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ग्राउंड रिपोर्ट: 'ड्राइंग बनानी थी, बच्चे ने बनाया पिता की हत्या का रेखाचित्र'

By Bbc Hindi
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    मोहम्मद नूर, nitin srivastava bbc
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    मोहम्मद नूर, nitin srivastava bbc

    डेढ़ दर्जन बच्चे सुर से सुर मिलाकर म्यांमार के राष्ट्रगान का रियाज़ कर रहे हैं.

    वहीं, बगल के कमरे में एक दर्जन महिलाएं हाथ से सिलाई का काम कर रहीं हैं और रोज़ शाम उन्हें इसके लिए 50 टका ( करीब 40 रुपए) मिलते हैं.

    ये जगह है बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार का बालूखली रिफ़्यूजी कैंप जहाँ ये बच्चे और इनके परिवार म्यांमार से अपनी जान बचाकर पहुँच सके हैं.

    खुद के देश से पराए हुए इन बच्चों में से कई ने अपनी आंखों के सामने अपनों को मरते देखा है. महीनों पुरानी इन यादों के ज़ख्म आज भी उनके ज़ेहन में ताज़ा हैं.

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    बच्चों का हौसला बढ़ाने की एक क्लास, nitin srivastava bbc
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    बच्चों का हौसला बढ़ाने की एक क्लास, nitin srivastava bbc

    इन्हीं बच्चों में से एक बच्चा बेहद ख़ामोश है और रह-रह कर खिड़की से बाहर देखता है. मोहम्मद नूर की उम्र बारह वर्ष है और पिछले साल लंबी बीमारी के बाद उनके पिता का निधन हो गया था.

    विधवा मां के अलावा उनकी तीन बहनें हैं और रखाइन प्रांत के एक छोटे से गाँव में नाबालिग नूर सब्ज़ी उगाकर सबका पेट भरने की कोशिश कर रहे थे.

    लेकिन म्यांमार में हुई हिंसा के बाद मोहम्मद नूर की दुनिया एक ही दिन में बदल गई.

    मोहम्मद नूर ने बताया, "उस दिन मैं सब्ज़ी बेचने के लिए बाज़ार में बैठा ही था कि नकाब पहने हुए कुछ लोग आए और धारदार हथियारों से हमला शुरू कर दिया. मैंने अपने दो चचेरे भाइयों को वहीं पर मरते देखा. भाग कर घर पहुंचा और अपने परिवार को लेकर सीमा की तरफ़ चल दिया. अभी भी याद करता हूँ मन भारी हो जाता है. आज भी उस बात की बेचैनी है."

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    बालूखली रेफ़्यूजी कैंप, nitin srivastava bbc
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    बालूखली रेफ़्यूजी कैंप, nitin srivastava bbc

    पिछले साल अगस्त महीने में म्यांमार में ज़बरदस्त हिंसा भड़की थी. इसके बाद क़रीब सात लाख रोहिंग्या मुसलमानों ने अपनी जान पर बने ख़तरे से बचने के लिए बांग्लादेश में शरण ली थी.

    अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का अनुमान है कि इस आंकड़े में कम से कम तीन लाख नाबालिग़ हैं, जिन्हें लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं.

    ज़्यादातर दिक्कतें मनोवैज्ञानिक हैं जो वयस्कों के साथ-साथ नाबालिग बच्चों को बुरी तरह सता रही हैं. बच्चों में अवसाद यानी डिप्रेशन के मामले बढ़ रहे हैं और साथ ही मनोवैज्ञानिकों की ज़रूरत भी.

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    महमूदा, nitin srivastava
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    महमूदा, nitin srivastava

    महमूदा एक मनोचिकित्सक हैं जो पिछले चार महीनों से संयुक्त राष्ट्र की ओर से कॉक्स बाज़ार में काम कर रही हैं.

    उनके मुताबिक़ लगभग सभी शरणार्थी अपने घरों से बेघर होने के सदमे में हैं, लेकिन बच्चों की हालत सबसे ख़राब है.

    उन्होंने बताया, "इन बच्चों में से किसी ने माँ-बाप की हत्या देखी तो किसी ने गोलियां चलते देखी. किसी ने अपने घरों को जलते देखा. कई बच्चे हैं जो अभी तक उस भयानक नज़ारे को भूल नहीं सके हैं. इन्हें मनोवैज्ञानिक सपोर्ट की सख़्त ज़रूरत है वरना ये पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर या पीटीएसडी का शिकार होते चले जाएंगे."

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    रोहिंग्या बच्चे ने बनाया ये चित्र , nitin srivastava bbc
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    रोहिंग्या बच्चे ने बनाया ये चित्र , nitin srivastava bbc

    मानवाधिकार सगठनों के अनुसार बांग्लादेश के इन नए रोहिंग्या कैंपों में कम से कम 5,000 परिवार ऐसे हैं जिनके मुखिया अब नाबालिग़ बच्चे ही हैं.

    छोटी उम्र में उनके लिए ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गईं हैं, लेकिन साधन घट चुके हैं.

    कैंपों के बीच बने कई मेडिकल कैंपों में जाकर डॉक्टरों से बात करने पर पता चला कि अभी तक ज़्यादा ध्यान हैजा, बुखार, फ़्लू और कुपोषण से निपटने पर ही दिया जा रहा है.

    काफी ज़िद करने पर मेडिकल मदद करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था मेडिका सौं फ्रंतिए (एमएसएफ़) ने हमसे बात करने की हामी भरी.

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    डॉक्टर सिंडी स्कॉट
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    डॉक्टर सिंडी स्कॉट

    कुतुपालोंग इलाके के एक सुरक्षित से मेडिकल सेंटर में जो दिखा वो काफी अफसोसनाक़ था.

    ज़्यादातर इलाज बच्चों का चल रहा था, लेकिन एक पूरा हॉल सिर्फ़ उन नाबालिगों के लिए निर्धारित कर दिया गया है जो मानसिक दिक्कतें झेल रहे हैं.

    एमएसएफ़ की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर सिंडी स्कॉट ने हमें एक दिल दहलाने वाली ड्रॉइंग दिखाई.

    क़रीब डेढ़ दर्जन बच्चों के मनोबल को बढ़ाने की एक पाठशाला के दौरान उनसे आसपास के पर्यावरण का चित्र बनाने को कहा गया.

    9 साल के एक बच्चे को छोड़कर सभी ने पहाड़, नदियां और पेड़ बनाए. लेकिन इस रोहिंग्या मुस्लिम बच्चे ने रखाइन में अपने घर पर हेलीकॉप्टर के हमले और अपने पिता की हत्या का चित्र खींचा.

    डॉक्टर सिंडी स्कॉट ने कहा, "यहाँ पर हालात मुश्किल हैं. लोग बीमार पड़ रहे हैं और बच्चे अपने परिवार को मुश्किलें भुगतते हुए देखते हैं और उन्हें सहारा देने के लिए आस-पास कोई नहीं. कल ही मैं एक बेहद डिप्रेस्ड और परेशान माँ से बात कर रही थी, इस बीच उसके बच्चे कैंप के कोने में डरे-सहमे बैठे थे. उन्हें लग रहा था कि उनकी माँ मरने वाली है."

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    रोहिंग्या बच्चे
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    रोहिंग्या बच्चे

    दरअसल, म्यांमार से बांग्लादेश भागकर आए लाखों शरणार्थियों के भविष्य पर अब तक कोई फ़ैसला नहीं हुआ है. हिंसा और ख़ून-खराबे से बच कर जो बच्चे इन कैंपों में पहुँच सके थे उन्हें किस्मत वाला बताया गया था.

    लेकिन इन्होंने जो देखा है उसकी दहशत आज भी इन्हें सता रही है. इससे बड़ी दिक्कत ये है कि अभी तक इनकी मेन्टल हेल्थ पर ध्यान भी बहुत कम दिया गया है.

    एक ही तस्वीर है जो इनके ज़ेहन में बस चुकी है. अपने पिता या माँ की हत्या की और फिर उस तबाही की जो इन्सानों की शक्ल में आई थी.

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    अपने घर के काम करते हुआ एक रोहिंग्या बच्चा
    MUNIR UZ ZAMAN/AFP/Getty Images
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    English summary
    Ground Report Drawing was done child made drawing of fathers murder

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