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Pakistan: पाकिस्तान को 24वीं बार बेलऑउट पैकेज देगा IMF, क्या आर्मी को पैसे डकारने से रोक पाएंगे शहबाज शरीफ?

Pakistan-IMF Deal: पाकिस्तान सरकार ने राहत की सांस ली है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने 12 सितंबर को घोषणा की है, कि उसके बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की 25 सितंबर को बैठक होगी, जिसमें पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को स्थिर करने के लिए 7 अरब डॉलर के पैकेज पर चर्चा की जाएगी।

IMF ने कहा है, कि ये सात अरब डॉलर का नया कर्ज अगले तीन सालों में पाकिस्तान को अलग अलग पैकेज में मिलेंगे और उसने इशारा दिया है, कि पाकिस्तान को ये बेलऑउट पैकेज मिलने को लेकर सकारात्मक फैसला लिया जाएगा। यानि, करीब करीब ये तय हो गया है, कि पाकिस्तान को IMF से अगले तीन सालों में 7 अरब डॉलर का राहत पैकेज मिलेगा।

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पाकिस्तान को 7 अरब डॉलर का बेलऑउट पैकेज

ये 24वीं बार है, जब IMF से पाकिस्तान को भारी-भरकम बेलाऑउट पैकेज मिलने वाला है। रिपोर्ट्स बताती हैं, कि आईएमएफ स्टाफ और पाकिस्तान सरकार, जुलाई में एक समझौते पर पहुंच गए थे, लेकिन फंड आगे नहीं बढ़ सका क्योंकि IMF इस बात का इंतजार कर रहा था, पाकिस्तान सरकार कुछ और देशों से कम से कम 2 अरब डॉलर की और व्यवस्था करे, ताकि IMF को इस बात का विश्वास हो सके, कि पाकिस्तान के ऊपर उसके पारंपरिक दाताओं का विश्वास कायम है।

इसके अलावा, यह आईएमएफ स्टाफ-पाकिस्तान समझौते के समय दी गई प्रतिबद्धताओं के कायम रहने का इंतजार कर रहा था। जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, कुछ पाकिस्तानी मंत्रियों ने आईएमएफ पर पाकिस्तान को डिफॉल्ट में धकेलकर राजनीतिक एजेंडा चलाने का आरोप लगाना शुरू कर दिया, लेकन प्रसिद्ध पाकिस्तानी टिप्पणीकार खुर्रम हुसैन ने 12 सितंबर को एक लेख में लिखा, कि आईएमएफ से पाकिस्तान को लोन इसलिए नहीं मिल रहा था, क्योंकि वो दो शर्तों को मान नहीं रहा था।

हाल के सप्ताहों में, दो रेटिंग एजेंसियों- मूडीज और फिच- ने पाकिस्तान की ऋण-योग्यता स्थिति को बढ़ा दिया है। पाकिस्तानी स्टॉक एक्सचेंजों के माध्यम से आने वाली आईएमएफ फंडिंग में वृद्धि हुई है। इससे अस्थायी राहत मिल रही है, लेकिन पाकिस्तान के सामने असली मुद्दा यह है, कि क्या वह सामाजिक और राजनीतिक रूप देश को स्थिरता में लाने के लिए तैयार है?

क्या पाकिस्तानी सेना अपने बैरेक में लौटेगी?

पाकिस्तान की स्थिरता के लिए एक शर्त यह है, कि उसकी सेना अपनी भारत विरोधी नीति को त्याग दे और देश के राजनीतिक और व्यापारिक अभिजात वर्ग को जिम्मेदारी से पेश आना चाहिए। अभी तक इस बात का कोई सबूत नहीं हैं, कि सेना भारत के प्रति अपना रुख बदलने को तैयार है और जब तक वह ऐसा नहीं करती, देश की अर्थव्यवस्था अस्थिर बनी रहेगी।

पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता अर्थव्यवस्था में अपने योगदान के बारे में बड़े-बड़े दावे कर सकते हैं, जैसा कि 5 सितंबर को इंटर-सर्विसेज प्रेस रिलेशंस (आईएसपीआर) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी के एक भाषण में देखा गया, लेकिन ये दावे वास्तव में खोखले हैं।

जब उनसे पूछा गया, कि क्या पाकिस्तानी सेना को पाकिस्तानी लोगों की मुश्किल आर्थिक स्थितियों के बारे में पता है, तो चौधरी ने कहा कि सेना के अधिकारी और जवान मध्यम और निम्न वर्ग से आते हैं और इसलिए वे आम लोगों की मुश्किलों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। लेकिन, उनका ये बयान बकवास है, क्योंकि पाकिस्तानी सेना देश का सबसे बड़ा व्यापारिक और औद्योगिक समूह बन गई है, और इसकी सभी गतिविधियां सेना के अधिकारियों और जवानों, सेवारत और सेवानिवृत्त दोनों के लाभ के लिए हैं।

पाकिस्तानी जनरलों को यह बात बिलकुल भी समझ में नहीं आती कि देश के आर्थिक और व्यावसायिक जीवन में सेना की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो यह लोगों का खून चूसने वाली जोंक की तरह ही काम करेगी। पाकिस्तानी लोगों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है, कि आजादी के बाद से ही सेना ने लगातार यह नैरेटिव गढ़ा है कि वह अपने शाश्वत दुश्मन भारत से पाकिस्तान की अंतिम रक्षक है। इसलिए, इस नैरेटिव से पोषित लोग, देश के आर्थिक और व्यावसायिक जीवन में सेना की भूमिका को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। इसीलिए, आईएमएफ को शर्त यह रखनी चाहिए, कि सेना पाकिस्तान के वाणिज्य और अर्थव्यवस्था पर अपनी पकड़ खत्म करे। तभी देश का भला हो सकता है, अन्यता बार बार IMF को लोन देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

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