कई देशों में आ गई आर्थिक मंदी, बचने के लिए सेन्ट्रल बैंक्स मार रहे हैं हाथ-पैर, भारत का क्या होगा?
ब्लूमबर्ग ने वैश्विक आर्थिक मंदी को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें दुनियाभर के बाजारों का विश्लेषण किया गया है और उसके आधार पर कहा गया है, कि ये आर्थिक मंदी के आ जाने के संकेत हैं।
नई दिल्ली, जुलाई 10: अमेरिका में लोगों की नौकरी में वृद्धि दर पिछले 50 सालों के मुकाबले सबसे कम पर चला गया है और अमेरिका के फेडरल रिजर्व बैंक इस महीने एक बार फिर से ब्याज दरों में बेतहाशा की वृद्धि करने जा रहा है, ताकि डिमांड कम हो और महंगाई पर लगाम लग सके। वहीं,हंगरी और पाकिस्तान जैसे देशों के लिए स्थिति काफी ज्यादा खराब हो चुकी है और इन देशों में महंगाई रॉकेट की रफ्तार से आसमान में जा चुकी है और इन देशों के नीति निर्माता कीमत को कंट्रोल में रखने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं, लेकिन नाकामयाब साबित हो रहे हैं। इस बीच, जर्मनी और रूस के बीच की कड़वाहट और बढ़ गई है और अगर रूस ने जर्मनी के खिलाफ सख्त कदम उठाया, तो स्थिति बिगड़ने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। लिहाजा, कई विश्लेषकों ने कहना शुरू कर दिया है, कि वैश्विक आर्थिक मंदी आ चुकी है।

आ चुकी है आर्थिक मंदी?
अगर रूस, जर्मनी को गैस सप्लाई रोकने की कोशिश करता है, तो जर्मनी ये विचार कर रहा है, कि उस स्थिति में वो अगले साल अपनी उधार सीमा में सख्ती लगा देगा। यानि, जर्मनी आयात कम कर देगा। वहीं, जापान में घरेलू खर्च काफी कम हो गया है, जिसकी वजह से जापानी अर्थव्यवस्था में सुधार की संभावनाए काफी कम हो गई हैं। ब्लूमबर्ग ने वैश्विक आर्थिक मंदी को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें दुनियाभर के बाजारों का विश्लेषण किया गया है और उसके आधार पर कहा गया है, कि ये आर्थिक मंदी के आ जाने के संकेत हैं।

केन्द्रीय बैंकों ने बढ़ाए ब्याज दर
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, ये हफ्ता दुनियाभर के केन्द्रीय बैंकों के लिए काफी व्यस्त रहा है, क्योंकि दुनिया भर में एक दर्जन से अधिक देशों के केन्द्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर दी है, जिससे हंगरी में 200 अंक,पाकिस्तान में 125 आधार अंक और अन्य आठ देशों में 50 या 100 के बीच अंक बढ़े हैं। वॉल स्ट्रीट पर मंदी के आह्वान जोर से गाए जा रहे हैं, लेकिन विश्व अर्थव्यवस्था बनाने वाले कई घरों और व्यवसायों के लिए मंदी पहले से ही आ चुकी है। छोटे व्यवसाय के मालिकों, उपभोक्ताओं और अन्य लोगों के बीच की चिंताओं को तथाकथित मिसरी इंडेक्स द्वारा चित्रित किया गया है, जो बेरोजगारी और मुद्रास्फीति दर को दिखाते हैं। कोरोना वायरस के हर लहर ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को पटरी से उतानरे का काम किया। वहीं, साल 2022 की दूसरी छमाही को लेकर भी डर है, कि आपूर्ति तनाव प्रभावित हो सकती है और मजदूर वर्ग गंभीर प्रभावित होंगे।

अमेरिका की क्या है स्थिति?
पिछले एक महीने में अमेरिका में करीब 4 लाख नये लोगों को नौकरी लगी है, लेकिन इसके बाद भी अमेरिका में महंगाई दर पिछले 50 सालों में सबसे ज्यादा है। 50 साल के निचले स्तर के करीब बेरोजगारी दर शायद अमेरिकी श्रम बाजार में अत्यधिक तंगी का पर्याप्त सबूत बन चुका है। लेकिन जून रोजगार रिपोर्ट और अन्य हालिया आंकड़ों से पता चलता है, कि असल में तनाव कितना ज्यादा गंभीर बना चुका है।

यूरोप की क्या है स्थिति
मामले से परिचित लोगों के अनुसार, अगर रूस यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बंद कर देता है, तो जर्मनी अगले साल सख्त उधार सीमा पर लौटने की अपनी योजना को खत्म करने के लिए तैयार है। चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ के गठबंधन के कैबिनेट सदस्यों के बीच एक मौन समझौता हुआ है कि बर्लिन एक आपात स्थिति में अपनी वित्तीय योजनाओं पर नहीं टिक सकता है, जबकी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लंबी अवधि के लिए गैस प्रवाह को समाप्त करने के बहाने के रूप में नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन का काम जल्द शुरू करने के लिए प्रेशर मबनाना काम करे। बैंक ऑफ इंग्लैंड के एक सर्वेक्षण के अनुसार, मुद्रास्फीति, उत्पादन की कीमतों और ब्रिटेन के व्यवसायों के बीच वेतन वृद्धि की उम्मीदें बढ़ रही हैं, जो नीति निर्माताओं को आने वाले महीनों में बड़ी ब्याज दरों में बढ़ोतरी के लिए प्रेरित कर सकती हैं। वहीं, फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारी महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक खर्च का उपयोग करने में असाधारण सफलता ऋण के बढ़ते बोझ के रूप में अपनी सीमा तक पहुंच रही है। वहीं, संसद में बहुमत नहीं मिलने की वजह से फ्रांसीसी राष्ट्रपति की कार्य करने की क्षमता भी कमडोर हो गई है।

एशिया की क्या है स्थिति?'
जापान के परिवारों ने मई में तीन महीने में पहली बार खर्च में कटौती की है, जो इस का संकेत देता है, कि आर्थिक सुधार पहले की तुलना में कमजोर साबित हो रहा है। वहीं, संकेत बढ़ रहे हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था 2020 के बाद पहली बार दूसरी तिमाही में सिकुड़ गई है, देश के आधिकारिक आंकड़ों को नए सिरे से जांच के दायरे में रखा गया है, क्योंकि विश्लेषकों का मानना है कि सरकार उस मंदी को स्वीकार नहीं कर रही है और शायद भी करेगी भी नही। वहीं, बात भारत की करें, तो वैश्विक संकट का भारत पर भी असर पड़ा है और तेल की कीमतों में इजाफा होने से भारतीय आयात में खर्च बढ़ा है। पहली बार ऐसा हुआ है, कि डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 79 के आंकड़े को पार कर गया है। वहीं, थाईलैंड की खुदरा मुद्रास्फीति जून में बढ़कर 14 साल के नए उच्च स्तर पर पहुंच गई है। यानि, कई एक्सपर्ट्स का कहना है, कि वैश्विक आर्थिक मंदी आ चुकी है और अब इससे लड़ने की जरूरत है।

और तेज गिरेगा भारतीय रुपया
डीबीएस बैंक इंडिया के प्रबंध निदेशक आशीष वैद्य ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि, "मौजूदा स्थानीय मैक्रो सेटअप मुख्य रूप से तेल आयात के कारण रिकॉर्ड चालू खाता घाटे से प्रेरित है।" उन्होंने कहा कि, "इसके साथ-साथ, उच्च अमेरिकी रेट ट्रेजेक्टरी और जोखिम लेने की भावना भी घटी है, जिसकी वजह से अमेरिकी डॉलर मजबूत हो रहा है और भारतीय रुपये पर इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है। आशीष वैद्य ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि, 'विदेशी कर्ज की मैच्योरिटी पूरा होने की वजह से भारतीय रुपये पर प्रेशर और भी ज्यादा बढ़ जाएगा'। उन्होंने कहा कि, 'अगले तीन से 6 महीनों के बीच स्थिति खराब हो सकती है और बाजार में अस्थिरता पैदा हो सकती है, हालांकि, उसके बाद इसमें सुधार का दिखना शुरू हो जाएगा'

भारत का व्यापार घाटा बढ़ा
ताजा आंकड़ों से पता चला है कि, भारत का व्यापार घाटा सिर्फ जून महीने में बढ़कर रिकॉर्ड 25.63 अरब डॉलर हो गया है, जो भारत सरकार के लिए बड़ा टेंशन है, क्योंकि भारत सरकार की कोशिश लगातार व्यापार घाटे को पाटने की रही है, ताकि देश का निर्यात बढ़ाने के साथ साथ विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाया जाए, लेकिन इस पहल में सरकार को बड़ा झटका लगा है। रिकॉर्ड व्यापार घाटे के पीछे की सबसे बड़ी वजह पेट्रोलियम, कोयले और सोने के आयात में भारी बढ़ोतरी को बताया जा रहा है, वहीं जून महीने में भारत के निर्यात में भारी गिरावट भी दर्ज की गई है, जिससे रुपये में और गिरावट आई है और बड़े करेंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) के बारे में चिंता बढ़ गई है। सोमवार को जारी भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों से पता चला है कि, जून में भारत का व्यापारिक निर्यात 16.8% बढ़कर 37.9 अरब डॉलर हो गया है, जो मई के मुकाबले 20.5% से कम था, जबकि भारत के आयात में 51% का उछाल आया है और जून महीने में भारत का आयात बढ़कर 63.58 अरब डॉलर हो गया है। वहीं, पिछले साल से तुलना करें, तो साल 2021 के जून महीने में भारत का व्यापार घाटा 9.61 अरब डॉलर था।
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