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यूक्रेन में रूस के सारे हथियार फेल, अब भारतीय 'ब्रह्मास्त्र' चलाएंगे पुतिन! क्यों ब्रह्मोस को रोकना है असंभव?

Russia to Buy Brahmos: यूक्रेन युद्ध के बीच भारत, रूस को ब्रह्मोस मिसाइलें बेचने पर विचार कर रहा है। ये रिपोर्ट उस वक्त आई है, जब यूक्रेन में रूस के ज्यादातर हथियार अमेरिकी डिफेंस सिस्टम के सामने फेल हो चुके हैं। वहीं, अब तक का इतिहास ये रहा है, कि रूस ने हमेशा से भारत को हथियार बेचा है और ये पहली बार है, जब रूस, भारत से हथियार खरीदने वाला है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर भारत रूस को ब्रह्मोस मिसाइल बेचता है, तो ये अमेरिका और नाटो देशों के लिए बहुत बड़ी चिंता की बात होगी, क्योंकि यूक्रेन में जो एयर डिफेंस सिस्टम अमेरिका और नाटो की तरफ से तैनात किए गये हैं, उसके पास ब्रह्मोस मिसाइल को रोकने की क्षमता नहीं है और जिन एयर डिफेंस सिस्टम के पास ब्रह्मोस को रोकने की क्षमता है, वो काफी एडवांस क्वालिटी के हैं, जिनकी तैनाती यूक्रेन में संभव ही नहीं है और दुनिया में सिर्फ अमेरिका के पास ही ब्रह्मोस मिसाइल को रोकने की क्षमता है, चीन के पास भी ये क्षमत नहीं है।

Russia to Buy Brahmos

रूस को ब्रह्मोस बेच सकता है भारत

द वीक की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रह्मोस एयरोस्पेस के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर अतुल दिनकर राणे ने कहा है, कि उनकी कंपनी लगातार हवा से प्रक्षेपित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के लिए, रूस को एक संभावित बाजार के रूप में देख रही है।

उन्होंने दावा किया, कि रूस के पास वर्तमान में ब्रह्मोस जैसा कोई भी मिसाइल सर्विस नहीं है।

द वीक के मुताबिक, राणे ने कहा, कि "अगर उन्होंने इसे (यूक्रेन युद्ध से पहले) खरीदा होता, तो उनके पास मौजूदा स्थिति में उपयोग करने के लिए बहुत सी चीजें होती।"

उन्होंने कहा, "यूरोप में मौजूदा स्थिति खत्म होने के बाद हमें रूस से कुछ ऑर्डर मिल सकते हैं, खासकर हवा से लॉन्च होने वाले ब्रह्मोस मिसाइल के लिए।"

रूस संभावित रूप से ब्रह्मोस का इस्तेमाल अपनी पी-800 ओनिक्स मिसाइल, ब्रह्मोस के सोवियत युग के पूर्ववर्ती की तरह कर सकता है। जबकि P-800 ओनिक्स को एक जहाज-रोधी मिसाइल के रूप में डिज़ाइन किया गया है, इसका उपयोग सीरिया और यूक्रेन में जमीनी लक्ष्यों के खिलाफ किया गया था।

जबकि ब्रह्मोस और ओनिक्स की प्रदर्शन विशेषताएं समान हैं। रूस के रक्षा उद्योग में कम फंडिंग, भ्रष्टाचार और पश्चिमी प्रतिबंध, रूस को भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के लिए मजबूर कर सकता है।

अगर यूक्रेन में ब्रह्मोस का इस्तेमाल हुआ तो...

एशिया टाइम्स के मुताबिक, यदि रूस यूक्रेन में ब्रह्मोस मिसाइल का उपयोग करता है, तो पश्चिमी देशों के पास ब्रह्मोस मिसाइल का मुकाबला करने के लिए, कोई भी हथियार नहीं होगा। स्टॉर्म शैडो जैसी पश्चिमी क्रूज़ मिसाइलें सबसोनिक डिज़ाइन की हैं, जो ब्रह्मोस मिसाइल को रोकने की काबिलियत नहीं रखती हैं।

यूक्रेन में रूस की बहुप्रचारित किंजल मिसाइल फेल हो चुकी है और रूस को अपने इस मिसाइल से काफी ज्यादा उम्मीदें थीं, जिसके बाद रूस को भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। हालांकि, अभी तक ये तय नहीं है, कि क्या यूक्रेन युद्ध के समय भारत सरकार, ब्रह्मोस कंपनी को रूस को ब्रह्मोस मिसाइल बेचने की इजाजत देगी या नहीं? क्योंकि ऐसा करने पर भारत को पश्चिमी देशों से गुस्से का सामना करना पड़ सकता है।

मॉडर्न वॉर इंस्टीट्यूट के लिए मई 2023 के एक लेख में, पीटर मिशेल ने आलोचनात्मक रूप से किंजल की तुलना विस्फोटकों से भरे एक विशाल लॉन डार्ट से की थी, क्योंकि ये मिसाइल एक ठोस-ईंधन रॉकेट मोटर का उपयोग करती है, जिसे संभवतः उड़ान के दौरान धीमा नहीं किया जा सकता है।

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रूस को यूक्रेन युद्ध में काफी नुकसान

एशिया टाइम्स की अप्रैल 2022 की एक रिपोर्ट में आशंका जताई गई थी, कि भारत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना, चौथी सबसे बड़ी वायु सेना और सातवीं सबसे बड़ी नौसेना के साथ एक महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति है, लेकिन यह दुनिया का सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वाला देश भी है और भारत, अपने 60 प्रतिशत हथियार उपकरण रूस से खरीदता है।

लेकिन, यूक्रेन में रूस के भारी नुकसान से यह संभावना बढ़ गई है, कि रूस अपने युद्ध के नुकसान की भरपाई के लिए भारत के कुछ हथियारों के ऑर्डर को कैंसिल कर सकता है या फिर फिलहाल के लिए टाल सकता है।

रूस के रक्षा उद्योग पर पश्चिमी प्रतिबंधों ने भारत के दीर्घकालिक हथियार आपूर्तिकर्ता के रूप में रूस की व्यवहार्यता और विश्वसनीयता पर भी संदेह पैदा कर दिया है।

इसी महीने मॉस्को टाइम्स ने रिपोर्ट दी थी, कि रूसी रक्षा कंपनियां कुछ एशियाई ग्राहकों से बेचे गये हथियारों को वापस खरीद रही है, ताकि उसका इस्तेमाल रूस के लिए किया जा सके।

उदाहरण के लिए, रूसी टैंक निर्माता यूरालवगोनज़ावॉड ने दिसंबर 2022 से म्यांमार की सेना से अपने 24 मिलियन अमेरिकी डॉलर के उत्पादों का आयात किया। इसके साथ ही, रूसी कंपनी ने म्यांमार की सेना से 6 हजार सैन्य दूरबीन और 200 कैमरे भी खरीदे हैं, जिनका उपयोग रूस के पुराने टी -72 को आधुनिक बनाने के लिए किया जा सकता है, जो अब भंडारण में हैं।

मॉस्को टाइम्स की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, कि अगस्त और नवंबर में एक रूसी मिसाइल निर्माता ने भारतीय रक्षा मंत्रालय (एमओडी) से एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों पर 150,000 डॉलर मूल्य की नाइट-विज़न साइटें खरीदीं हैं। जबकि सीमा शुल्क डेटा से पता चलता है, कि उन उपकरणों के पार्ट्स को रूस को वापस किए गये, क्योंकि उनमें खराबियां थीं, लेकिन उन उपकरणों को फिर से भारत भेजने की कोई रिपोर्ट नहीं है।

ब्लूमबर्ग ने अप्रैल 2023 में बताया था, कि रूसी हथियारों के लिए 2 अरब डॉलर से अधिक का भारतीय भुगतान एक साल से अटका हुआ है। ब्लूमबर्ग का कहना है, कि रूस ने 10 अरब डॉलर मूल्य के एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली के स्पेयर पार्ट्स के लिए ऋण की आपूर्ति बंद कर दी है, जिनकी अभी तक डिलीवरी नहीं हुई है।

इसमें यह भी जिक्र किया गया है, कि भारत पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की वजह से रूस को अमेरिकी डॉलर में भुगतान नहीं कर सकता है, जबकि रूस अपनी एक्सचेंज रेट में अस्थिरता के कारण भारतीय रुपये को स्वीकार करने से इनकार करता रहा है।

हालाँकि, डिफेंस न्यूज़ ने मई 2023 में बताया था, कि भारत और रूस कुछ रूसी उपकरणों और स्पेयर पार्ट्स के भारत में स्थानीय उत्पादन की योजना को औपचारिक रूप देते हुए डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट पर विलंबित भुगतान को हल करने पर सहमत हुए हैं।

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