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चीन के दिए घाव पर मलहम लगाएगा भारत, हाथ में लिया प्रोजेक्ट, ऐसे अरबों कमाएगा भारत का 'छोटा भाई'

काठमांडु, 21 अगस्तः नेपाल की महत्वकांक्षी विद्युत परियोजना पश्चिमी सेती को अब भारत पूरा करने जा रहा है। नेपाल ने अपने देश के पश्चिमी हिस्से में पनबिजली संयंत्र लगाने के लिए भारतीय कंपनी एनएचपीसी लिमिटेड के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है। इस संयंत्र पर काम करने से चीन की एक कंपनी 2018 में पीछे हट गई थी। इस सप्ताह काठमांडू में परियोजनाओं पर एक औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसमें दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों द्वारा बिजली क्षेत्र की साझेदारी के विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया गया था, जिसमें नेपाल में परियोजनाओं में भारतीय बिजली की बड़ी कंपनियों की भागीदारी शामिल है।

नेपाल में भारत की तीसरी परियोजना

नेपाल में भारत की तीसरी परियोजना

यह नेपाल में भारत की ओर से पनबिजली के क्षेत्र में चलाई जा रही तीसरी परियोजना है। इससे जुड़े अधिकारियों के मुताबिक एनएचपीसी लिमिटेड ने गुरुवार को एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत कंपनी दो परियोजनाओं वेस्ट सेती (750 मेगावाट) और एसआर-6 (450 मेगावाट) के लिए संभाव्यता, पर्यावरणीय प्रभाव, डूब क्षेत्र और निर्माण लागत जैसे अध्ययन करेगी। दोनों परियोजनाओं की अनुमानित लागत 2.4 अरब डॉलर है। इससे पहले, दो अलग-अलग मौकों पर दो चीनी कंपनियां एमओयू पर हस्ताक्षर करने के बाद परियोजनाओं से हट गईं थीं।

2017 में चीनी कंपनी ने छोड़ा साथ

2017 में चीनी कंपनी ने छोड़ा साथ

चीन की पनबिजली परियोजनाओं के निर्माण की सबसे बड़ी कंपनी 'थ्री गोर्जेस इंटरनेशनल कार्प' पहले इस परियोजना पर काम करने वाली थी, लेकिन शर्तों पर सौदेबाजी के दौरान 2017 में नेपाल ने उसके साथ समझौता खत्म कर दिया था। चीन की कंपनी ने 2012 में वेस्‍ट सेती प्रॉजेक्‍ट को हाथ में लिया था लेकिन 2018 में वह अचानक इससे अलग हो गया। इससे पहले 2009 में, चाइना नेशनल मशीनरी एंड इक्विपमेंट इम्पोर्ट एंड एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन (CMEC) ने भी एक परियोजना के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन दो साल के भीतर ही कंपनी ने काम छोड़ दिया।

मनमानी दर पर बिजली बेचना चाहता था चीन

मनमानी दर पर बिजली बेचना चाहता था चीन

वेस्‍ट सेती परियोजना को चीन से पहले ऑस्‍ट्रेलिया को बनाने का काम दिया गया था लेकिन वह भी अलग हो गया। वेस्‍ट सेती प्रॉजेक्‍ट को लेकर चीन और नेपाल के बीच कई मुद्दों पर विवाद हो गया था। इसमें बिजली बनने के बाद उसकी खरीद दर प्रमुख थी। चीनी कंपनी ने नेपाल की ओर से बताए गए बिजली के दर को नाकाफी बताया था लेकिन काठमांडू इसे उचित बता रहा था। बताया जा रहा है कि चीन मनमानी दर पर बिजली बेचना चाहता था लेकिन नेपाल उसके दबाव में नहीं आया जिसके बाद चीनी कंपनी ने इस परियोजना से बाहर निकलना उचित समझा।

नेपाल के पीएम ने दिया धन्यवाद

नेपाल के पीएम ने दिया धन्यवाद

इससे पहले नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने एनएचपीसी के अध्‍ययन करने के प्रस्‍ताव को मंजूरी दे दी थी जिसके तहत 750 मेगावाट के वेस्‍ट सेती स्‍टोरेज हाइड्रोपावर प्रॉजेक्‍ट और 450 मेगावाट के सेती रिवर-6 हाइड्रोपावर प्रॉजेक्‍ट को सुदूरपश्चिम प्रांत में बनाया जाना है। पिछले गुरुवार के समझौता ज्ञापन के बाद प्रधान मंत्री शेर बहादुर देउबा ने कहा, "मेरी हालिया भारत यात्रा के दौरान, प्रधान मंत्रीनरेंद्र मोदी और मैं इस क्षेत्र में पारस्परिक रूप से लाभप्रद द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए बिजली क्षेत्र में सहयोग पर एक विजन स्टेटमेंट पर सहमत हुए। इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी जी की लुंबिनी यात्रा के दौरान, हमने इस मामले पर एक उपयोगी चर्चा की और मैंने वेस्ट सेती हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के विकास के लिए भारत से इच्छुक कंपनियों को आमंत्रित किया।"

बिजली बेच अरबों कमाएगा नेपाल

बिजली बेच अरबों कमाएगा नेपाल

देउबा ने नेपाल के लिए नेपाल में बिजली बाजार को बढ़ावा देने के लिए भारत को धन्यवाद दिया। ऐसा अनुमान है कि इस परियोजना के पूरा होने के बाद यदि नेपाल अपनी पूरी जलक्षमता का उपयोग करके भारत को बिजली बेचे तो वह 2030 में प्रति वर्ष 31,000 करोड़ रुपये तक कमा सकता है जो 2045 तक आगे बढ़कर प्रति वर्ष 1.069 लाख करोड़ रुपये तक जा सकता है।

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