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हिरोशिमा और नागासाकीः परमाणु हमले में जीवित बची महिलाओं की कहानी

हिरोशिमा
Getty Images
हिरोशिमा

75 साल पहले 6 और 9 अगस्त को जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर अमरीका ने परमाणु बमों से हमला किया था.

ऐसा माना जाता है कि इस हमले में हिरोशिमा की 3,50,000 की आबादी में से करीब 1,40,000 लोग मारे गए थे. दूसरी ओर, नागासाकी में करीब 74,000 लोग मारे गए थे.

इस बमबारी ने एशिया में दूसरे विश्व युद्ध को अचानक खत्म कर दिया था. जापान ने 14 अगस्त 1945 को आत्मसमर्पण कर दिया था.

लेकिन, आलोचकों का कहना है कि जापान पहले ही सरेंडर करने की कगार पर था.

इस बमबारी में जीवित बचे लोगों को हिबाकुशा कहा जाता है. जीवित बचे लोगों को परमाणु बम के हमले के बाद शहरों में रेडिएशन और मनोवैज्ञानिक मुश्किलों से गुजरना पड़ा था.

1945 में धवस्त हुआ हिरोशिमा शहर
Getty Images
1945 में धवस्त हुआ हिरोशिमा शहर

ब्रिटेन के फोटो-जर्नलिस्ट ली कैरेन स्टो की खासियत इतिहास की अहम घटनाओं की गवाह रही महिलाओं की कहानियां पेश करने में रही है.

स्टो ने 75 साल पहले परमाणु बम हमले में जीवित बची तीन महिलाओं के फोटो लिए और उनके साथ बातचीत की है.

इस आर्टिकल में कुछ ऐसे ब्योरे हैं जो कि कुछ लोगों को परेशान कर सकते हैं.

तेरुको उएनो

तेरुको उएनो
Lee Karen Stow
तेरुको उएनो

तेरुको 15 साल की थीं जब वह 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा में हुए परमाणु बम हमले में जीवित बच गईं.

बमबारी के वक्त पर तेरुको हिरोशिमा रेड क्रॉस हॉस्पिटल में नर्सिंग स्कूल में दूसरे साल में थीं.

बम के टकराने के बाद अस्पताल की डॉरमेटरी में आग लग गई. तेरुको ने लपटों को बुझाने की कोशिश की, लेकिन उनके कई साथी छात्र इसमें जलकर मर चुके थे.

हमले के बाद के हफ्ते की उनकी याद्दाश्त केवल इतनी है कि उन्होंने दिन-रात लगकर बुरी तरह से जख्मी हुए लोगों का इलाज किया जबकि उनके पास खाने-पीने के सामान न के बराबर थे.

तेरुको उएनो की बेटी
Lee Karen Stow
तेरुको उएनो की बेटी

ग्रेजुएशन के बाद तेरुको हॉस्पिटल में काम करती रहीं, जहां उन्होंने स्किन ग्राफ्ट के ऑपरेशंस में मदद दी.

मरीज की जांघ से खाल लेकर इसे जलने की वजह से विकसित होने वाले केलोइड जख्म वाली जगह पर ग्राफ्ट किया जाता था.

बाद में उनकी शादी तत्सुयुकी से हुई जो खुद भी परमाणु बम हमले में जीवित बच गए थे.

तेरुको उएनो की बेटी तोमोको
Lee Karen Stow
तेरुको उएनो की बेटी तोमोको

जब तेरुको गर्भवती हुईं तो उन्हें चिंता हुई कि क्या उनका बच्चा स्वस्थ होगा और क्या वह जीवित बच पाएगा या नहीं.

उनकी बेटी तोमोको पैदा हुईं और उनका स्वास्थ्य अच्छा था.

तेरुको उएनो की बेटी तोमोको और नातिन कुनीको
Lee Karen Stow
तेरुको उएनो की बेटी तोमोको और नातिन कुनीको

वे कहती हैं, "मुझे नर्क के बारे में नहीं पता, लेकिन जिस सब से हम गुजरे शायद वही नर्क है. ऐसा फिर कभी नहीं होना चाहिए." वे कहती हैं कि परमाणु हथियारों को खत्म करने की दिशा में पहला कदम स्थानीय सरकारी नेताओं को उठाना चाहिए.

एमिको ओकाडा

एमिको उस वक्त आठ साल की थीं जब हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया गया.

उनकी बड़ी बहन मीको और चार अन्य रिश्तेदारों की इसमें मौत हो गई.

एमिको और उनके परिवार के कई फोटोग्राफ्स नष्ट हो गए थे, कुछ तस्वीरें जो कि उनके रिश्तेदारों के यहां रखी थीं वे बची रह गईं. इनमें से कुछ तस्वीरें उनकी बहन की भी थीं.

एमिको कहती हैं, "मेरी बहन उस सुबह घर से बाद में मिलती हूं कहकर निकली थीं. वे केवल 12 साल की थीं." लेकिन, वे फिर कभी वापस नहीं लौटीं. किसी को भी नहीं पता कि उनके साथ क्या हुआ.

एमिको बताती हैं, "मेरे पेरेंट्स ने पूरी ताकत से उन्हें खोजने की कोशिश की. उन्हें उनकी बॉडी कभी नहीं मिल पाई. हालांकि, उनका कहना है कि वे अभी भी कहीं पर जीवित होंगी. मेरी मां उस वक्त प्रेग्नेंट थीं, लेकिन उनका गर्भपात हो गया. हमारे पास खाने के लिए भी कुछ नहीं था. हमें रेडिएशन के बारे में तब कुछ नहीं पता था, ऐसे में हमें जो भी मिला हमने वह सब उठा लिया."

हिरोशिमा
Getty Images
हिरोशिमा

वे बताती हैं कि उस वक्त खाने की जुगाड़ सबसे बड़ी समस्या थी. लोग चोरी करने लगे थे. पानी स्वादिष्ट लगता था. शुरुआत में लोगों को ऐसे ही दिन काटने पड़े.

वे कहती हैं, "फिर मेरे बाल गिरना शुरू हो गए. मुझे हमेशा थकान रहती थी. मैं हमेशा पड़ी रहती थी."

एमिको ओकाडा
Courtesy of Emiko Okada
एमिको ओकाडा

12 साल बाद उन्हें एप्लास्टिक एनीमिया बीमारी निकली. वे कहती हैं, "हर साल कुछ दफा ऐसे मौके आते हैं जबकि सूरज ढलने के वक्त आसमान सुर्ख लाल हो जाता है. इतना लाल कि लोगों के चेहरे लाल होने लगते हैं. उस वक्त मुझे परमाणु बम हमले के दिन की शाम याद आ जाती है."

वे कहती हैं, "तीन दिन और तीन रातों तक शहर जलता रहा था. मुझे सूरज ढलने से नफरत है. अभी भी सनसेट से मुझे जलता हुआ शहर याद आ जाता है."

रीको

रीको
Lee Karen Stow
रीको

उस सुबह हवाई हमले की चेतावनी जारी हुई थी. इस वजह से रीको घर पर ही रुक गई थीं.

जब यह लगा कि सब ठीक है तो वे पड़ोस के मंदिर चली गईं जहां पर उनके पड़ोस के बच्चे पढ़ने के लिए आया करते थे. बार-बार हवाई हमलों की चेतावनी के चलते बच्चे स्कूल जाने की बजाय मंदिर में पढ़ने के लिए इकट्ठा होते थे.

नागासाकी
Getty Images
नागासाकी

40 मिनट बाद शिक्षकों ने कक्षा बंद कर दी और रीको घर आ गईं.

रीको बताती हैं, "मैंने घर के अंदर पांव रखा ही होगा कि अचानक मेरी आंखें तेज़ रोशनी से कौंध गईं. यह पीली और नारंगी रंग की थी. मैं कुछ भी समझ नहीं पाई...तब तक सबकुछ सफेद हो गया. अगले ही पल एक जोरदार धमाका हुआ. मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया."

रीको अपने पिता और बड़ी बहन के साथ.
Courtesy of Reiko Hada
रीको अपने पिता और बड़ी बहन के साथ.

वे कहती हैं, "हमें एयर रेड शेल्टर के बारे में बताया गया था. ऐसे में मुझे जैसे ही होश आया मैंने अपनी मां की तलाश की और हम लोग पड़ोस के एयर-रेड शेल्टर में पहुंच गए."

वे कहती हैं, "मुझे खरोंच तक नहीं आई थी. मैं माउंट कोनपीरा की वजह से बच गई थी, लेकिन पहाड़ के दूसरी तरफ के लोग इतने भाग्यशाली नहीं थे. वहां भीषण तबाही हुई थी."

रीको हाडा
Lee Karen Stow
रीको हाडा

मेरी मां ने चादरें और तौलिए लिए और दूसरी महिलाओं के साथ पास के कमर्शियल कॉलेड में पहुंच गईं. वहीं पर काफी लोग इकट्ठा हुए थे.

वे बताती हैं, "कुछ लोगों ने पानी मांगा. मुझे उन्हें पानी देने के लिए कहा गया. मैंने एक कटोरा उठाया और पास की नदी से उसे भरा और उन्हें पीने के लिए दे दिया. पानी का घूंट पीते ही वे मर गए. एक के बाद एक लोग मरते गए. गर्मियों का वक्त था और कीड़े और बदबू के डर से शवों का तुरंत अंतिम संस्कार करना पड़ा."

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