क्या चीन के लिए श्रीलंका को कंट्रोल करने का मौका हमेशा के लिए खत्म हो गया? भारत उठा पाएगा फायदा?
करीब दो महीने पहले ही श्रीलंका ने घोषणा कर दी थी, कि वह इस साल 7 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज का पुर्नभुगतान नहीं कर पाए। श्रीलंका ने कहा कि, उसे हर साल 2026 तक औसतन सालाना 5 अरब डॉलर का पुर्नभुगतान करना होगा।
नई दिल्ली, जुलाई 10: श्रीलंका में आर्थिक तबाही मची हुई है और उसका सीधा असर देश की राजनीतिक व्यवस्था पर हो रही है। राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे राष्ट्रपति भवन से भाग चुके हैं और आगामी 13 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा देंगे, वहीं, प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के घर को भी प्रदर्शनकारियों ने जला दिया है। कुल मिलाकर श्रीलंका संकट अपने चरम पर है और खुद प्रधानमंत्री देश के दिवालिया होने की घोषणा कर चुके हैं। ऐसे में कई एक्सपर्ट्स का अब मानना है, कि इस आर्थिक दुर्दशा ने हमेशा के लिए श्रीलंका का दरवाजा चीन के लिए बंद कर दिया है, वहीं सवाल ये भी पूछे जा रहे हैं, कि क्या भारत इसका फायदा उठा पाएगा?

दिवालिया हो गया श्रीलंका
श्रीलंका में आए इस भीषण आर्थिक संकट का सबसे बड़ा वीलेन चीन बताया जा रहा है और चीनी कर्ज में फंसकर ही श्रीलंका दिवालिया हो गया। महत्वपूर्ण वस्तुओं के आयात के लिए सरकार की विदेशी मुद्रा समाप्त होने के बाद द्वीप राष्ट्र श्रीलंका के 2 करोड़ 20 लाख लोगों ने महीनों तक सरपट दौड़ती महंगाई और लंबी बिजली कटौती का सामना किया है। प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे ने कहा कि, एक वक्त आर्थिक तौर पर समृद्ध रहा श्रीलंका में इस साल के अंत तक स्थिति और खराब हो जाएगी और देश में भोजन, ईंधन और दवा की भारी कमी जारी रहेगी। श्रीलंका के प्रधानमंत्री ने कहा कि, "हमें 2023 में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा और यही सच्चाई है।" श्रीलंका के राष्ट्रपति ने इसी महीने अपने देश की संसद को बताया है, कि देश अब दिवालिया हो चुका है और स्थिति अभी और बिगड़ने वाली है और जो तस्वीरें श्रीलंका से आ रही हैं, वो यही बताती हैं, कि स्थिति काफी बिगड़ चुकी है।

विदेशी कर्ज चुकाने में हो गया नाकाम
करीब दो महीने पहले ही श्रीलंका ने घोषणा कर दी थी, कि वह इस साल 7 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज का पुर्नभुगतान नहीं कर पाए। श्रीलंका ने कहा कि, उसे हर साल 2026 तक औसतन सालाना 5 अरब डॉलर का पुर्नभुगतान करना होगा। विदेशी मुद्रा संकट के कारण भारी कमी हो गई है जिससे लोगों को ईंधन, खाना पकाने और दवा सहित आवश्यक सामान खरीदने के लिए लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ा है। वहीं, मई महीने में श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के गवर्नर ने कहा था कि, उनका देश आर्थिक संकट टालने के लिए कर्ज नहीं चुका रहा है। यानी ये प्रिएम्टिव डिफॉल्ट है। बता दें कि, किसी भी देश को दिवालिया तब घोषित किया जाता है जब वहां की सरकार दूसरे देशों या अंतरराष्ट्रीय संगठनों से लिया गया उधार या उसकी किस्त समय पर नहीं चुका पाती। ऐसी स्थिति में देश की प्रतिष्ठा, मुद्रा और उसकी अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचता है और श्रीलंका के साथ भी यही हुआ है।

चीन से कर्ज पर कर्ज लेता रहा श्रीलंका
भारत और अमेरिका ने श्रीलंका को बार बार सलाह देने की कोशिश की, कि चीन से कर्ज लेना उसके लिए अच्छा नहीं होगा, लेकिन चीन के प्रेम में पागल हो चुके पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे नहीं माने और उन्होंने आईएमएफ के बजाए चीन से छिपे शर्तों पर कर्ज लेना जारी रखा। फिलहाल की स्थिति ये है, कि श्रीलंका की जीडीपी का 125 प्रतिशत उसके ऊपर कर्ज है और श्रीलंकन करेंसी की वैल्यू लगातार गिरने की वजह से कर्ज ये आंकड़ा और बढ़ता ही जा रही है। आकड़ों के मुताबिक, श्रीलंका को साल 2026 तक 25 अरब डॉलर का कर्ज चुकाना है और उसके ऊपर कुल 51 अरब डॉलर का कर्ज है, जबकि श्रीलंका के पास विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो चुका है और अब किसी भी देश से सामान नहीं खरीद सकता है। चीन से कर्ज लेकर श्रीलंका पहले ही अपना हंबनटोटा बंदरगाह गंवा चुका है, वहीं चीन ने किन शर्तों के हिसाब पर श्रीलंका को कर्ज दिया है, उसका भी अभी तक खुलासा नहीं हुआ है। लेकिन, कई रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि श्रीलंका ने चीन से करीब 6 अरब डॉलर का कर्ज लिया हुआ है और इस साल जनवरी में चीन ने कर्ज में किसी भी तरह की रियायत देने से इनकार कर दिया।

भारत उठा पाएगा संकट का 'फायदा'
भारत ने अपनी 'पड़ोसी प्रथम' नीति के तहत श्रीलंका की काफी मदद की है और भारत लगातार श्रीलंका में खाद्य सामग्रियों के साथ साथ तेल की भी सप्लाई कर रहा है। इसके साथ ही भारत की तरफ से श्रीलंका को एक अरब डॉलर का क्रेडिट लाइन और डेढ़ अरब डॉलर की मदद भी की गई है। वहीं, श्रीलंका की विकराल स्थिति का दोष पूरी तरह से राजपक्षे इनकॉर्पोरेटेड के दरवाजे पर है, जिसने बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर चीन से काफी ज्यादा ब्याज दर पर कर्ज लिया और देश को गंभीर आर्थिक तनाव में ला खड़ा किया है। आज की स्थिति ये है, कि अब श्रीलंका को कौन इस झंझावात से निकालकर आगे ले जाएगा, कोई नहीं जानता। श्रीलंका इस विकराल हालत से निकले, इसमें भारत काफी अहम भूमिका निभा रहा है और विशेषज्ञों का कहना है कि, भारत ने अगर सही तरीके से इसका फायदा उठा लिया, तो वो श्रीलंका में चीन के लिए दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर सकता है।

चीन दे चुका है टका सा जवाब
जब इस साल जनवरी महीने में चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने श्रीलंका का दौरा किया था और उस दौरान श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने चीन से श्रीलंका की आर्थिक स्थिति को देखते हुए कर्ज में छूट देने का अनुरोध किया था। श्रीलंकन राष्ट्रपति ने चीन से दक्षिण एशियाई देश की बिगड़ती वित्तीय स्थिति को नेविगेट करने में मदद करने के प्रयास के तहत श्रीलंका के कर्ज चुकाने के स्ट्रक्चर को फिर से बनाने की अपील की थी, जिसका मतलब ये होता है कि, कर्ज चुकाने के लिए जो साइकिल बना हुआ है,उसमें कुछ मोहलत दी जा और श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे की कार्यालय की तरफ से बकायदा ये अनुरोध जारी किया गया था, लेकिन श्रीलंका ने किसी भी तरह का मदद देने से साफ इनकार कर दिया था। श्रीलंकन राष्ट्रपति के इस अनुरोध के बाद चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स में एक बड़ा लेख लिखकर ना सिर्फ सार्वजनिक तौर परश्रीलंका के अनुरोध को ठुकरा दिया, बल्कि ग्लोबल टाइम्स के लेख में भारत, अमेरिका समेत पश्चिमी देशों के खिलाफ चीन ने आरोप भी लगाए थे।












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