न राजनीतिक बयानबाजी और न ही कोई विरोध, यह फ्रांस है!
पेरिस। 13 नवंबर को फ्रांस की राजधानी फ्रांस की राजधानी पेरिस पर हुए आतंकी हमले के बाद सिर्फ तीन दिनों के अंदर हमले के मास्टरमाइंड को मार गिराया गया।
फ्रांस के अंदर आतंकियों के खिलाफ जो कार्रवाई हुई उस पर न तो कोई राजनीतिक बयानबाजी हुई और न ही आतंकियों के समर्थन में कोई मानवाधिकार संगठन आगे आया।
यह बातें हम यहां पर इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हमें लगता है कि जिस तरह से फ्रांस में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है, उससे भारत काफी कुछ सीख सकता है।
यहां पर यह बहस हो सकती है कि फ्रांस, भारत की तुलना में काफी विकसित है। वहीं यह भी सच है कि जो राजनीति भारत में होती है,उसकी वजह से शायद कहीं न कहीं आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई समय रहते हो नहीं पाती है।
आगे देखिए कैसे फ्रांस ने पेरिस आतंकी हमलों के बाद आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई की है।

414 जगह छापे और तलाशी
पेरिस आतंकी हमलों के सिर्फ तीन दिन के अंदर ही फ्रांस की पुलिस और सिक्योरिटी फोर्स ने आतंकियों की तलाश में 414 जगह छापे मारे और तलाशी ली। भारत की बात करें तो शायद यहां पर पुलिस और सिक्योरिटी फोर्स इतनी मुस्तैद नजर नहीं आती है।

तीन आतंकी ढेर
शुक्रवार को हुए आतंकी हमलों के बाद 30,000 पुलिसकर्मी तलाश अभियान जुटे थे और उन्होंने तीन आतंकियों को ढेर किया था। भारत में तो इतने पुलिसकर्मियों को नेताओं और उनके काफिले को सुरक्षा देने से ही फुर्सत नहीं मिल पाती होगी।

भारत में कई तुकाराम ओंबले
फ्रांस में किसी भी पुलिसकर्मी की मौत नहीं हुई है। भारत में मुंबई आतंकी हमलों के दौरान कसाब को जिंदा पकड़ने वाले असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर तुकाराम ओंबले के पास हथियार के नाम पर बस एक लाठी थी। बुरी तरह से गोलियों से घायल ओंबले ने कसाब को तो पकड़ा लेकिन खुद की जान कुर्बान कर दी।

राष्ट्रपति ने बदले 26 नियम
पेरिस आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड अब्देलहमीद अबाउद को मारकर ही पेरिस की पुलिस ने चैन की सांस ली। सिर्फ इतना ही नहीं फ्रांस में हमलों के बाद एक नहीं बल्कि संविधान से जुड़े 26 नियमों को बदला गया। इस दौरान राष्ट्रपति ने अपने पास मौजूद स्पेशल पावर्स का प्रयोग किया था। भारत में नियम बदलना तो दूर की बात, नियम बनने में सालों लग जाते हैं।

कोई विरोध नहीं
भारत की तरह फ्रांस में किसी भी विपक्षी पार्टी और विपक्षी नेताओं ने सरकार और राष्ट्रपति के कदम का विरोध नहीं किया। फिलहाल भारत में इस स्थिति को बदलने में काफी समय लगेगा।

मानवाधिकार संगठनों का विरोध नहीं
आतंकियों के खिलाफ हुई कार्रवाई में ना तो कोई मानवाधिकार संगठन आगे आया और न ही किसी राजनीतिक पार्टी की ओर से आतंकियों के धर्म और उनके समुदाय के बारे में बयान दिए गए।
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