क्या राजधानी काबुल तालिबान की गिरफ्त में आ गई है? 10 बिंदुओं में जानिए अफगानिस्तान पतन की कहानी
रविवार को तालिबान विद्रोहियों ने जलालाबाद शहर पर कब्जा कर लिया है और प्रभावी रूप से राजधानी काबुल अब देश के बाकी हिस्सों से अलग-थलग पड़ चुका है।
काबुल, अगस्त 15: अफगानिस्तान सरकार के पास अब कहने के लिए सिर्फ काबुल बचा है और तालिबान अफगानिस्तान में तेजी से आगे बढ़ रहा है। रविवार को विद्रोहियों ने जलालाबाद शहर पर कब्जा कर लिया है और प्रभावी रूप से राजधानी काबुल अब देश के बाकी हिस्सों से अलग-थलग पड़ चुका है। यानि, देखा जाए तो सरकारी नियंत्रण में अब सिर्फ काबुल बचा है। एसोसिएटेड प्रेस समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी, जिन्होंने शनिवार को फिर से तालिबान को चुनौती दी थी, वो अब काफी तेजी से अलग-थलग दिखाई दे रहे हैं। इस बीच, रॉयटर्स की रिपोर्ट है कि अमेरिका ने पहले ही तालिबान की मजबूत स्थिति को भांपते हुए राजधानी काबुल से अपने अधिकारियों को निकालना शुरू कर दिया है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या काबुल पर तालिबान राज स्थापित हो गया है...आईये 10 महत्वपूर्ण स्थितियों से समझते हैं।
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जलालाबाद पर कब्जा
काबुल के बाहर अंतिम प्रमुख शहर जलालाबाद रविवार को तालिबान के हाथों में चला गया है। जिसने राजधानी को पूरब के हिस्से से काटकर अलग कर दिया है। इसके साथ ही अब काबुल से बाहर निकलने का एक भी सड़क मार्ग नहीं बचा है और हर रास्ते पर तालिबान का नियंत्रण स्थापित हो चुका है। इतना ही नहीं, अफगानिस्तान से मिल रही रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी काबुल की तरफ हजारों तालिबान के लड़ाके हथियारों के साथ बढ़ रहे हैं और माना जा रहा है कि अब अशरफ गनी सरकार के पास सिर्फ दो विकल्प हैं। या तो तालिबान के सामने आत्मसमर्पण करते हुए देश छोड़ दें...या फिर राजधानी को भीषण रक्तपात के लिए तैयार करें।

जलालाबाद पतन के मायने
तालिबान के लिए जलालाबाद जीतने का क्या अर्थ है? एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, यह अफगानिस्तान की केंद्र सरकार को देश की 34 में से सिर्फ काबुल और सात अन्य प्रांतीय राजधानियों के नियंत्रण में छोड़ देता है। वहीं, जलालाबाद और कंधार से राष्ट्रीय राजधानी में खाद्य पदार्थों समेत रोजमर्रा की तमाम दूसरी वस्तुओं की सप्लाई की जाती थी, जो अब रूक गया है। यानि, राजधानी बचाने के लिए इन जगहों पर दोबारा सरकार को नियंत्रण हासिल करना पड़ेगा, जो अब असंभव दिख रहा है। यानि, तालिबान के लिए काबुल का रास्ता काफी आसान हो गया है।

अफगान सेना का पतन
सिर्फ एक हफ्ते में तालिबान ने अफगानिस्तान के सभी बड़े शहरों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है और अफगान सैनिकों के सामने या तो आत्मसमर्पण करने या फिर मौत चुनने का विकल्प रखा था। जिसका नतीजा ये हुआ कि ज्यादातर अफगानिस्तान की आर्मी ने सरेंडर कर दिया। हालांकि, अमेरिकी सेना द्वारा अफगान बलों को कुछ देर तक हवाई सहायता जरूर दी गई, लेकिन अमेरिका ने फिर से हवाई सेवा देना बंद कर दिया। इसके साथ ही अमेरिका ने कहा है कि वो 31 अगस्त के बाद अफगानिस्तान में सेना को कोई सहयोग नहीं करेगा।

दूतावास खाली कर रहा अमेरिका
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने दो अधिकारियों के हवाले से बताया कि अमेरिका ने पहले ही काबुल में अपने दूतावास से राजनयिकों को निकालना शुरू कर दिया है। अधिकारियों में से एक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि, "हमारे पास लोगों का एक छोटा जत्था अब अमेरिका जा रहा है, और ज्यादातर दूतावास के कर्मचारी जाने के लिए तैयारी कर रहे हैं, हालांकि, दूतावास का काम जारी रहेगा''। माना जा रहा है कि अफगानिस्तान के कुछ अधिकारी ही अमेरिकी दूतावास को भी चलाएंगे...लेकिन तभी तक...जबतक कि काबुल पर तालिबान का कब्जा नहीं हो जाता।

काबुल में एटीएम मशीनें बंद
काबुल में एटीएम मशीनों ने रविवार को नकदी का वितरण करना बंद कर दिया। एटीएम मशीनों के सामने सैकड़ों लोगों की भीड़ पैसे निकालने के लिए नजर आ रही है, लेकिन एटीएम से पैसे नहीं निकल रहे हैं। वहीं बहुत सारे लोग जीवन बीमा की रकम निकालने के लिए भी संबंधित दफ्तरों के पास जमा हो रहे हैं, लेकिन लोगों को पैसा नहीं दिया जा रहा है। अलग अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजधानी काबुल के लोगों के बीच अजीब सी खामोशी पसरी हुई है और लोग तालिबान के संभावित हमले के डर से घरों की बजाए पार्कों में ज्यादा ठहरना पसंद कर रहे हैं।

मजार-ए-शरीफ पर कब्जा
अफगानिस्तान का चौथा सबसे बड़ा शहर मजार-ए-शरीफ शनिवार को तालिबान के हाथों में जा चुका है। मजार-ए-शरीफ तालिबान के विरोध के लिए प्रसिद्ध था और इस तरह पूरे उत्तरी अफगानिस्तान पर विद्रोहियों का नियंत्रण स्थापित हो चुका है। सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि तालिबान ने मजार-ए-शरीफ में सिर्फ 10 दिनों में कब्जा कर लिया है और अफगान सेना और मिलिशिया की करारी हार हुई है।

सीमा पार भागे सरदार
समाचार एजेंसियों के मुताबिक मजार-ए-शरीफ के दो सरदारों अट्टा मोहम्मद नूर और अब्दुल राशिद दोस्तम ने तालिबान के खिलाफ प्रतिज्ञा ली थी और तालिबान के खिलाफ शहर में पिछले हफ्ते रैलियां भी निकाली गईं थीं। लेकिन अब बताया जा रहा है कि दोनों सरकार जान बचाने के लिए उज्बेकिस्तान भाग चुके हैं और पूरे शहर में तालिबान का झंडा लहरा रहा है।

महिला जिला राज्यपालों ने मानी हार
तालिबान के खिलाफ कई दिनों से लड़ाई लड़ने वाली मजार-ए-शरीफ की रहने वाली महिला जिला राज्यपाल सलीमा मजारी ने भी हार मान ली है। उन्होंने पहले आशंका जताई थी कि तालिबान के आते ही महिलाओं को घरों की चाहरदीवारी में कैद कर लिया जाएगाा और तालिबानी शासन में महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं होगा। अब सलीमा मजारी भी नाम मात्रा की राज्यपाल रह गई हैं।

नागरिकों को निकाल रहा अमेरिका
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राज्य अमेरिका अपने नागरिकों को अफगानिस्तान के अलग अलग शहरों से निकालने के लिए राजधानी काबुल में और अधिक सैनिकों को भेज रहा है। जलालाबाद के पतन ने तालिबान को पाकिस्तान के पेशावर शहर की ओर जाने वाली सड़क का नियंत्रण दे दिया है, जो अफगानिस्तान में मुख्य राजमार्गों में से एक है। वहीं, अमेरिका की तरफ से साफ किया गया है कि काबुल पहुंचने वाले सैनिकों का काम सिर्फ वहां मौजूद अमेरिकन्स को बाहर निकालना है।

सभी प्रांतीय राजधानियों पर कब्जा
लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार तालिबान के नियंत्रण में अब सभी प्रांतीय राजधानियां, जरंज, शेबरघन, सर-ए-पुल, कुंदुज, तालोकान, अयबक, पुल-ए-खुमरी, फैजाबाद, गजनी, फ़िरस कोह, काला-ए-नव हैं। कंधार, लश्कर गाह, हेरात, पुल-ए-आलम, मजार-ए-शरीफ और जलालाबाद पर भी तालिबान का नियंत्रण है और अब काबुल पर तालिबान का कब्जा होना वक्त की बात रह गई है।












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