ट है कि, भारत की दिग्गज आईटी कंपनी इंफोसिस ने रूस से अपना कारोबार समेटने का फैसला किया है।

रूस ने निकली इंफोसिस कंपनी

रूस ने निकली इंफोसिस कंपनी

वहीं, भारत की दिग्गज आईटी कंपनी इंफोसिस ने रूस से अपना कारोबार समेटने का फैसला किया है और इंफोसिस ने रूस की जगह वैकल्पिक स्थान पर अपना व्यापार ले जाने का फैसला किया है। इसके साथ, इन्फोसिस रूस से बाहर जाने के लिए ओरेकल कॉर्प और एसएपी एसई जैसे कई अन्य वैश्विक साथियों में शामिल हो गई है। कंपनी के चौथी तिमाही के नतीजों के बारे में मीडिया को जानकारी देते हुए इंफोसिस के सीईओ सलिल पारेख ने कहा कि, कंपनी फिलहाल रूसी ग्राहकों के साथ कोई कारोबार नहीं कर रही है और न ही ऐसी कोई योजना है। पारेख ने कहा, "स्थिति को देखते हुए हमने रूस केन्द्रों से रूस के बाहर हमारे व्यापार और हमारे ऑपरेशन का संचालन शुरू किया है'।

ऋषि सुनक को बचाने की कोशिश?

ऋषि सुनक को बचाने की कोशिश?

आपको बता दें कि, इंफोसिस कंपनी के सह संस्थापक नारायण मूर्ति हैं, जिनकी बेटी का विवाह ब्रिटेन के वित्तमंत्री ऋषि सुनक से हुआ है, जो भारतीय मूल के हैं। लेकिन, ब्रिटेन ने रूस के खिलाफ काफी कदम उठाए हैं और ब्रिटेन के लोग और विपक्षी पार्टियां लगातार ऋषि सुनक पर इंफोसिस को लेकर सवाल उठा रहे थे। इफोसिस में ऋषि सुनक की पत्नी अक्षता मूर्ति का भी शेयर है, लिहाजा ब्रिटेन के लोग पूछ रहे थे, कि एक तरह सरकार रूस पर प्रतिबंध लगा रही है, लेकिन खुद वित्त मंत्री का परिवार रूस में व्यापार कर रहा है, लिहाजा ऋषि सुनक राजनीतिक तौर पर बैकफुट पर थे। ऋषि सुनक को आने वाले चुनाव में ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बनने का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा है और इंफोसिस को लेकर लग रहे आरोपों ने ऋषि सुनक की छवि को खराब करना शुरू कर दिया था।

अक्षता मूर्ति का है इंफोसिस में हिस्सा

अक्षता मूर्ति का है इंफोसिस में हिस्सा

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन के वित्त मंत्री ऋषि सुनक पर हितों के टकराव के आरोप लगने के कुछ दिनों बाद इंफोसिस कंपनी की तरफ से यह घोषणा की गई है, क्योंकि उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति की आईटी फर्म में लगभग एक अरब डॉलर की हिस्सेदारी है। अक्षता इंफोसिस के संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति की बेटी हैं। ऋषि सुनक पर अपनी पत्नी की हिस्सेदारी के जरिए उस कंपनी से आर्थिक फायदा लेने का आरोप लगा है, जिसका रूस में कारोबार है। ऐसे में माना जा रहा है, कि ऋषि सुनक का राजनीतिक भविष्य बचाने के लिए इंफोसिस ने रूस में अपना ऑपरेशन बंद करने का फैसला लिया है।

इंफोसिस ने जारी किया बयान

इंफोसिस ने जारी किया बयान

वहीं, रूस में संचालन बंद करने के बाद इंफोसिस की तरफ से बयान जारी किया गया है और बयान जारी करते हुए इंफोसिस के सीईओ सलिल पारेख ने कहा कि, रूस में इंफोसिस का कारोबार छोटे स्तर पर है और रूस में कंपनी के सिर्फ 100 कर्मटचारी ही है। सलिल पारेख ने कहा कि, रूस में हमारे ग्राहक नहीं है और हम जो काम करते हैं, वह हमारे कुछ वैश्विक ग्राहकों के लिए है, जिनका रूस में संचालन है। उन्होंने कहा कि, कंपनी क्षेत्र में विकास के बारे में बहुत चिंतित है, और रूस में अपने कर्मचारियों को अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में ट्रांसफर करने और काम करने में मदद करेगी, खासकर पूर्वी यूरोप में।

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