भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 8 अरब डॉलर घटा, स्वर्ण भंडार भी हुआ कम, व्यापार घाटा भी बढ़ा, क्यों ?
दुनियाभर में भारी महंगाई और आर्थिक मंदी की आहट के बीच जापानी रेटिंग एजेंसी नोमुरा ने भारत का ग्रोथ रेट भी घटा दिया है, जिसके बाद सवाल उठ रहे हैं, कि क्या दुनिया के कई देशों के साथ भारत भी आर्थिक मंदी में फंस सकता है।
नई दिल्ली, जुलाई 16: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा 15 जुलाई को जारी आंकड़ों से पता चलता है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 8 जुलाई को खत्म हुए सप्ताह में 8 अरब डॉलर और गिरकर 580.25 अरब डॉलर हो गया, जो 15 महीनों में सबसे कम है। इससे पिछले हफ्ते में भी भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 5 अरब डॉलर कम हो गया था और 1 अप्रैल को समाप्त सप्ताह के बाद से साप्ताहिक गिरावट ने चिंता बढ़ा दी है। इससे पहले एक अप्रैल को भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार में 11.17 अरब डॉलर की गिरावट आई थी।
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भारत का विदेशी मुद्रा भंडार गिरा
आरबीआई द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि, विदेशी मुद्रा भंडार में आने वाली कमी की वजह फॉरेन करेंसी असेट्स (FCA) में आई गिरावट है। आपको बता दें कि, एफसीए, गोल्ड रिजर्व और पूरे रिजर्व का हिस्सा है। एक जुलाई को खत्म हुए सप्ताह में भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार 5.008 अरब डॉलर गिरकर 588.314 अरब डॉलर हो गया था और आठ जुलाई को खत्म हुए सप्ताह में ये और गिरकर 580.25 अरब डॉलर हो गया है। वहीं, सोने का भंडार भी पिछले सप्ताह के 40.42 अरब डॉलर से गिरकर 39.19 अरब डॉलर हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी मुद्रा भंडार में आई गिरावट की बड़ी वजह विदेशी मुद्रा एसेट्स का घटना है, जो भारत के कुल मुद्रा भंडार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं, स्वर्ण मुद्रा भंडार में कमी आने की वजह से भी विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई है।

डॉलर के मुकाबले गिर रहा रुपया
वहीं, डॉलर के मुकाबले भी रुपये का पतन लगातार जारी है और डॉलर के मुकाबले रुरये का एक्सचेंज रेट में तेजी से कमी आ रही है। भारतीय रुपया 15 जुलाई को 79.96 प्रति डॉलर का रिकॉर्ड निचला स्तर था और ये वित्तत वर्ष 2023 के मुकाबले 5 प्रतिशत कम है। दरअसल, वैश्विक आर्थिक मंदी का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है और इसके असर से रुपया भी अछूता नहीं है। वहीं, डॉलर के मुकाबले पहली बार पिछले 20 सालों में यूरो कमजोर हो गया है, लिहाजा उसका असर भी रुपये पर पड़ेगा। वहीं, हाई रिस्क को देखते हुए निवेशकों ने अपना निवेश रुपये से निकालकर डॉलर में करना शुरू कर दिया, जिससे रुपया कमजोर हो रहा है। यूक्रेन संकट की वजह से यूरोप पर गंभीर ऊर्जा संकट मंडरा रहा है और सप्लाई चेन में भी रूकावट आ रही है, जिससे सामानों की कीमत में इजाफा हो रहा है। वहीं, भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है और तेल की ऊंची कीमतों से देश के आयात-निर्यात के गैप को और बढ़ा दिया है और भारत का व्यापार घाटा भी लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे रुपये की परेशानी और भी ज्यादा बढ़ गई है।

भारत का स्वर्ण भंडार भी हुआ कम
आरबीआई द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, आठ जुलाई को खत्म हुए हफ्ते में भारत के स्वर्ण मुद्रा भंडार के मूल्य में भी कमी आई है और यह 1.236 अरब डॉलर घटकर 39.186 अरब डॉलर पर आ गया है। वहीं, आईएमएफ के पास जमा विशेष आहरन अधिकार (एसडीआर) भी 12.6 करोड़ डॉलर कम होकर 18.012 अरब डॉलर हो हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय बैंक तेज गति को नियंत्रित करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है। रुपये की गिरावट को रोकने के लिए पिछले कुछ महीनों में आरबीआई द्वारा विदेशी मुद्रा की भारी बिक्री के बावजूद, रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने के बाद से भारतीय मुद्रा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 4.6 प्रतिशत कमजोर हुई है। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास सहित आरबीआई के अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि, आरबीआई रुपये में व्यवस्थित चाल सुनिश्चित करेगा। 6 जुलाई को, केंद्रीय बैंक ने कहा कि बाहरी झटके के खिलाफ बफर प्रदान करने के लिए उसके पास विदेशी मुद्रा भंडार का "पर्याप्त स्तर" है।

घट गया भारत के विकास दर का अनुमान
वहीं, दुनियाभर में भारी महंगाई और आर्थिक मंदी की आहट के बीच जापानी रेटिंग एजेंसी नोमुरा ने भारत का ग्रोथ रेट भी घटा दिया है, जिसके बाद सवाल उठ रहे हैं, कि क्या दुनिया के कई देशों के साथ भारत भी आर्थिक मंदी में फंस सकता है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मुद्रास्फीति के माहौल में दुनिया भर में मंदी की चिंताओं को देखते हुए, नोमुरा के विश्लेषकों ने भारत के 2023 के विकास दर के अनुमान को घटाकर 4.7% कर दिया है, जो भारत के लिहाज से बड़ा झटका है।

सिर्फ 4.7 प्रतिशत विकास दर का अनुमान
नोमुरा के विश्लेषकों ने भारत के विकास दर के अनुमान को 5.4% से घटाकर 4.7% कर दिया है और नोमुरा ने अनुमान लगाया है, कि अगले साल भारत के विकास की दर धीमी रहेगी। रेटिंग एजेंसी नोमुरा ने जो रिपोर्ट जारी की है, उसमें कहा गया है कि, "उच्च मुद्रास्फीति, सख्त मौद्रिक नीति ,बिजली की कमी और वैश्विक विकास मंदी ने मध्यम अवधि के हेडविंड को जन्म दिया है। नतीजतन, हमने अपने 2023 जीडीपी विकास अनुमान को 5.4% से घटाकर 4.7% कर दिया।" अरूदीप नंदी और सोनल वर्मा इस रिपोर्ट के सह लेखके हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, नोमुरा ने ये अनुमान विश्व बाजार और कई देशों में आई आर्थिक मंदी और अलग अलग देशों के सेंट्र्ल बैंकों के द्वारा ब्याज दरों में किए गये इजाफे को ध्यान में रखकर लगाया है और भारत के विकास दर की अनुमानित रफ्तार को कम करने आका है। आपको बता दें कि, इस वक्त वैश्विक अस्थिरता की वजह से दुनिया के कई देश आर्थिक मंदी और आर्थिक सुस्ती का सामना कर रहे हैं और कई देशों के आर्थिक मंदी में जाने की आशंका है।

दुनिया में उठाए जा रहे हैं कई कदम
ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, ये हफ्ता दुनियाभर के केन्द्रीय बैंकों के लिए काफी व्यस्त रहा है, क्योंकि दुनिया भर में एक दर्जन से अधिक देशों के केन्द्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर दी है, जिससे हंगरी में 200 अंक,पाकिस्तान में 125 आधार अंक और अन्य आठ देशों में 50 या 100 के बीच अंक बढ़े हैं। वॉल स्ट्रीट पर मंदी के आह्वान जोर से गाए जा रहे हैं, लेकिन विश्व अर्थव्यवस्था बनाने वाले कई घरों और व्यवसायों के लिए मंदी पहले से ही आ चुकी है। छोटे व्यवसाय के मालिकों, उपभोक्ताओं और अन्य लोगों के बीच की चिंताओं को तथाकथित मिसरी इंडेक्स द्वारा चित्रित किया गया है, जो बेरोजगारी और मुद्रास्फीति दर को दिखाते हैं। कोरोना वायरस के हर लहर ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को पटरी से उतानरे का काम किया। वहीं, साल 2022 की दूसरी छमाही को लेकर भी डर है, कि आपूर्ति तनाव प्रभावित हो सकती है और मजदूर वर्ग गंभीर प्रभावित होंगे।












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