हिंद महासागर में चीनी पनडुब्बियों का काल! भारत को विनाशक Sonobuoys देगा US, क्यों ड्रैगन को याद आ जाएगी नानी!

Defence News: चीनी नौसेना हिंद महासागर में बंदरगाहों तक पहुंच हासिल करके मलक्का जलडमरूमध्य की भौगोलिक मुश्किलों को दूर करने की दिशा में काम कर रही है, जबकि भारतीय नौसेना, अमेरिका से एंटी-सब सोनोबॉय खरीदकर अपनी पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है।

भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के वॉशिंगनट दौरे के दौरान अमेरिका ने भारत को एंटी-सबमरीन वारफेयर सोनोबॉय बेचने की मंजूरी दे दी है। इन एडवांस सोनोबॉय को पोसाइडन P-8I विमान और MH-60R सीहॉक हेलीकॉप्टरों से तैनात किया जा सकता है। अमेरिका ने भारत को इस बिक्री को मंजूरी दे दी है, जिसकी अनुमानित कीमत 52.8 मिलियन डॉलर है।

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इस सौदे को मंजूरी ऐसे समय मिली है, जब भारत और अमेरिका ने गैर-बाध्यकारी आपूर्ति सुरक्षा व्यवस्था (SOSA) पर हस्ताक्षर किए हैं। SOSA के माध्यम से, दोनों देश राष्ट्रीय रक्षा को बढ़ावा देने वाली वस्तुओं और सेवाओं के लिए पारस्परिक प्राथमिकता समर्थन प्रदान करने पर सहमत हुए हैं। यह व्यवस्था दोनों देशों को अप्रत्याशित आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों को हल करने और राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक टेक्नोलॉजिकल संसाधन प्राप्त करने में सक्षम बनाएगी।

हिंद महासागर में चीन को याद आएगी नानी!

चीन के बढ़ते पनडुब्बी बेड़े और हिंद महासागर में उसकी गतिविधियों ने भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है, जिसके कारण उसे पनडुब्बी रोधी उपायों को बढ़ाने की आवश्यकता है। चीनी नौसेना, जो वर्तमान में 370 जहाजों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है, वो साल 2025 तक अपने पनडुब्बी बेड़े को 65 और 2035 तक 80 यूनिट तक बढ़ाने की योजना बना रही है। इस विस्तार ने भारत को अपनी नौसेना सुरक्षा को मजबूत करने के लिए प्रेरित किया है।

भारत और अमेरिका के बीच सोनोबॉय को लेकर हुआ समझौता, भारत को हाल ही में मिले एमएच-60आर हेलीकॉप्टरों के साथ एकीकृत किया जाएगा। यह एकीकरण भारतीय महासागर क्षेत्र में भारतीय नौसैनिक युद्ध समूहों की ऑपरेशनल पहुंच का विस्तार करेगा। इसके अलावा, भारत ने अमेरिका से इंजीनियरिंग और तकनीकी सहायता के साथ-साथ अन्य रसद सहायता का अनुरोध भी किया है।

भारत अपनी पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमताओं को बढ़ाने की कोशिशों में एमएच-60आर हेलीकॉप्टर और एमक्यू-9बी सीगार्डियन ड्रोन हासिल करना शामिल है। ये ड्रोन दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने के लिए सोनोबॉय तैनात कर सकते हैं। इस रणनीतिक कदम का मसद क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी का मुकाबला करना है।

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भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारियां

अमेरिका-भारत आपूर्ति सुरक्षा व्यवस्था (SOSA) भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं को और ज्यादा मदद प्रदान करेगी। एसओएसए आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान या आपात स्थितियों के दौरान वस्तुओं और सेवाओं के लिए पारस्परिक प्राथमिकता सहायता प्रदान करता है। भारत अब इस व्यवस्था के तहत अमेरिका का अठारहवां भागीदार है।

बहुत आसान शब्दों में समझें, तो इस समझौता होने के बाद किसी भी आपातकाली परिस्थिति, जैसे युद्ध के दौरान जरूरी हथियार तत्काल अमेरिका से खरीद सकता है।

भारत का अमेरिका से सोनोबॉय अधिग्रहण, उसकी क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के बीच अपने समुद्री हितों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हैं। अपनी नौसेना को मजबूत करके, भारत का लक्ष्य रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

इन सोनोबॉय का अधिग्रहण भारत की समुद्री निगरानी और रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण कदम है। जैसे-जैसे क्षेत्रीय गतिशीलता विकसित होती है, शक्ति संतुलन बनाए रखने और नेशनल सिक्योरिटी सुनिश्चित करने के लिए ऐसी प्रगति महत्वपूर्ण होती है।

इसके अलावा भी भारत ने अमेरिका से AN/SSQ-53G हाई-एल्टीट्यूड एंटी-सबमरीन वारफेयर (HAASW) सोनोबॉय, AN/SSQ-62F HAASW सोनोबॉय और AN/SSQ-36 सोनोबॉय खरीदने की मांग की है।

सोनोबॉय पानी के नीचे की ध्वनिकी को बढ़ाते हैं और पनडुब्बियों की सटीक स्थिति और उसकी रेंज का पता लगाते हैं, जिससे पनडुब्बियों की सटीक मौजूदगी, उनका लक्ष्य और उनकी दिशा का पता चल जाता है। इसके अलावा, ये सोनार प्रसार और ध्वनिक रेंज भविष्यवाणी पर समुद्री जल तापमान के स्थानीय प्रभावों का मूल्यांकन कर सकते हैं। इन्हें रोटरी-विंग और फिक्स्ड-विंग एयरक्राफ्ट और सतह के जहाजों के डेक दोनों से लॉन्च किया जा सकता है।

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भारतीय नौसेना की पनडुब्बी रोधी क्षमताएं

चीन, हिंद महासागर क्षेत्र में ऐसे ठिकानों की तलाश कर रहा है, जो उसे अपनी पनडुब्बियों की पहुंच बढ़ाने में मदद करेंगे। पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह, श्रीलंका में हंबनटोटा और बांग्लादेश में पनडुब्बी अड्डा, ये सभी भारत के नाक के नीचे हैं और चीन इन जगहों पर पैर जमाने की कोशिश कर रहा है।

इसके अलावा, PLA के पास जिबूती में एक सपोर्ट बेस है, जो चीन को "अधिक दूरी पर सैन्य शक्ति को प्रोजेक्ट करने और बनाए रखने" की क्षमता देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

PLA ने 300 मीटर लंबा बर्थिंग एरिया भी बनाया है, जिसमें एयरक्राफ्ट कैरियर, पनडुब्बी और उभयचर जहाज जैसे बड़े जहाज रखे जा सकते हैं। विशेषज्ञ यह भी बताते हैं, कि चीन सतह के जहाजों और पनडुब्बियों दोनों के लिए ड्राईडॉक और मरम्मत केन्द्र जैसी अतिरिक्त सुविधाएं बना सकता है।

जिससे निपटने के लिए भारतीय नौसेना लगातार अपनी पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमताओं का निर्माण कर रही है।

भारतीय नौसेना अमेरिका से जल्द ही MQ-9B सीगार्डियन ड्रोन भी हासिल करेगी, जो दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए सोनोबॉय को ले जाने, छोड़ने और निगरानी करने में सक्षम है। इसे "हंटर-किलर" के नाम से जाना जाता है, जो दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने के लिए सोनोबॉय का एक नेटवर्क तैनात कर सकता है, जो समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्ध में एक महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है।

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