IC 814: The Kandahar Hijack: भारतीय विमान का अपहरण क्या एक डिप्लोमेटिक नाकामी थी, शो से क्या पता चला?
IC 814: The Kandahar Hijack: कंधार अपहरण भारतीय विमानन इतिहास में सबसे लंबा अपहरण था और उसके बाद फिर किसी भारतीय विमान का अपहरण नहीं हुआ। लेकिन सवाल अभी भी बना हुआ है, क्या इसे टाला नहीं जा सकता था?
एक क्लासिक जियो-पॉलिटिकल नेटफ्लिक्स सिरीज, जो विभिन्न देशों - सऊदी अरब, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के साथ हमारे संबंधों को दर्शाता है। अजीब बात यह है, कि यात्रियों को बचाने में अफगानिस्तान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन उन्होंने काठमांडू की फ्लाइट को क्यों चुना? क्या आतंकवादियों को पता था, कि इस विशेष हवाई अड्डे पर सुरक्षा में कमी थी और इसलिए उन्हें हथियार लेकर फ्लाइट में सवाल होना आसान लगा।

यह अफगानिस्तान ही था, जिसने भारतीय राजनयिकों के साथ आतंकवादियों के साथ यह समझौता किया था, कि अफगानिस्तान के कंधार की धरती पर किसी की जान नहीं जाएगी।
कैप्टन देवी शरण और श्रींजय चौधरी की पुस्तक 'फ्लाइट इनटू फियर' के आधार पर बनाई गई ये नेटफ्लिक्स सिरीज इस पूरे घटना के मर्म को भी दर्शाती है और दिल्ली के वार रूम के भीतर जटिल कूटनीति और कंधार के वार्ता स्टेशन पर तनावपूर्ण आदान-प्रदान को उजागर करती है।

आतंकवादियों ने क्या सौदा किया था?
24 दिसंबर 1999 को पांच नकाबपोश आतंकवादियों ने काठमांडू के त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से नई दिल्ली के लिए उड़ान भरने के 40 मिनट बाद विमान का अपहरण कर लिया। अपहरणकर्ताओं ने विमान को दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में कई स्थानों पर उतरने के लिए मजबूर किया, इससे पहले कि सात दिन बाद अफगानिस्तान के कंधार में संकट का समाधान हो पाए।
अपहरणकर्ताओं का सिर्फ एक ही मकसद था और वह था सबसे खतरनाक आतंकवादियों में से एक मौलाना मसूद अजहर को छुड़ाना। मसूद चार साल से भारत की जेल में बंद रहा। नेटफ्लिक्स के शो में बताया गया है, कि मसूद को यकीन था कि उसे रिहा कर दिया जाएगा और यही वजह थी कि IC 814 को हाईजैक कर लिया गया।
पांचों अपहरणकर्ताओं की पहचान इब्राहिम अतहर, शाहिद अख्तर सईद, सनी अहमद काजी, मिस्त्री जहूर इब्राहिम और शाकिर के रूप में हुई थी। वे हरकत-उल-मुजाहिदीन (एचयूएम) नामक पाकिस्तान स्थित इस्लामी आतंकवादी समूह से जुड़े थे।

क्या कंधार अपहरण एक कूटनीतिक नाकामी थी?
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भारत की सरकार ने आतंकवादियों के साथ लगातार बातचीत की। यह किसी के लिए भी आसान नहीं था, भारतीय राजनयिकों, सरकार, आईसी 814 में फंसे यात्रियों, उनके परिवारों, कैप्टन और उनके चालक दल के लिए, हर किसी के लिए ये स्थिति काफी मुश्किल थी।
दो विचारधाराएं थीं, एक ने कहा कि हमें आतंकवादियों को छोड़ देना चाहिए और यात्रियों को बचा लेना चाहिए। जबकि एक और विचारधारा थी, जो महसूस करती थी कि ऐसे खतरनाक आतंकवादियों को क्यों छोड़ा जाए?
विजय वर्मा अभिनीत नेटफ्लिक्स के 'आईसी 814: द कंधार हाईजैक' शो में दिखाया गया है, कि एक अनुभवी सेना अधिकारी ने बताया, कि उसके बेटे ने आतंकवादियों को पकड़ने के लिए देश के लिए अपनी जान दे दी। सशस्त्र बलों के कई भारतीय सैनिक थे जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर दी, ताकि आतंकवादी भारत को कोई नुकसान न पहुंचा सकें।
अगर हम निष्पक्ष होकर देखें, तो कई लोग कह सकते हैं कि आईसी 814 के यात्रियों को बचाने के लिए खतरनाक आतंकवादियों को रिहा करना एक बुद्धिमानी भरा कदम नहीं था। लेकिन स्थिति वास्तव में मुश्किल थी और निष्कर्ष पर पहुंचने में कई दिन लग गए।
एक और विचारधारा थी, जो महसूस करती थी कि भारत सरकार को आतंकवादी को रिहा करना चाहिए और यात्रियों को बचाना चाहिए। कैदियों को रिहा करने पर मतभेदों के बावजूद, सरकार पर बातचीत करने का भारी दबाव था। उस वक्त अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार थी, जिसने भारतीय अधिकारियों और अपहरणकर्ताओं के बीच बातचीत की मध्यस्थता की। बहुत सारी चर्चाओं और बातचीत के बाद, भारत सरकार अपहरणकर्ताओं को तीन आतंकवादियों की रिहाई के बदले बंधकों को रिहा करने के लिए मनाने में कामयाब रही।
नेटफ्लिक्स के 'आईसी 814: द कंधार हाईजैक' से हमें पता चलता है, कि तत्कालीन मंत्रियों में से एक ने बहुत साफ शब्दों में कहा था, "इतिहास इसे अच्छी तरह से नहीं देखेगा, कि हमने आतंकवादियों को छोड़ दिया।"












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