आर्कटिक में बर्फ पिघलना अच्छी बात, बनेंगे व्यापार के नए रास्ते- अमरीका
जलवायु परिवर्तन पर अमरीका की आपत्तियों की वजह से फ़िनलैंड में चल रहे आर्कटिक सम्मेलन के सामने मुश्किल स्थिति आ गई है.
सम्मेलन में मौजूद आर्कटिक देशों के प्रतिनिधियों के अनुसार तमाम आर्कटिक देश बैठक के बाद एक संयुक्त बयान जारी करना चाहते थे लेकिन अमरीका की आपत्तियों के चलते वो ऐसा नहीं कर पाए.
साल 1996 में बनी आर्कटिक समिति में ऐसा पहली बार हुआ जब उन्होंने अपना साझा बयान जारी करने से इंकार कर दिया.
फ़िनलैंड के एक प्रतिनिधि टिमो कोवुरोवा ने कहा, "बाकी देशों को ऐसा लगता है कि वो जलवायु परिवर्तन विचार को कड़े शब्दों में नहीं रख सकते."
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह चिंता ज़ाहिर की जा रही है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से आर्कटिक क्षेत्र का तापमान बाकी दुनिया के मुक़ाबले दोगुनी रफ़्तार से बढ़ रहा है.
उत्तरी फ़िनलैंड के रोवानिमी में आयोजित इस सम्मेलन में सोमवार को अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने भाषण दिया था.
अपने भाषण में पोम्पियो ने आर्कटिक समुद्र में बर्फ़ के पिघलने पर चिंता जाहिर करने की बजाय उसे अच्छा और स्वागतयोग्य संकेत बताया.
उन्होंने कहा, "समुद्र में जमी बर्फ़ के पिघलने से व्यापार करने के लिए नए रास्ते खुलेंगे. इससे पश्चिमी देशों और एशिया के बीच समुद्र से यात्रा करना आसान हो जाएगा और ज़्यादा से ज़्यादा 20 दिन में हम एक छोर से दूसरे छोर पर पहुंच जाएंगे."
पोम्पियो ने साथ ही कहा कि आर्कटिक समुद्र पर बनने वाले यह व्यापारिक मार्ग 21वीं सदी के सुएज़ और पनामा कनाल बन सकते हैं.
इसके साथ ही उन्होंने सभी को हैरान करते हुए मंगलवार को जर्मन की चांसलर एंगेला मर्केल के साथ होने वाली अपनी मुलाक़ात भी रद्द कर दी.
पर्यावरण की चुनौती
तमाम वैज्ञानिक और पर्यायवरणविद आर्कटिक में बर्फ के लगातार पिघलने को लेकर चेतावनी देते रहे हैं. इस कारण न केवल वहां रहने वाले पोलर बियर और समुद्री जीवों पर ख़तरा मंडरा रहा है, बल्कि इससे समुद्र का जलस्तर भी बढ़ रहा है और समुद्रतटीय इलाकों के पानी में डूबने संभावनाएं भी बढ़ रही हैं.
इसके साथ ही वो इस बात पर भी चेतावनी देते रहे हैं कि अगर आर्कटिक के रास्ते अधिक यातायात होगा तो इस इलाके में प्रदूषण बढ़ जाएगा जो आर्कटिक में रहने वाले जीवों के लिए नुकसानदायक साबित होगा.
आर्किटक कउंसिल में अमरीका, कनाडा, रूस, फ़िनलैंड, नॉर्वे, डेनमार्क, स्वीडन और आइसलैंड शामिल हैं. ये तमाम देश हर दूसरे साल में एक सम्मेलन कर आर्कटिक से जुड़ी आर्थिक और पर्यायवरण संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करते हैं.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि अमरीका ने इस सम्मेलन के संयुक्त बयान को इसलिए रोक दिया क्योंकि इसमें जलवायु परिवर्तन की वजह से आर्कटिक को बहुत अधिक नुकसान पहुंचने के बारे में बताया जाना था.
साल 2017 में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से अमरीका से अलग कर दिया था, इस समझौते में कुल 200 देश शामिल थे.
आर्कटिक सम्मेलन में पोम्पियों ने चीनऔर रूस पर कड़ा रुख अपनाते हुए आरोप लगाया कि ये दोनों देश आर्कटिक क्षेत्र में लगातार घुसपैठ कर रहे हैं.
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