स्वीडन में मिला यूरोप को मालामाल करने वाला दुर्लभ खजाना, चीन की दादागीरी का अंत करीब
दुर्लभ खनिजों पर आज की पूरी दुनिया निर्भर है और चीन उन खनिजों पर कब्जा करना चाहता है। अफगानिस्तान में भी चीन इसीलिए घुसना चाहता है, ताकि वो दुर्लभ खनिजों पर कब्जा कर सके।

Sweden rare earth metal Discovery: आधुनिक दुनिया में दुर्लभ खनीज पदार्थों के लिए जंग चल रही है और दुनिया के ताकतवर देशों में दुर्लभ खनिजों पर कब्जे के लिए रेस लगी हुई है। खासतौर पर चीन इस रेस में दुनिया को पीछे छोड़ना चाहता है, ताकि भविष्य में उसे चैलेंज करने वाला कोई नहीं रहे। इसके साथ ही चीन की कोशिश ये है, कि दुनियाभर के दुर्लभ खनिज भंडारों पर उसका कब्जा हो, ताकि उसकी दादागीरी बनी रहे। लेकिन, स्वीडन में एक ऐसे दुर्लभ खनिज भंडार की खोज की गई है, जो यूरोप को तो मालामाल कर ही देगा, इसके साथ ही चीन की मोनोपोली को भी हमेशा के लिए खत्म कर देगा।

स्वीडन में मिला दुर्लभ खनिज भंडार
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोपीय देश स्वीडन में दुर्लभ खनिज का सबसे बड़ा भंडार पाया गया है, जिसका इस्तेमाल फोन से लेकर मिसाइल तक में किया जाता है। इस दुर्लभ खनिज के मिलने के बाद ना सिर्फ स्वीडन की अर्थव्यवस्था हमेशा के लिए बदल जाएगी, बल्कि यूरोप में दुर्लभ खनिजों के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा। इस समय यूरोप में किसी दुर्लभ खनिज का खनन नहीं किया गया है और एक स्वीडिश मंत्री ने चीन पर यूरोपीय संघ की निर्भरता को कम करने के तरीके के रूप में इस खोज की सराहना की है। स्वीडिश मंत्री का कहना है, कि इस दुर्लभ खनिज भंडार के मिलने के बाद यूरोपीय देशों की चीन पर निर्भरता हमेशा के लिए खत्म हो सकती है।

निर्णायक माना जा रहा है खोज
इलेक्ट्रिक वाहनों और पवन टर्बाइनों की मांग में उछाल को देखते हुए इस खोज को हरित संक्रमण के लिए "निर्णायक" खोज के रूप में भी देखा जा रहा है। आपको बता दें कि, 2021 में यूरोपीय संघ में उपयोग की जाने वाली दुर्लभ खनिज का लगभग 98% चीन से आयात किया गया था, जो बताता है, कि चीन के ऊपर यूरोपीय संघ कितना निर्भर है। लेकिन, स्वीडन के उत्तर में जिस खनिज की खोज की गई है, उसकी क्षमता 10 लाख टन से काफी ज्यादा है। इस खनिज भंडार की खोज स्वीडन की सरकारी खनन कंपनी LKAB ने की है, जो स्टॉकहोम से उत्तर में करीब एक हजार किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

17 तत्व माने जाते हैं दुर्लभ खनिज पदार्थ
हालांकि, अमेरिका का मानना है, कि स्वीडन में मिला दुर्लभ खनिज भंडार दुनिया के 120 मिलियन टन भंडार का एक अंश है। आपको बता दें कि, दुर्लभ खनिज शब्द पृथ्वी के अंदर पाए जाने वाले 17 तत्वों के समूह को संदर्भित करता है, जिनका उपयोग कई वैज्ञानिक उत्पादों और बुनियादी ढांचों के निर्माण में किया जाता है और इन दुर्लभ पदार्थों का महत्व हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। इन दुर्लभ खनिज पदार्थों से मोबाइल, हार्ड ड्राइव, कार और ट्रेनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टेक्नोलॉजी को लगाने में किया जाता है। आपको बता दें, कि दुर्लभ खनिज तत्वों में यूरोपियम, सेरियम, नियोडिमियम, प्रेसियोडीमियम, डिस्प्रोसियम जैसे खनिज तत्व होते हैं, जो काफी दुर्लभ और आधुनिक टेक्नोलॉजी के लिए जरूरी हैं।

दुर्लभ खनिजों के बिना दुनिया में अंधेरा
आज के जमाने में इलेक्ट्रिक कारों के निर्माण में भी दुर्लभ खनिजों का इस्तेमाल किया जाता है और जिस सेमी-कंडक्टर पर दुनिया के तमाम इलेक्ट्रिक आइटम निर्भर हैं, उस सेमी-कंडक्टर को भी दुर्लभ खनिज से ही बनाया जाता है। इनके अलावा मिसाइल में नेविगेशन सिस्टम जैसे उपकरणों का निर्माण भी इन्हीं दुर्लभ तत्वों से होता है। हालांकि, इन तत्वों को पृथ्वी से निकालना काफी मुश्किल भरा काम होता है और इनसे पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है, मगर साल 2030 तक इन दुर्लभ तत्वों की डिमांड में पांच गुना इजाफा होने की संभावना है।

भविष्य में छिड़ सकती है लड़ाई!
यूरोपीय संघ के इंटरनल मार्केट कमिश्नन थिएरी ब्रेटन ने पिछले साल कहा था, कि "लिथियम और दुर्लभ खनिज पदार्थ जल्द ही तेल और गैस की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होगी।" वहीं, गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए, स्वीडिश ऊर्जा मंत्री एब्बा बुस्च ने कहा, कि यूरोपीय संघ "इन सामग्रियों के लिए अन्य देशों पर बहुत अधिक निर्भर था।" और उन्होंने जोर देकर कहा, कि बदलाव की आवश्यकता है। उन्होंने साफ तौर पर कहा, कि "विद्युतीकरण, यूरोपीय संघ की आत्मनिर्भरता और रूस और चीन से स्वतंत्रता की शुरूआत इस खदान में शुरू होगी।" वहीं, एलकेएबी खनन कंपनी के सीईओ जन मोस्ट्रोम ने कहा है, कि अगले 10 से 15 सालों के अंदर खोज किए गये खदान से दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति बाजारों में शुरू हो जाएगी।












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