जॉर्ज सोरोस करते थे चीन की दलाली, इंदिरा गांधी के समय भी थे एक्टिव.. जानिए भारत से क्यों करते हैं नफरत?
George Soros Anti-India Agenda Explained: कई भारतीयों को शायद लगता होगा, कि हंगरी में जन्मे अमेरिकी व्यवसायी जॉर्ज सोरोस अकेले ही एंटी-इंडिया एजेंडा चलाते हैं और इसके लिए वो गैर- सरकारी संगठनों को फंड करते हैं, लिहाजा वो अकेले ही भारतीय लोगों को खलनायक लगते होंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। गहराई से देखने पर पता चलता है, कि इस स्क्रिप्ट में कई किरदार हैं और उन किरदारों को रिमोट से कंट्रोल किया जाता है।
गहराई से देखने पर ऐसा लगता है, कि जॉर्ज सोरोस, वैश्विक ताकतों और यहां तक कि, देश के भीतर के लोगों के साथ भी मिला हुए हैं, जो भारत की छवि, भारत की मजबूत सरकार और भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।

जॉर्ज सोरोस का ये सपना अब छिपा हुआ नहीं रहा, कि उनका एजेंडा भारत को बदनाम करना, भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार को बदनाम करना, मोदी सरकार को सत्ता से हटाना ही उनका मकसद है, ताकि भारत, जो मजबूती से जियो-पॉलिटिक्स में हावी हो रहा है और जो अपनी मर्जी से, अपने मन के मुताबिक अपनी वैश्विक नीति बनाता है, उसकी मजबूती को तोड़ा जा सके।
कुछ विश्लेषकों के मुताबिक, जॉर्ज सोरोस का इसी साल दिया गया यह बयान, कि 'मोदी सरकार का जाना भारतीय लोकतंत्र का पुनरुत्थान होगा' यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की खुली धमकी के अलावा और कुछ नहीं है।
भारत के खिलाफ कुख्यात रहे हैं जॉर्ज सोरोस
जॉर्ज सोरोस आज से नहीं, बल्कि कई दशकों से भारत के खिलाफ एजेंडा चलाते रहे हैं और साल 1980 में पहली बार चीन के साथ इनके लिंक का खुलासा हुआ था। उस वक्त पता चला था, कि चीन के साथ मिलकर ये भारत के पड़ोसी देशों में चीन के लिए रास्ता बनाने का काम कर रहे है। इसके तहत भारत और भारत के पड़ोसी देशों में चीन के समर्थन में लगातार आर्टिकिल लिखे गये।
वहीं, इस बार जॉर्ज सोरोस और उसके गिरोह का भारत विरोधी अभियान उस वक्त चल रहा है, जब भारत अगले हफ्ते जी20 शिखर सम्मेलन का आयोजन कर रहा है, जिसका मकसद और कुछ नहीं, बल्कि भारत को बदनाम करने वाले अभियान चलाना, भारतीय संस्थानों, अर्थव्यवस्था, कॉरपोरेट्स को बदनाम करना शामिल है।
जॉर्ज सोरोस और एजेंडेबाजों का सबसे बड़ा मकसद नरेन्द्र मोदी को बदनाम करना है, ताकि मजबूत होते भारत को कमजोर किया जा सके।
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं, कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ने वाला भारत, जो आपूर्ति श्रृंखला में चीन को रिप्लेस करने की बात कर रहा है, मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की तरफ बढ़ रहा है, जहां लगातार विदेशी कंपनियां आ रही हैं, वहां की सरकार को अस्थिर करने के लिए बड़े स्तर पर साजिश चलाया जा रहा हो और जॉर्ज सोरोस उसमें एक अहम कड़ी हों।
इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं है, कि एंटी-इंडिया एजेंडे में भारत कई कई पत्रकार और कई विपक्षी नेता भी शामिल हों। और इसी एजेंडे के तहत, जॉर्ज सोरोस के पैसों पर चलने वाली संस्था ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग (OCCRP) ने अडानी ग्रुप के खिलाफ वही आरोप जी20 शिखर सम्मेलन से पहले दोहराए हैं, जो हिंडनबर्ग आज से कई महीने लगा चुका है।
जबकि, उन आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, फिर भी ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग (OCCRP) उन्हीं आरोपों को फिर से दोहराता है, जब अडानी ग्रुप का एपीओ मार्केट में आने वाला है। इन आरोपों से अडानी ग्रुप के शेयर वैल्यू फिर से गिर गये हैं और यही मकसद भी था।
एजेंडाबाजों को फेल करने की जरूरत
आगामी विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों में अपने राजनीतिक भाग्य को पुनर्जीवित करने के लिए "भ्रष्टाचार" का मुद्दा बनाने के लिए, OCCRP रिपोर्ट का इस्तेमाल करना विपक्ष के कुछ नेताओं के लिए सही नहीं है।
भारतीय मतदाता वर्तमान आरोपों को उसी तरह खारिज करने के लिए निश्चित हैं, जैसे उन्होंने तब किया था जब 2019 में पिछले लोकसभा चुनावों से ठीक पहले फ्रांस के साथ राफेल जेट सौदे में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया था।
वैश्विक मंच पर भारतीय अर्थव्यवस्था और कॉर्पोरेट्स को अप्रत्यक्ष रूप से बदनाम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसी कवायदों के पीछे की मंशा या एजेंडे पर सवाल उठाना जरूरी है।
भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जॉर्ज सोरोस को "बूढ़ा, अमीर, मनमौजी और खतरनाक" बताया था और भारतीय विदेश मंत्री का ये कथन सौ फीसदी सच है।

एलन मस्क भी दे चुके हैं धमकी
हाल ही में, एक्स (ट्वीटर) के सीईओ एलन मस्क ने फ्री स्पीच का गला घोंटने और जॉर्ज सोरोस के चंदे पर चलने वाले गैर सरकारी संगठनों की तरफ से चलाए जा रहे 'घृणास्पद भाषण' को रोकने के लिए इन तमाम लोगों को ट्विटर पर प्रतिबंध लगाने की धमकी भी दी थी।
एलन मस्क ने साफ तौर पर कहा था, कि जॉर्ज सोरोस के पैसों पर चलने वाले ये संगठन 'नफरती घटनाओं' को बढ़ावा देते हैं और इसके लिए गलत जानकारियां फैलाते हैं, जो फ्री स्पीच को रोकने और किसी शख्स को बदनाम करने के लिए एक एजेंडा है।
यूरोपीय संघ लगा चुका है प्रतिबंध
यूरोपीय संघ पहले ही जॉर्ज सोरोस पर प्रतिबंध लगा चुका है, लेकिन हमारे देश के राजनेता उस पर अभी भी विश्वास करना चाहते हैं और भारतीय मतदाताओं को विश्वास दिलाना चाहते हैं, कि मानवता और पारदर्शिता के मसीहा ने एक शीर्ष कंपनी के शानदार प्रदर्शन में "भ्रष्टाचार का एंगल" ढूंढ लिया है।
खुद को मानवाधिकार उल्लंघन करने वालों के खिलाफ मसीहा घोषित करने वाले जॉर्ज सोरोस को लेकर साल 1980 में खुलासा हुआ था, कि उन्होंने चीन के एक जासूस के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और उन्होंने चीन में काफी निवेश भी किया था।
उस वक्त भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हुआ करती थीं और वो कितनी सख्त प्रधानमंत्री थीं, इस बारे में लिखने की जरूरत नहीं है। इंदिरा गांधी ने कभी भी अमेरिका की कोई बात नहीं सुनी, लिहाजा जॉर्ज सोरोस ने उस वक्त भी भारत को अस्थिर करने की कोशिश की थी, इंदिरा गांधी के खिलाफ विदेशी मीडिया में सैकड़ों लेख लिखे गये, लेकिन उस वक्त भी भारतीय जनता ने, एंटी-इंडिया कैम्पेन चलाने वालों को खारिज कर दिया।
सोरोस नेटवर्क की भारत में अपना जाल फैलाने की महत्वाकांक्षा को देखते हुए, इसके लिए सबसे आसान तरीका कठपुतली शासन स्थापित करना है। वो इंदिरा गांधी की तरह ही, प्रधानमंत्री मोदी की मजबूत सरकार से डरता है, क्योंकि मोदी सरकार के रहते, भारत में ऐसे एजेंडा का चलना संभव नहीं है।
एक कमजोर भारत, ग्लोबल साउथ की समस्याओं को उजागर करने में सक्षम नहीं होगा और सोरोस नेटवर्क चंद्रयान मिशन की सफलता और यूपीआई के क्षेत्र में वृद्धि के बावजूद, देश और इसकी क्षमताओं के बारे में भ्रम फैलाने के लिए अपने एजेंटों का इस्तेमाल कर भ्रामक जानकारियां फैला रहा है।
भारत के बाहर की ताकतें, और देश के भीतर जो कथित तौर पर सोरोस नेटवर्क के साथ मिले हुए हैं, उन्हें उगाजर करने की जरूरत है, ताकि देश ऐसे लोगों की सच्चाई जान सके।












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