इमरान खान ने अफगानिस्तान को इशारों में धमकाया, तालिबान के मसले का बताया सिर्फ 'एक समाधान'
इस्लामाबाद, 29 जुलाई: अफगानिस्तान में तालिबान की बढ़त के साथ ही पाकिस्तान के भी हौसले बढ़ते जा रहे हैं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान इशारों में अफगानिस्तानी सरकार के सामने तालिबान का महिमामंडन करते हुए सुलह की शर्तें थोपने लगे हैं और लगे हाथ अमेरिका को भी लताड़ना शुरू कर दिया है। शायद जिस तरह से चीन, अफगानिस्तान के मसले में दखल देने लगा है और तालिबान से उसकी साठगांठ हो रही है, इमरान का बड़बोलापन और ज्यादा बढ़ गया लगता है। अफगानिस्तान से अमेरिका के निकलने की तुलना उन्होंने वियतनाम युद्ध से करनी भी शुरू कर दी है।

'20 साल अमेरिकी सेना के साथ रहकर देख लिया'
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा है कि अफगानिस्तान 20 साल तक अमेरिकी सेना के साथ रहकर देख लिया है। उन्होंने इशारों में अफगानिस्तान से कहा है कि अब उसके पास सिर्फ एक ही विकल्प बचा है कि तालिबान के साथ सुलह कर ले और इसी में उसकी भलाई है। हालांकि, साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि पाकिस्तान तालिबान का कोई प्रवक्ता नहीं है। इमरान ने अफगानिस्तान के सामने (तालिबान की ओर से) यह शर्त अफगान मीडिया के सामने ही रखी है। डॉन न्यूज के मुताबिक इसे गुरुवार को दिखाया गया है। एक दिन पहले ही पाकिस्तानी पीएम ने तालिबान को सामान्य नागरिक बताया था और कहा था कि वह कोई मिलिट्री आउटफिट नहीं है, जिसे उनका देश दबोच सकता है।

हम तालिबान के प्रवक्ता नहीं हैं- इमरान
इमरान खान ने अफगानी मीडिया से अपनी ताजा बातचीत में कहा है कि 'तालिबान क्या कर रहा है या क्या नहीं कर रहा है, उससे हमारा कोई वास्ता नहीं है। न हम जिम्मेदार हैं और न ही हम तालिबान के प्रवक्ता हैं।' उन्होंने ये भी कहा कि पाकिस्तान को अफगानिस्तान में गृहयुद्ध करवाने में कोई इच्छा नहीं है। इमरान का कहना है कि 'अफगानिस्तान पर कब्जा करने के लिए किसी का समर्थन करने में पाकिस्तान की क्या दिलचस्पी हो सकती है? अब, और खासकर के मेरी सरकार में, हम मानते हैं कि अफगानिस्तान को कभी भी बाहर से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। अब हमारा पसंदीदा कोई नहीं है।' उन्होंने अपनी बात में यह भी जोड़ा कि अफगानिस्तान में जो भी सत्ता में आए पाकिस्तान उसके साथ अच्छा संबंध रखेगा।

तालिबान की ओर से अफगानिस्तान को धमका रहे इमरान!
इसके साथ ही उन्होंने अफगान सरकार से धमकी भरे अंदाज में दो टूक कह दिया, 'अब आपके पास दो विकल्प हैं। अफगानिस्तान में शांति लाने के लिए 20 साल तक सैन्य समाधान निकालने की कोशिश की और वह फेल हो गया।' उन्होंने कहा कि अगर अफगानिस्तान चाहता है कि तालिबान सरकार का हिस्सा न बने तो वह अमेरिकी सेना के साथ रह सकता है। 'लेकिन, सभी जानते हैं कि अब यह मुमकिन नहीं है। दूसरा विकल्प है तालिबान और सरकार में राजनीतिक सुलह और एक विशेष सरकार बनाने का और सिर्फ यही एक समाधान है।' दरअसल, चीन की सरकार मीडिया ने बुधवार को ही एक तस्वीर जारी की है, जिसमें तालिबान का को-फाउंडर मुल्ला अब्दुल गनी बरादर और चीन के विदेश मंत्री वैंग यू एक साथ नजर आ रहे हैं। यह तस्वीर तियांजी में हुई बैठक के दौरान की है। लगता है कि इस तस्वीर ने तालिबान से ज्यादा इमरान का हौसला बुलंद कर दिया है।

चीन-तालिबान की दोस्ती तो अमेरिका को भी आंख दिखाने लगे इमरान
इमरान खान ने अफगानिस्तान में अमेरिका और नाटो की नाकामी को लेकर पाकिस्तान पर लग रहे आरोपों से पल्ला झाड़ते हुए सीधे अमेरिका को लताड़ना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा है, 'यह ठीक वैसा ही है जैसा अमेरिकियों ने वियतनाम में किया था। जब वो वियतनाम में नाकाम हुए, तो उन्होंने कंबोडिया या लाओस के विद्रोहियों को दोषी ठहरा दिया।' एक दिन पहले ही पीबीएस न्यूजआवर के साथ इंटरव्यू में उन्होंने तालिबान को संरक्षण देने पर पाकिस्तान के पक्ष में दलीलें दी थीं। उन्होंने कहा था, '5,00,000 लोगों का कैंप है, 1,00,000 लोगों का कैंप है। और तालिबान कोई सैन्य संगठन नहीं है, वे आम नागरिक हैं। और अगर इन कैंपों में कुछ नागरिक हैं, पाकिस्तान से कैसे उम्मीद की जाती है कि वह इन लोगों को दबोच ले? आप उसे पनाहगाह कैसे कह सकते हैं ?'
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