यूक्रेन युद्ध, चीन का डर...अमेरिका को होगा खरबों डॉलर का मुनाफा, हथियार कंपनियों को भारी ऑर्डर
अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक दिग्गज लॉकहीड मार्टिन कॉरपोरेशन के मुख्य कार्यकारी जेम्स टैकलेट ने जनवरी में कहा था, कि प्रमुख शक्तियों के बीच ‘प्रतिस्पर्धा’ से उन देशों की रक्षा बजट में मजबूत वृद्धि होगी।
वॉशिंगटन, अप्रैल 05: रूस-यूक्रेन संघर्ष एक महीने से अधिक समय से जारी है और यूक्रेन पूरी तरह से बर्बादो हो चुका है। हालांकि, रूस भी जीता नहीं है और अब जबकि, 40 दिनों से ज्यादा युद्ध का हो चुका है और रूस को जितना नुकसान हो चुका है, उसमें भले ही रूस अपने लक्ष्य को हासिल भी क्यों ना कर ले, लेकिन अब उसे जीता हुआ नहीं माना जा सकता है। लोग हमेशा कहते हैं कि, "युद्ध में कोई विजेता नहीं होता है।" लेकिन अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक दिग्गजों के लिए युद्ध भारी मुनाफा कमाने और अपने स्टॉक की कीमतों को बढ़ाने का एक शानदार अवसर है। कुछ लोगों ने नोट किया है कि सैन्य संघर्ष या भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी हथियारों के डीलरों के लिए पैसे छापने की मशीन बन गए हैं।

अमेरिकी हथियार इंडस्ट्री की बल्ले-बल्ले
यूक्रेन युद्ध का डिप्लोमेटिक नतीजा नहीं निकलना और अमेरिका द्वारा बार बार युद्ध की आग को और भड़काने की कोशिश करना, मसलन यूक्रेन की सीमा तक जो बाइडेन का पहुंचना, यूक्रेन को लगातार हथियार सप्लाई करना और युद्ध में आगे क्या करना है, ये यूक्रेनी राष्ट्रपति को बताया... ये साफ साफ संकेत हैं, कि इसके पीछे अमेरिकी सैन्य-उद्योग कंपनियों की आम सहमति है कि, युद्ध रोकने की डिप्लोमेटिक कोशिशें फेल हो जाएंऔर उन्हें करोड़ों-अरबों डॉलर लाभ कमाने का अवसर मिले।

देशों का रक्षा बजट बढ़ेगा
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक दिग्गज लॉकहीड मार्टिन कॉरपोरेशन के मुख्य कार्यकारी जेम्स टैकलेट ने जनवरी में कहा था, कि प्रमुख शक्तियों के बीच 'प्रतिस्पर्धा' से उन देशों की रक्षा बजट में मजबूत वृद्धि होगी और अमेरिकी हथियार कंपनों को को इससे काफी ज्यादा व्यवसाय मिलेगा। रेथियॉन टेक्नोलॉजीज के मुख्य कार्यकारी ग्रेगरी हेस ने निवेशकों को बताया कि, पूर्वी यूरोप में तनाव ने कंपनी को नए व्यापार के अवसर दिखाए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस-यूक्रेन संघर्ष छिड़ने के बाद से प्रमुख अमेरिकी सैन्य कंपनियों के शेयरों में काफी उछाल आया है। इस साल अब तक लॉकहीड मार्टिन के शेयरों में करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि इसी दौरान में रेथियॉन के शेयरों में 16.4% की तेजी आई है। नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन और जनरल डायनेमिक्स के शेयरों में भी भारी उछाल रिकॉर्ड किया गया है।

यूक्रेन में कैसे यूएस ने भड़काई आग?
रूस-यूक्रेन संघर्ष के फैलने के तुरंत बाद, अमेरिका ने घोषणा की, कि वह यूक्रेन को कुल 350 मिलियन डॉलर की सैन्य सहायता प्रदान करेगा। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 12 मार्च को यूक्रेन के लिए 200 मिलियन डॉलर के अतिरिक्त सैन्य उपकरण और 16 मार्च को अतिरिक्त 800 मिलियन डॉलर के हथियार भेजने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। यूक्रेन को मिलने वाला ये नया फंड अमेरिकी संसद का फैसला है, जिसके जरिए 11 मार्च को एक बिल लाया गया है, जिसमें अमेरिका की तरफ से अलग अलग देशों को दी जाने वाली सहायता राशि को बढ़ाकर 13.6 अरब डॉलर किया गया है। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी के बाद से, बाइडेन प्रशासन ने यूक्रेन का समर्थन करने के लिए कुल 1.35 अरब डॉलर की मंजूरी दी है।

हथियार उद्योग के लिए बंपर मौका
यूक्रेन युद्ध के बाद साफ तौर पर दुनिया के कई देशों ने अपनी रक्षा जरूरतों को जल्द पूरा करने के लिए कदम उठाना शुरू कर दिया है, जिसमें कई विकसित देश भी शामिल हैं। भू- राजनीतिक बदलाव और संघर्ष के इस दौरा में जर्मनी और जापान के साथ साथ कई यूरोपीय देशों ने अपनी रक्षा नीतियों पर मंथन शुरू किया है, जिससे अमेरिकी सैन्य दिग्गजों के लिए नए "व्यावसायिक अवसर" पैदा हुए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष, नाटो के सदस्य देशों को रक्षा खर्च बढ़ाने के लिए मजबूर करेगा। और चूंकि नाटो देश बड़ी संख्या में अमेरिकी हथियारों का उपयोग करते हैं, लिहाजा नाटो देशों की तरफ से हथियार खरीदने का नया ऑर्डर भी अमेरिकी हथियार कंपनियों को ही जाएगा। यानि, बर्बाद यूक्रेन और रूस दोनों होंगे, लेकिन जंग असल तौर पर अमेरिका ही जीत रहा है।

तनाव भड़काने वाली कहानियां
कई पर्यवेक्षकों को पता चला है कि, यूक्रेन युद्ध से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने के लिए और हथियार इंडस्ट्री में लंबे वक्त तक ऑर्डर लाने के लिए हथियार कंपनियों की तरफ से लगातार अमेरिकी सरकार से पैरवी की जा रही है। जिसमें खास तौर पर इस बात पर जोर दिया जा रहा है, कि युद्ध की खतरनाक कहानियों और खतरों के नये नये सिद्धांत को लेकर ज्यादा से ज्यादा कहानियां लोगों के सामने लाई जाएं। यानि, युद्ध के डर से देशों को और नागरिकों को बुरी तरह से डराया जाए, ताकि डरी हुई सरकारें अमेरिका के दरवाजे पर हथियार के लिए दस्तक देना शुरू कर दे। जैसे अभी अमेरिका की तरफ से भारत पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है और अमेरिका के बड़े अधिकारी ने तो यहां तक कहा है, कि भारत अगर रूसी हथियारों को बदलना चाहता है, तो अमेरिका भारत की मदद करेगा। जाहिर तौर पर... ये मदद मुफ्त का नहीं होगा।

20 सालों में अमेरिकी हथियार इंडस्ट्री में बूम
इस सदी के पहले दो दशकों में अमेरिकी सैन्य खर्च में काफी वृद्धि हुई है, खासकर 11 सितंबर, 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद, जिसके परिणामस्वरूप वैश्विक हथियारों के व्यापार में बेतहाशा वृद्धि हुई है। लेकिन, ये सवाल असल में किसी ने पूछा ही नहीं, कि अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ जो लड़ाई चलाई है, असल में उससे फायदा किसे हो रहा है। या फिर पिछले 20 सालों से अफगानिस्तान, इराक में जो अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई के नाम पर जो जंग लड़ी है और अमेरिकी बमबारी में ये देश जो बर्बाद हुए हैं, उसका असल में फायदा किसे मिला है, क्योकि इराक और अफगानिस्तान की जो स्थिति है, उसमें वो अगले कई सालों तक अपने पैरों पर नहीं खड़े हो पाएंगे। लेकिन, इस युद्ध का किसी ना किसी को तो फायदा हुआ है...

सैन्य ठेकेदारों की भर गई जेब
ब्राउन विश्वविद्यालय के वॉटसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स द्वारा प्रकाशित एक पेपर के अनुसार, साल 2001 के अंत में अफगानिस्तान में युद्ध की शुरुआत के बाद से, पेंटागन का खर्च 14 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया है, जिसमें से एक-तिहाई से ज्यादा डॉलर सैन्य ठेकेदारों की जेब में गई है। वहीं, लॉकहीड मार्टिन, बोइंग, जनरल डायनेमिक्स, रेथियॉन और नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन नामक पांच प्रमुख अमेरिकी सैन्य आपूर्तिकर्ताओं ने हाल के वर्षों में सभी पेंटागन करारों में से एक-चौथाई से एक-तिहाई जीते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है, कि हथियार कंपनियों को 9/11 के बाद के युग में बढ़ते अमेरिकी सैन्य खर्च का सबसे बड़ा फायदा हुआ है।

चीन का डर... सबसे बड़ा व्यापार
युद्धों को भड़काने और भू-राजनीतिक तनाव पैदा करने के अलावा, अलग अलग 'खतरनाक' ताकतों का निर्माण करना, और खतरे के सिद्धांत बनाना पेंटागन और हथियार डीलरों के लिए राजस्व बढ़ाने के महत्वपूर्ण साधन हैं। इस वजह से, चीन को अमेरिका के लिए "सबसे बड़ा खतरा" के रूप में बताया जाता है। अमेरिका के तमाम रक्षा विशेषज्ञ और अमेरिका की मीडिया इंडस्ट्री बार बार और लगातार चीन से होने वाले खतरे को लेकर दुनिया को आगाह करते रहते हैं। साल 2022 की पेंटागन की नेशनल डिफेंस स्ट्रेटजी में भी चीन की सैन्य शक्ति को पूरी दुनिया और मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया है और पूरी दुनिया को सावधान होने की चेतावनी दी गई है। इसके साथ ही चीन, उत्तर कोरिया और ईरान... ये कुछ ऐसे देश हैं, जो वैश्विक चुनौतियों को बढ़ाने का काम भी करते हैं और इसका सीधा फायदा अमेरिकी जेब को होता है।

रक्षा उद्योग और अमेरिकी सरकार
एशिया टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्ट ऑन गवर्नमेंट ओवरसाइट (पीओजीओ) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, यूएस नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी कमीशन के 12 सदस्यों में से नौ का रक्षा उद्योग से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध है। इसमें कहा गया है कि, ये बहुत बड़ा भ्रष्टाचार और लॉबी का अड्डा है, जहां से सत्ता का भीषण दुरुपयोग किया जाता है। इस आयोग के विचार-विमर्श और निष्कर्षों का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। वाशिंगटन स्थित गैर-लाभकारी संगठन सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी (सीआईपी) में आर्म्स एंड सिक्योरिटी प्रोजेक्ट के निदेशक विलियम हार्टुंग द्वारा पिछले सितंबर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों, कांग्रेसी, सीनेटर्स को बहुत बड़ा फंड किया है और 2001 के बाद से अभी तक 285 मिलियन डॉलर का फंड दिया गया है, जो अमेरिका की सैन्य शक्तियों पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालते है।

लॉबिंग पर 2.5 अरब डॉलर खर्च
हार्टुंग ने अपने लेख में, वाशिंगटन स्थित गैर-पक्षपाती, स्वतंत्र और गैर-लाभकारी संगठन, Opensecrets.org द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा है कि, इसके अलावा, अमेरिकी हथियार निर्माताओं ने पिछले दो दशकों में लॉबिंग पर 2.5 अरब डॉलर खर्च किए हैं। उदाहरणों में से सिर्फ एक का हवाला देते हुए, ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के पूर्व प्रमुख, जनरल जोसेफ डनफोर्ड, जो लॉकहीड मार्टिन के परेशान F-35 लड़ाकू विमानों की खरीदी के सबसे बड़े समर्थक थे, वो अमेरिकी सेना से रिटायर्ड होने के ठीक चार महीने बाद हथियार कंपनी के बोर्ड में शामिल हो गए। यानि, युद्ध कहीं भी हो... कोई भी लड़ रहा हो... उसका फायदा सिर्फ एक जगह ही पहुंचता है। युद्ध में यूक्रेन तबाह हुआ है, रूस की अर्थव्यवस्था बर्बाद होगी... लेकिन, आबाज सिर्फ एक देश होगा।
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