भारत को छोड़कर कंगाल देश पाकिस्तान का साथ क्यों दे रहा जर्मनी? ये 3 वजह जान लीजिए
जर्मनी का कश्मीर राग और पाकिस्तान के लिए प्रेम ऐसे ही नहीं दिख रहा है। इसकी कई वजहें हैं।
जर्मनी (germany) ने कश्मीर मुद्दे(Kashmir conflict) पर पाकिस्तानी राग अलापाना शुरू कर दिया है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो (Bilawal Bhutto Zardari) संग एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में जर्मनी की विदेश मंत्री एनालीना बेयरबॉक (annalena baerbock) ने कहा कि कश्मीर में तनाव और युद्ध की स्थिति बनी हुई है। जर्मनी ने इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के दखल की मांग की है। हालांकि भारत ने जर्मनी के विदेश मंत्री के बयान पर कड़ी टिप्पणी करते हुए उनके बयान को पूरी तरह से अस्वीकार्य बताया है।

एनालेना बेयरबॉक ने उठाया कश्मीर मुद्दा
दरअसल पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो इन दिनों जर्मनी के दौरे पर हैं। शुक्रवार को बर्लिन में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जर्मनी की विदेश मंत्री एनालेना बेयरबॉक ने कहा था कि संघर्षों को सुलझाने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि 'हम एक शांतिपूर्ण दुनिया में रहें', दुनिया के हर देश की भूमिका और जिम्मेदारी है। हालांकि इस दौरान 41 वर्षीय एनालेना बेयरबॉक ने जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा पल रहे आतंकवाद का जिक्र तनिक भी जिक्र नहीं किया। इसके बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने एक बयान जारी कर कहा कि वैश्विक समुदाय के सभी ईमानदार देशों की अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और मुख्यतः सीमापार आतंकवाद को खत्म करने की जिम्मेदारी है।

जर्मनी ने भारत पर पहले भी की थी टिप्पणी
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब जर्मनी ने भारत को लेकर कोई गैरजरूरी बयान दिया है। इससे पहले जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर की गिरफ्तारी पर भी एक बयान जारी करते हुए भारत के लोकतंत्र पर तंज कसा था। जर्मनी ने कहा था कि भारत स्वंय को दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र होने की दुहाई देता है। ऐसे में भारत से लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे कि- अभिव्यक्ति और प्रेस की आजादी की उम्मीद की जा सकती है। जर्मनी के विदेश मंत्रालय ने कहा कि देश में प्रेस को आवश्यक स्पेस दिया जाना चाहिए। किसी पत्रकार को बोलने और लिखने की वजह से जेल में नहीं डाला जाना चाहिए।

पाकिस्तान की भाषा कैसे बोलने लगा जर्मनी?
अब प्रश्न ये उठता है कि आखिर जर्मनी में पाकिस्तान की भाषा क्यों बोलने लग गया है? ऐसी क्या वजह हो गई है कि जर्मनी जैसे देश को आंतकवाद की फैक्ट्री कहे जाने वाले देश पाकिस्तान का साथ पसंद आने लग गया है? कई विश्लेषकों के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह रूस-यूक्रेन मुद्दे पर भारत का पश्चिमी देशी के उलट किसी भी देश को स्पष्ट समर्थन न देना है। रूस-यूक्रेन युद्ध का सबसे बड़ा शिकार जर्मनी ही हुआ है। जर्मनी रूस से 40 फीसदी ईंधन खरीदता था, लेकिन अब रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों से जर्मनी पर संकट आ चुका है।

भारत के बढ़ते वर्चस्व से जलता है जर्मनी
जबकि पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन होने के बाद स्थिति बदल चुकी है। अब वही पाकिस्तान जो कि रूस से संबंध बनाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए था अब, रूस के खिलाफ खतरनाक हथियारों को यूक्रेन पहुंचाने में अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद कर रहा है। ब्रिटेन दौरा सफल रहने के बाद अब पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा अमेरिका का दौरा करने वाले हैं। इसके अलावा जर्मनी भारत के बढ़ते वैश्विक वर्चस्व से भी खार खाता है। नाटो का सदस्य होने के बावजूद अमेरिका ने जमर्नी को यूएन सिक्योरिटी काउंसिल विस्तार के मामले में अधिक अहमियत नहीं दी। यूएन सिक्यॉरिटी काउंसिल में न सिर्फ अमेरिका बल्कि जापान और ब्राजील ने भी भारत की स्थायी सदस्यता की वकालत की थी।

शरणार्थी समस्या से त्रस्त्र है जर्मनी
इसके अलावा तीसरी वजह जर्मनी में शरणार्थी समस्या है। दरअसल बीते साल 15 अगस्त को अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बाद विदेशी फौजें अपने देश चली गईं तो पाकिस्तान के हाथ में भी वह चाबी आ गई जो यूरोप में उसकी स्थिति को मजबूत कर सकती है। जर्मनी वह जगह है जहां पर अफगानिस्तान के शरणार्थियों की संख्या हजारों में है। अब जर्मनी चाहता है कि इस शरणार्थी संकट से निपटने में पाकिस्तान उसकी मदद करे। जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्कोल्जो ने भी अफगानिस्तान के शरणार्थियों को पाकिस्तान में जगह देने की वकालत की है। जर्मनी यह भी चाहता है कि पाकिस्तान न सिर्फ इन शरणार्थियों की स्क्रीनिंग करे बल्कि सुन्नी पश्तून शरणार्थियों को वहीं पर रोक दे।












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