2700 टारगेट किलिंग कर चुका है मोसाद, CIA भी हत्याओं के लिए कुख्यात.. इजराइली पत्रकार ने खोली 'सीक्रेट फाइल्स'
CIA-Mossad Targeted Killings: कुख्यात खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की कनाडा में हुई हत्या को लेकर कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत के हाथ होने की संभावना जताते हुए, इसे अपनी जमीन पर संप्रुभुता का उल्लंघन बताया और उनके आरोपों के बाद से दोनों देशों के बीच के संबंध काफी बिगड़ गये हैं।
हालांकि, भारत ने कनाडाई प्रधानमंत्री के आरोपों को बेतुका और प्रेरित बताकर खारिज कर दिया है, लेकिन जस्टिन ट्रूडो के आरोपों और अमेरिका से मिल रहे कनाडा को सहयोग के बाद ये साबित हो गया है, कि अमेरिका और पश्चिमी देश, किस तरह से बाकी दुनिया के लिए डबल स्टैंडर्ड का नजरिया रखते हैं।

आज हम आपको बताने वाले हैं, कि आखिर कैसे अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद, विदेशी जमीनों पर अपने 'दुश्मनों' को मारती रही है, लेकिन एक बार भी इन दोनों देशों के खिलाफ पश्चिमी देशों ने आवाज नहीं उठाई है, जबकि हैरानी की बात ये है, कि मोसाद के कई ऑपरेशंस तो यूरोपीय देशों में ही अंजाम दिए गये।
मोसाद ने विदेशों में की 2700 हत्याएं
इजरायली पत्रकार रोनेन बर्गमैन की 2018 में प्रकाशित किताब "राइज एंड किल फर्स्ट" में दावा किया गया है, कि इजरायल की सुरक्षा सेवाओं ने साल 2018 तक तक विदेशों में लगभग 2,700 हत्याएं की थीं।
रोनेन बर्गमैन ने अपनी किताब में दावा किया है, कि "फिलिस्तीनियों ने पूरे यूरोप में इजराइली लोगों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था और साल 1972 में म्यूनिख में इजराइली ओलंपिक टीम के 11 सदस्यों की बर्बर हत्या के बाद, इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद को ऐसे दुश्मनों का शिकार करने की खुली छूट दे दी गई।"
किताब में आगे दावा किया गया है, कि "विदेशों में ऑपरेशंस चलाने की खुली छूट मिलने के बाद मोसाद ने जॉर्डन, लेबनान, माल्टा, ट्यूनीशिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसी जगहों पर फ़िलिस्तीनी गुर्गों पर हमलों की एक सीरिज को अंजाम दिया था।"
लेकिन हैरानी की बात ये रही, कि इन तमाम ऑपरेशंस के दौरान एक बार भी ना तो यूरोपीय देशों ने और ना ही अमेरिका ने इजराइल की आलोचना की।
अमेरिका को तो किसी की आलोचना करने का हक ही नहीं है, क्योंकि अमेरिका तो दूसरे देशों की संप्रभुता को ध्वस्त करने के लिए कुख्यात रहा है।

अमेरिका कैसे करता है टारगेट किलिंग?
हालिया समय में अमेरिका ने ड्रोन हमलों के जरिए दूसरे देशों में अपने दुश्मनों का सफाया किया है और ओबामा प्रशासन के साथ साथ डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन और मौजूदा जो बाइडेन प्रशासन ने गर्व के साथ अपने इन ऑपरेशंस को दुनिया को बताया है।
हालांकि, ओबामा प्रशासन के आने से पहले तक इन तरह के ऑपरेशंस को अंजाम देने का काम सीआईए की तरफ से किया जाता था, लेकिन ओबामा प्रशासन ने अपने कार्यकाल के दौरान सीआईए से ये जिम्मेदारी छीनकर पेंटागन के हाथों में दे दी।
अमेरिकी पत्रकार माइकल हिरश ने लिखा है, कि "लोगों को निशाना बनाकर, सटीक तरीके से मारने में सीआईए, अमेरिकी सेना से कहीं बेहतर हो सकती है, और सीआईए इस बात को तस्दीक करने में भी बेहतर है, कि वो जिन लोगों को टारगेट कर रहे हैं, वो वास्तव में बुरे लोग हैं।"
ऐसा माना जाता है, कि जब साल 2021 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के प्रशासन ने 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' की घोषणा की थी, उसके बाद सीआईए ने बेरहमी से 'दुश्मनों' को मारना शुरू किया था, लेकिन सीआईए के अधिकारी ही इन टारगेटेड किलिंग के खिलाफ खड़े होने लगे।
ऐसे ही एक अधिकारी थे इलियट एकरमैन, जिन्होंने 2014 में द न्यू यॉर्कर पत्रिका में लिखा था, "मेरे सहयोगी सिर्फ टारगेटेड किलिंग को लेकर असहज नहीं थे, बल्कि ज्यादातर अधिकारियों का मानना था, कि हमने अमेरिकी संविधान को लेकर शपथ ली है, हम उसका उल्लंघन कर रहे हैं।"
उन्होंने लिखा है, कि "हममें से ज्यादातर को ऐसा लगा, जैसे हम कार्यकारी आदेश 12333 का उल्लंघन कर रहे हैं।"
ये आदेश राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के प्रशासन ने साल 1981 में जारी किया था।
लेकिन, 1983 में अमेरिकी सरकार के एक नये कार्यकारी ऑर्डर में विदेशी जमीनों पर अमेरिका के दुश्मनों को मारने को 'अमेरिका का नेशनल इंटरेस्ट' करार दिया गया। यानि, अमेरिका विदेशी जमीनों पर जो हत्याएं करता है, उसे वो अपने देश की रक्षा के लिए जरूरी ठहराता है और उसे आत्मरक्षा के अधिकार की श्रेणी में रखता है।

ऑपरेशंस को क्यों कहा जाता है 'टारगेट किलिंग'
आपको जानकर हैरानी होगी, कि अमेरिका और इजराइल विदेशों में जो ऑपरेशंस चलाते हैं, उसे वो कभी भी 'हत्या' कहकर संबोधित नहीं करते हैं, बल्कि इसके लिए वो 'टारगेट किलिंग' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि, हत्या शब्द का इस्तेमाल करना अंकर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।
ओबामा प्रशासन ने कानूनी ढांचे को संशोधित किया था, जिसमें कहा गया है, कि "सशस्त्र संघर्ष के कानून के अनुरूप दुश्मन के खिलाफ लक्षित घातक बल का उपयोग करना 'हत्या' नहीं माना जाएगा।"
इसके अलाबा, ओबामा प्रशासन ने आदेश में ये भी कहा है, कि "अमेरिका अगर अपनी जमीन से ऐसे खतरों से निपटने में असक्षम है, तो अमेरिका को किसी और देश की संप्रभुता के अतिक्रमण की इजाजत है।"
यानि, आप समझ सकते हैं, कि अमेरिका का कानून खुद के लिए क्या है और कैसे वो दूसरों के लिए अलग कानून चाहता है।
भारत को ज्ञान देता अमेरिका
अब, आइए हम भारत पर भी यही मानदंड लागू करें। आख़िरकार, खालिस्तान समर्थकों के नेतृत्व वाले अलगाववादी आंदोलन के कारण उसे बहुत नुकसान उठाना पड़ा है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक की हत्या की गई और कनाडा से एयर इंडिया के एक विमान को उड़ा दिया गया।
हालांकि, भारत में खालिस्तान आंदोलन पर काबू पा लिया गया, फिर भी, भारत के लगातार अनुरोधों के बावजूद, कनाडा खालिस्तान आतंकियों, जिनमें से कई अब कनाडाई नागरिक हैं, उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं ले रहा है।

जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया की विशेषज्ञ क्रिस्टीन फेयर का कहना है, कि "भारत लगातार सालों से खालिस्तानियों से परेशान रहा है और खालिस्तानियों से नाराज रहा है। भारत पंजाब में एक अलग खालिस्तान राज्य बनाने के आंदोलन के समर्थकों को कट्टरपंथियों के रूप में मानता है, जो महत्वपूर्ण है। आतंकवादी नेटवर्क के रूप में ये एक ख़तरा है, जिसे पश्चिमी सरकारें अपने मन के मुताबिक इस्तेमाल करना चाहती हैं।"
उन्होंने कहा, कि "हम कनाडा को भले ही एक परिपक्व लोकतंत्र के तौर पर देख सकते हैं, लेकिन भारतीय खालिस्तानियों को शरण देने के रूप में कनाडा पर आतंकवाद का समर्थन करने का आरोप लगाते हैं।'
लिहाजा, अगर भारत इस टारगेट किलिंग में शामिल भी है, तो उसके बाद भी भारत के पास पश्चिमी देशों को डबल स्टैंडर्ड के खिलाफ एक मजबूत प्वाइंट है।
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