Opinon: कैसे शेख हसीना ने 'चीन की दीवार' तोड़कर भारत और भारत के बीच लिंक जोड़ा है?
क्या शेख हसीना के भारत दौरे को क्या साधारण तरह से लिया जा सकता है, बिल्कुल नहीं। बाग्लादेश की इस सयम भारत की यात्रा के पीछे कई अहम महत्व हैं।
नई दिल्ली, सितंबर 06: बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना चार दिवसीय यात्रा पर दिल्ली पहुंची हैं और आज उनकी मुलाकात भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हुई। पीएम मोदी पहली बार साल 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने थे और पिछले 8 सालों में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ उनकी 13वीं बैठक हो रही है, जिससे समझना काफी आसान हो जाता है, कि दोनों देशों की सरकारों ने संबंध को नये युग में ले जाने के लिए किस हद तक कोशिश की है। दोनों नेताओं के बीच की इस बैठक में डिफेंस और सिक्योरटी, जल-बंटवारा और संभावित आर्थिक साझेदारी पर भी चर्चा हो रही है। भारत के तमाम पड़ोसी देशों को लॉलीपॉप पकड़ाने की कोशिश में चीन लगातार हाथ पांव मारता रहा है, ताकि भारत को हर तरफ से उलझाया जा सके, लेकिन बांग्लादेश से चीन को लगातार निराशा ही हाथ लगी है और पिछले महीने बांग्लादेश के वित्तमंत्री ने तो यहां तक कह दिया था, कि चीन के कर्ज जाल से बचकर चलना जरूरी है, नहीं तो श्रीलंका जैसे हालात हो सकते हैं।

शेख हसीना के भारत दौरे का असल मकसद?
लेकिन, चुनावी साल में शेख हसीना के भारत दौरे को क्या साधारण तरह से लिया जा सकता है, बिल्कुल नहीं। बांग्लादेश की इस समय भारत की यात्रा के पीछे कई अहम महत्व हैं। साल 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पहली बार एक बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने भारतीय उपमहाद्वीप के पूरे पूर्वोत्तर में आर्थिक संपर्क की बहाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान पूर्वोत्तर सीमा पर बहुत बड़े आर्थिक एकीकरण का काम हुआ और शेख हसीना आज जो कर रही हैं, वह केवल इसलिए उल्लेखनीय नहीं है, क्योंकि बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने और एक स्वतंत्र देश बनने के बाद पिछले 50 वर्षों में ऐसा कभी नहीं किया गया है, जिनमें रेलवे लाइनों का विकास, सड़क संचार, अंतर्देशीय जलमार्गों के बीच कनेक्शन को सुधारने, फिर से जोड़ने और पुन: स्थापित करने का उनका फैसला शामिल है, बल्कि शेख हसीना आज जो कर रही हैं, वह 57 साल पहले दोनों पड़ोसियों के बीच बनी हुई चीन की कठोर दीवार को तोड़ रही हैं। और इसके अलावा वो सबसे ज्यादा अहम काम यह कर रही हैं, कि भारत और भारत के उस हिस्से के बीच बिल्कुल नए कनेक्टिविटी लिंक बनाने की अनुमति भी दे रही हैं, जिसपर सबसे ज्यादा खतरा रहता है।

एक 'घुटा हुआ' चिकन नेक
पूर्वोत्तर के आठ बहन राज्य, असम, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड, सिक्किम और मिजोरम, ये सभी हिस्सा भारत के साथ सिर्फ 22 किलोमीटर चौड़े हिस्से के साथ जुड़ता है, जिसे चिकन नेक कहा जाता है। अब तक इस क्षेत्र के जरिए ही पूर्वोत्तर भारत कर सारे सामान पहुंचाए जाते हैं, जिसकी वजह से जाम की समस्या के साथ साथ सामान पहुंचने की लागत भी काफी ज्यादा बढ़ जाती है, ऐसे में बांग्लादेश के समुद्री रास्ते से अगर सामान पूर्वोत्तर भारत पहुंचाया जाए, तो ना सिर्फ सामानों की कीमत कम हो जाएगी, बल्कि विशालकाय जाम से भी छुटकारा मिल जाएगा। लिहाजा, भारत की तमाम सरकारों ने बांग्लादेश से अपने क्षेत्र में पारगमन और व्यापार की अनुमति देने के लिए कहा है। लेकिन, अब तक हर अनुरोध कुछ खास जवाब नहीं आया। लेकिन, शेख हसीना ने कुछ समय पहले रणनीतिक फैसला लिया, वो भी तब जब भारत में मुस्लिमों के खिलाफ हुई कुछ हिंसक घटनाओं पर उन्होंने एतराज जताया, बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हुई कुछ हिंसक घटनाओं पर भारत ने गुस्सा जताया और चीन ने बांग्लादेश के सामने उसके आर्थिक विकास के लिए एक आकर्षक आर्थिक विकल्प का मॉडल रखा, बावजूद इसके शेख हसीना ने एक बड़ा फैसला लिया और उन्होंने चिटगांव बंदरगाह का इस्तेमाल करने की इजाजत भारत को दे दी।

भारत और चीन पर क्या सोचती हैं शेख हसीना?
भारत के दौरे से ठीक पहले शेख हसीना ने भारतीय न्यूज एजेंसी एएनआई को एक इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि, बांग्लादेश की विदेश नीति "सभी से दोस्ती, किसी से द्वेष नहीं" के अनुसार चलती है और वह भारत और चीन के बीच मौजूदा मतभेदों को समझती हैं, लेकिन भारत और चीन के बीच की समस्याओं में अपना नाक नहीं फंसाना चाहती हैं। जाहिर है, शेख हसीना समझती हैं कि, भले ही चीन अब तक एक समृद्ध राज्य है और यही वजह है कि बांग्लादेश बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का सदस्य है, लेकिन, फिर भी भारत ज्यादा घनिष्ठ पड़ोसी है। हाल के वर्षों में भारतीय मुख्य भूमि, बांग्लादेश और भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों के बीच रेलवे ट्रैक, सड़कों और नावों ने अपना संपर्क स्थापित कर लिया है, जो एक काफी महत्वपूर्ण पहल है।

कैसे स्थापित किया गया संचार?
पश्चिम बंगाल में कोलकाता से त्रिपुरा के अगरतला तक बांग्लादेश में चटगांव बंदरगाह के माध्यम से भारतीय सामानों के ट्रांसशिपमेंट का ट्रायल रन जुलाई 2020 में हुआ, जबकि उस वक्त भारत समेत बांग्लादेश भी कोविड लॉकडाउन से गुजर रहा था। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी से ढाका के लिए मिताली एक्सप्रेस ट्रेन 1965 के बाद पहली बार फिर से शुरू हुई। बांग्लादेश के अंतर्देशीय जलमार्गों की ड्रेजिंग शुरू हो गई है ताकि भारतीय माल के मार्ग को सुगम बनाया जा सके। वहीं, बांग्लादेश के दूसरी तरफ अगरतला और अखौरा के बीच रेल लिंक का संयुक्त निर्माण अभी चल रहा है, वहीं, भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन का निर्माण चल रहा है।

गहराता हुआ भारत-बांग्लादेश संबंध
सबसे आश्चर्यजनक बात ये थी, कि बांग्लादेश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में ऊर्जा उत्पादों की आवाजाही में हालिया सहयोग वास्तव में चौंकाने वाला है, क्योंकि शेख हसीना ने ऐसा करने का आदेश दिया था। इसीलए, एक पखवाड़े से भी कम समय में बांग्लादेश ने 'बाइलेट्रल ट्रांजिट प्रोटोकॉल' के तहत, ईंधन और तेल से भरे 10 भारतीय टैंकरों को मेघालय से अपने क्षेत्र में प्रवेश करने और त्रिपुरा में बाहर निकलने की अनुमति दे दी। 25 अगस्त की दोपहर को भारतीय टैंकर मेघालय के डौकी लैंड पोर्ट से निकलकर सिलहट के तामाबिल बंदरगाह पर पहुंचे। उन्होंने सभी सीमा शुल्क और आव्रजन औपचारिकताओं को पूरा किया और शाम 4:30 बजे तमाबिल बंदरगाह से रवाना हुए। फिर वे आगे चलकर बांग्लादेश में मौलवीबाजार में चटलापुर भूमि सीमा शुल्क स्टेशन गए, जो रात 9:30 बजे वहां पहुंचे। 10 टैंकरों ने सभी निकास औपचारिकताओं को पूरा किया और रात 10:30 बजे मनु भूमि सीमा शुल्क स्टेशन पर त्रिपुरा के कैलाशहर में प्रवेश करते हुए वापस भारत में आ गए। बांग्लादेश का यह एक निर्बाध और ऐतिहासिक कदम था। 10 में से तीन टैंकरों में 21.19 मीट्रिक टन तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) थी, और शेष सात में 83 मीट्रिक टन पेट्रोलियम तेल था।

काफी महत्वपूर्ण थी ये आवाजाही
तेल के सामानों की इस हालिया आवाजाही के महत्व को कम करके आंका नहीं जा सकता है। विशेष रूप से मौजूदा गंभीर परिस्थितियों में, जब यूक्रेन में युद्ध दुनिया भर में ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर रहा है, ऐसे वक्त में बांग्लादेश से गुजरते हुए भारत के दूसरे हिस्से में तेल की बड़ी खेप को पहुंचाना एक विश्वसनीय काम और अविश्वसनीय पैसों की बचत है, जिससे पदार्थ की कीमत कम रहेगी। इसलिए शेख हसीना भारत के साथ संबंध प्रगाढ़ करने पर गहरी सांस ले रही हैं। वह यह भी अच्छी तरह से जानती और समझती हैं, कि इस फोर्जिंग से दोनों पक्षों को लाभ होता है और साल 2023 के अंत में चुनाव होने पर उसे भारत की समझ की आवश्यकता होगी, क्योंकि चुनाव में सीधा मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानि बीएनपी से होना है।

शेख हसीना को जीतता देखना चाहेगा भारत
बांग्लादेश में तख्तापलट करने वाले जिया उर रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का नेतृत्व बेगम खालिदा जिया करती हैं, जो पाकिस्तान समर्थक हैं और उनकी पार्टी को पाकिस्तान समर्थक जमात-ए-इस्लामी से समर्थन मिला हुआ है और उसे जिताने के लिए आईएसआई बांग्लादेश के अंदर कट्टरपंथी हवा फैलाने की कोशिश कर रहा है। यदि शेख हसीना फिर से जीतती हैं, तो वह अभूतपूर्व रूप से पांचवीं बार प्रधानमंत्री बनेगी, चाहे बीएनपी चुनाव में भाग लेती है या नहीं, जैसा कि उसने पिछली दो बार चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। भारत का नेतृत्व शेख हसीना के महत्व को स्पष्ट रूप से देखता है, लिहाजा मोदी सरकार ने बांग्लादेश से संबंध बढ़ाने को लेखर काफी ज्यादा ध्यान बी दिया है, लिहाजा ये भागीदारी फायदे का सौदा साबित हो रहा है।
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