पूरे विश्व में बत्ती गुल: भारत-चीन में कोयला खत्म? यूरोप में गैस संकट से हाहाकार, आखिर क्या है माजरा?
चीन और भारत में गंभीर कोयला संकट पैदा हो गया है और चीन के कई प्रांतों में अंधेरा छा गया है। बिजली नहीं होने से मोमबत्तियां जलाई जा रही हैं, वहीं, भारत में अब सिर्फ 3 दिनों के लिए ही कोयला बचा हुआ है।
नई दिल्ली, अक्टूबर 10: अचानक पूरी दुनिया में बेहद गंभीर ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। भारत में सिर्फ तीन दिनों के लिए ही कोयला बचने की बात कही जा रही है। दिल्ली में सरकार ने गुप्प अंधेरा छाने का अंदेशा जताया है, वहीं चीन कई कई राज्य पहले से ही अंधेरे में जा चुके हैं और अफरातफरी मची हुई है। यूरोपीय देशों में गैस की किल्लत ने मानो महंगाई का नल खोल दिया है और लेबनान में अब बिजली बची ही नहीं है। ऐसे में सवाल ये उठ रहे हैं कि आखिर ये माजरा क्या है?

दुनिया में ऊर्जा संकट
इस वक्त दुनिया भर के देश वैश्विक ऊर्जा संकट का खामियाजा भुगत रहे हैं। कुछ चीनी राज्यों में बिजली नहीं हैं तो थोड़ी-थोड़ी देर के लिए अलग अलग राज्यों में बिजली दी जा रही है। लिक्विड गैस के लिए यूरोपीय देशों में लोगों को भारी कीमत चुकाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है और पूरे लेबनान में ही बिजली खत्म हो चुका है। इसके अलावा, भारत में बहुत जल्द कोयला खत्म होने की बात कही गई है। तो संयुक्त राज्य अमेरिका में नियमित गैसोलीन के एक गैलन की कीमत शुक्रवार को 3.25 डॉलर हो चुकी थी, जिसकी कीमत अप्रैल में सिर्फ 1.27 से डॉलर थी। जैसे जैसे वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है और कोविड-19 से महामारी पर दुनिया में नियंत्रण हासिल किया जा रहा है है, वैसे वैसे ऊर्जा सेक्टर पर भारी दवाब पैदा हो रहा है, जिसने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में काफी तनाव पैदा कर दिया है।

ऊर्जा संकट की वजह क्या?
इस साल दिसंबर में दुनिया भर के तमाम नेता जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर होने वाली विश्व की सबसे बड़ी बैठक सीओपी-26 में हिस्सा लेने वाले हैं, जिसमें हरित क्रांति को लेकर बात होगी और ग्रीन एनर्जी क्रांति लाने की बात की जाएगी, लेकिन अभी से ये सवाल उठने लगे हैं, कि क्या ये संभव है। ऊर्जा संकट आज अचानक नहीं आया है, बल्कि पिछले 18 महीने से धीरे-धीरे ऊर्जा संकट गहराता जा रहा था। कोविड-19 पर नियंत्रण के साथ ही अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के कार्यक्रम तेजी से शुरू हो गये, तो दूसरी तरफ पिछले 18 महीने में दुनियाभर के कई हिस्सों में भयानक तूफान आए हैं, जिसने स्थिति बिगाड़ने में बुरी तरह से भूमिका निभाई है।

प्राकृतिक वजह से ऊर्जा संकट
यूरोप में इस बार जलवायु परिवर्तन की वजह से भीषण ठंढ़ पड़ी है, जिसकी वजह से यूरोपीय महाद्वीप में ऊर्जा भंडार को जमीन के अंदर सुखा दिया है। इसके बाद इस साल खाड़ी देशों में बार बार तूफान आए हैं, जिसकी वजह से तेला रिफाइनरियों को बंद करना पड़ा। वहीं, रही सही कसर ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच हद से ज्यादा बढ़ चुके तनाव ने पूरी कर दी है और ऊर्जा संकट के पीछे की एक बड़ी वजह उत्तरी सागर में हवा का कम दवाब बनना है। 'द न्यू मैप: एनर्जी, क्लाइमेट एंड द क्लैश ऑफ नेशंस' के लेखक डैनियल येरगिन ने वाशिंगटन पोस्ट को बताया कि, 'यह संकट एक ऊर्जा बाजार से दूसरे बाजार तक फैलता है।'' उन्होंने कहा, "सरकारें जबरदस्त राजनीतिक प्रतिक्रिया से बचने के लिए सब्सिडी देने के लिए हाथ-पैर मारते हैं, जिसका नतीजा ये संकट है''। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि, 'इस सर्दी में क्या हो सकता है और क्या नहीं, इस बारे में काफी ज्यादा चिंता है, क्योंकि कुछ ऐसा है जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है, और वो मौसम है।'

सर्दी में चरम पर होगी संकट
ग्लास्को में होने वाले सीओपी-26 बैठक से पहले अक्षय ऊर्जा के समर्थक कह रहे हैं कि, इस संकट ने हमें बता दिया है कि हमें जल्द से जल्द जीवाश्म ईंधन से पीछा छुड़ाना चाहिए। जबकि, इसके आलोचकों का कहना है कि, पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा से वैश्विक जरूरतें पूरी नहीं हो सकती हैं। विश्लेषकों की सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है, कि ऊर्जा संकट की वजह से पूरी दुनिया में आर्थिक सुधार के कार्यक्रम तो प्रभावित होंगे ही, इसके साथ ही महंगाई काफी ज्यादा बढ़ जाएगी। वहीं, आरोप अब रूस पर भी लग रहे हैं, कि जैसे-जैसे यूरोपीय देश ऊर्जा संकट में बुरी तरह से फंसते जा रहे हैं, रूस उसका फायदा उठा रहा है, जिसको लेकर इंटरनेशनल इनर्जी एजेंसी (आईईए) ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को तलब करते हुए उनसे कहा है कि वो यूरोपीय देशों को गैस की सप्लाई बढ़ाएं। वहीं, एक्सपर्ट्स का कहना है कि, इस बार सर्दी अगर ज्यादा पड़ती है, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर चला जाएगा, क्योंकि जमने की वजह से गैस का प्रोडक्शन कई जगहों पर बंद हो जाएगा।

रूस पर सनसनीखेज आरोप
यूरोपीय संघ ने रूस के ऊपर जानबूझकर गैस की सप्लाई कम कर देने के आरोप लगाए हैं, ताकि पुतिन यूरोपीय देशों पर दवाब बनाकर अफनी 8.1 अरब पाउंड की नाॉर्ड स्ट्रीम-2 गैस पाइपलाइन पर समझौता कर सकें, जो रूस की सरकारी ऊर्जा कंपनी के अंतर्गत होगी और जिससे यूक्रेन को बाहर रखा गया है। हालांकि कई लोग इस पाइपलाइन प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। रूस पहले से ही नॉर्वे के बाद यूरोपीय संघ को गैस का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है, और नॉर्ड स्ट्रीम 2 प्रोजेक्ट के बाद यूरोपीय देश गैस और ऊर्जा के लिए रूस पर इतना ज्यादा निर्भर हो जाएंगे, कि वो आगे जाकर किसी भी मुद्दे पर रूस का विरोध करने की हैसियत में ही नहीं रहेंगे। लिहाजा, पुतिन के इस प्रोजेक्ट का भारी विरोध हो रहा है। बुधवार को व्लादिमीर पुतिन ने यूरोपीय देशों को सुझाव दिया था कि, वो ज्यादा से ज्यादा रूसी गैस खरीदकर अपनी समस्या को सुलझा सकते हैं।

यूरोपीय देशों में बढ़ता तनाव
ऊर्जा संकट की वजह से यूरोपीय संघ के भीतर भी तनाव बढ़ रहा है, और इस संकट के वक्त नेताओं को समझ नहीं आ रहा है कि वो क्या जवाब दें। हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन, जो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी हैं, उन्होंने बुधवार को कहा कि यूरोपीय संघ आंशिक रूप से कीमतों में वृद्धि के लिए जिम्मेदार है और उन्होंने यूरोपीय संघ से अपनी नीति में बदलाव करने की मांग कर डाली। उसी दिन, यूरोपीय संघ के जलवायु प्रमुख फ्रैंस टिमरमैन ने कहा कि, यूरोपीय ब्लॉक के ग्रीन डील को दोष देने वाले केवल 'वैचारिक कारणों' के लिए ऐसा कर रहे हैं, और यह कि जीवाश्म ईंधन संकट को दूर कर देगा और मूल्य वृद्धि समस्या खत्म हो सकती है।

लेबनान में ब्लैकऑउट
इन सबके बीच लेबनान में पूरी तरह से ब्लैकऑउट हो चुका है और देश में कई बड़े बिजली स्टेशन पूरी तरह से कोयले की कमी के कारण बंद हो चुके हैं। लेबनान में 60 लाख से ज्यादा लोग अंधेरे में रह रहे हैं और वहां की सरकार ने साफ कर दिया है कि अभी देश में बिजली पूरी तरह से खत्म हो चुकी है। वहीं, बिजली स्टेशन को चलाने के लिए लेबनान में पहले कोयला खत्म हुआ और फिर डीजल भी खत्म हो गया है। लेबनान के एक सरकारी अधिकारी ने कहा है कि अगले कुछ हफ्तों तक स्थिति में सुधार आने की संभावना ही नहीं है। अधिकारी ने कहा कि, बिजली कंपनियों के पास संयंत्र चलाने के लिए ना कोयला है और ना ही तेल है। अधिकारी ने कहा कि, आपातकालीन स्थिति के लिए सेना के तेल भंडार का इस्तेमाल किया जाएगा, लेकिन अभी इसमें वक्त लगेगा। आपको बता दें कि, 2020 में लेबनान के बेरूत में गैस प्लांट में भीषण हादसा हुआ था, जिसके बाद से ही लेबनान में ऊर्जा संकट भयानक तौर पर मौजूद है।

भारत में भी कोयला खत्म
वहीं, अब भारत में भी चेतावनी दी गई है कि बिजली संयंत्रों के पास सिर्फ तीन दिनों के लिए ही कोयल का भंडार बचा हुआ है और बिजली संयंत्रों में कोयले का भंडार रिकॉर्ड स्तर पर कम हो चुका है। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि, भारत के 135 कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों में से आधे से ज्याजा संयंत्रों के पास तीन दिनों से कम का ईंधन स्टॉक है, जो संघीय दिशानिर्देशों से बहुत कम है। क्योंकि, नियमों के मुताबिक हर बिजली संयंत्र के पास कम के कम 2 हफ्ते का कोयला स्टॉक होना चाहिए।

राजधानी दिल्ली में बत्ती गुल!
कोयले की संकट की वजह से कुछ उत्तरी राज्य और कुछ पूर्वी राज्यों में अंधेरा हो गया हया है और अब आशंका राजधानी दिल्ली में ब्लैकऑउट होने की है। अधिकारियों ने कहा है कि इस साल सर्दी में बिजली संकट काफी गहरा सकता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार से राजधानी के प्लांटों में कोयला और गैस आवंटित करने की अपील की है। रिपोर्ट के मुताबिक, कोयले की कमी उद्योगों की मांग में वृद्धि के कारण हुई है।

चीन में काफी ज्यादा बुरी स्थिति
इस बीच चीन एक दशक में अपने सबसे खराब बिजली संकट से जूझ रहा है। बिजली की कमी वाले शहर ब्लैकआउट की चपेट में आ गए हैं और कारखानों को बंद करने के लिए मजबूर किया गया है या फिर हर हफ्ते कारखानों को कुछ घंटे के लिए खोला जा रहा है। पिछले 15 दिनों से चीन में बिजली संकट काफी ज्यादा है और कोयले की संकट चीन में भी काफी ज्यादा बढ़ चुकी है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के बिजली स्टेशन काफी ज्यादा घाटे में चल रहे थे, जिसकी वजह से उन्हें बंद करना पड़ा है। चीन के कई प्रांतों में बिजली के लिए हाहाकार है। कई इलाकों में लोगों को रात में मोमबत्ती का सहारा लेना पड़ा है और बिजली संकट की वजह से मोबाइल नेटवर्क भी डॉउन हो गया है।












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