रूस को लेकर G7 ने दिया भारत को बड़ा ऑफर, क्या मोदी सरकार की शर्तों को मानने के लिए तैयार हुआ US?
अमेरिका के शीर्ष अधिकारियों ने कहा है कि, सात देशों का समूह (जी 7) जल्द ही रूसी तेल खरीद पर प्राइस कैप लगाने के लिए एक बैठक बुलाएगा, जिसमें रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जाएगा।
नई दिल्ली, सितंबर 07: यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से ही भारत ने भारी डिस्काउंट पर भारी मात्रा में रूसी तेल का आयात करना शुरू कर दिया था और जो रूस भारतीय तेल आयात की लिस्ट में 10वें नंबर पर हुआ करता था, वो इराक के बाद दूसरे नंबर पर पहुंच गया है। लेकिन, अब मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है, कि भारत सरकार की तरफ से संकेत दिए गये हैं, कि वो जी-7 ग्रुप के उस फैसले पर अपनी सहमति जता सकता है, जिसमें रूसी तेल पर कैप लगाने का प्रस्ताव दिया गया है। अगर भारत ऐसा करता है, तो ये रूस के लिए बहुत बड़ा झटका होगा, हालांकि, भारत सरकार की तरफ से शर्त भी रखी गई है और अगर भारतीय शर्त को मानने के लिए अमेरिका तैयार होता है, तभी भारत ये कदम उठा सकता है, लेकिन जो संकेत मिले हैं, उससे पता चलता है, कि अमेरिका और भारत के बीच में रूसी तेल को लेकर बड़ा समझौता हो सकता है और अमेरिका भारत की शर्तों को मानने के लिए तैयार हो सकता है।

जी7 से भारत को मिला बड़ा ऑफर
अमेरिका के शीर्ष अधिकारियों ने कहा है कि, सात देशों का समूह (जी 7) जल्द ही रूसी तेल खरीद पर प्राइस कैप लगाने के लिए एक बैठक बुलाएगा, जिसमें रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जाएगा। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि, प्राइस कैप लगाने से भारत को फायदा होगा। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, भारत अगर इसका समर्थन नहीं भी करता है, फिर भी भारत इससे लाभान्वित होगा। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के आतंकवादी वित्तपोषण और वित्तीय अपराधों के सहायक सचिव एलिजाबेथ रोसेनबर्ग ने कहा कि, ''भारत के पास उसके बाद भी सस्ती ऊर्जा (रूसी तेल) की कम कीमत तक पहुंच होगी। ऐसा होने के बाद भारत के पास रूस के साथ बारगेन करके और भी कम कीमत पर रूसी तेल हासिल करने का एक विकल्प होगा, जिसका फायदा निश्चित तौर पर भारत को होगा, क्योंकि रूसी तेल की कीमतों पर एक प्राइस कैप का निर्धारण कर दिया जाएगा।''

'रूस पर और नकेल कसेंगे'
अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि, "हम रूस को यूक्रेन पर हमला करने के लिए लाभ और युद्ध प्रीमियम प्राप्त करने की अनुमति नहीं देंगे।" अमेरिकी अधिकारियों ने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा कि, मूल्य सीमा के निर्धारण में इस बात का भी ध्यान रखा जाएगा, कि रूसी तेल पर पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं लगे, बल्कि बाजार में उसके तेल का व्यापार होता रहे, लेकिन मुख्य फोकस इस बात पर रहेगा, कि रूस अपने तेल के पैसे का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में ना करे। यह आश्वासन तब मिला है, जब कई देश ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण उच्च मुद्रास्फीति का सामना कर रहे हैं। और कई देश तो आर्थिक संकट में फंसने की स्थिति में भी पहुंच चुके हैं।

प्राइस कैप का मतलब क्या होता है?
रूसी तेल की कीमतों पर प्राइस कैप लगाने से रूसी तेल का व्यापार तो बाजार में होता रहेगा, लेकिन वो अपनी तेल की की्मतों को एक निश्चित वैल्यू से ऊपर नहीं कर पाएगा, यानि जी7 देशों के साथ साथ जी7 देशों के सहयोगी देश एक निश्चित कीमत से ज्यादा का वैल्यू देकर रूसी तेल का आयात नहीं कर पाएंगे। अगर जी-7 देश रूसी तेल पर प्राइस कैप को लागू करते हैं, तो इसका मतलब ये हुआ, कि परिवहन, बैंकिंग, बीमा या किसी अन्य सेवा में शामिल G7 के किसी भी सेवा प्रदाता को यह प्रमाणित करना होगा, कि रूसी तेल उल मूल्य सीमा से नीचे खरीदा गया है और उन्हें इसका पालन निश्चित तौर पर करना होगा। आर्थिक नीति के लिए अमेरिकी सहायक सचिव और ट्रेजरी के सचिव के सलाहकार बेन हैरिस ने संवाददाताओं से कहा कि, "यह प्राइस कैप पूरी दुनिया के लिए नहीं है, यह जी 7 देशों का प्राइस कैप है, हम जी 7 की पहुंच और प्रभाव का उपयोग कर रहे हैं, इसमें रूस को छोड़कर हर कोई जीतने वाला होगा।"

रूसी तेल व्यापार को कैसे करेगा नियंत्रित?
जी7 दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के द्वारा बनाया गया एक ग्रुप है, जिसमें अमेरिका और उसके सहयोगी देश शामिल हैं और जी7 के फैसले का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। जी7 में अमेरिका के अलावा कनाडा, फ्रांस, इटली, जर्मनी और जापान शामिल है और जी7 देश दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत बीमाकर्ताओं और जहाजों को नियंत्रित करते हैं, जो तेल का परिवहन करते हैं और रूस इस पर बहुत अधिक निर्भर है। इसका मतलब ये हुआ, कि जब एक जहाज किसी किसी भी देश से तेल लेकर अपने गंतव्य स्थान की तरफ निकलता है, तो उस जहाज का बीमा किया जाता है, लेकिन प्रतिबंध लगने के बाद से रूस से तेल खरीदकर निकलने वाले जहाजों का बीमा पश्चिमी देश की इंश्योरेंस कंपनियां नहीं कर रही हैं, लिहाजा इसका गंभीर असर रूस के तेल व्यापार पर पड़ा है। अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी कहा कि, रूस पहले से ही कई खरीदारों के साथ लंबी अवधि के अनुबंध कर रहा है, जो भारी छूट दे रहा है, जिसका मतलब है कि मूल्य कैप तंत्र काम करेगा।

भारत ने रख दी है शर्त
भारत संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में प्राइस कैप की पहल पर चुप्पी बनाए हुए है, भले ही भारत पूरी दुनिया में तेल के सबसे बड़े आयातकों में से एक है और भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चे तेल का आयात करता है। वहीं, रूस अब भारत को तेल बेचने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश बन गया है और रूस से आगे अब सिर्फ इराक ही है। लेकिन, भारत जी7 देशों के प्राइस कैप का समर्थन करेगा या नहीं, फिलहाल भारत ने इसको लेकर खामोशी बना रखी है। इसके अलावा, भारत ने यह सुनिश्चित किया है, कि रूस पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गये प्रतिबंधों को बिना तोड़े रूसी तेल का आयात करे और भारत सरकार ने दलील दी है, कि वह अपनी अर्थव्यवस्था पर कम बोझ डालने के लिए रूसी तेल का आयात करना जारी रखेगा। वहीं, कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि, भारत ने अमेरिका के सामने ये शर्त रखी है, कि भारत प्राइस कैप का समर्थन कर सकता है और यहां तक की रूसी तेल खरीदना भी कम कर सकता है, लेकिन उसके लिए फिर अमेरिका उसे ईरान और वेनेजुएला से तेल खरीदने की इजाजत दे। क्योंकि, भारत अपनी अर्थव्यवस्था के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा।

रूस कम कीमत पर बेचता है तेल
रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतें इस साल की शुरुआत में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गईं। संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों ने रूस पर अपने ऊर्जा निर्यात से अपने राजस्व को सीमित करने के लिए कई प्रतिबंध लगाए हैं। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस से तेल आयात बढ़ाने का फैसला किया। गुरुवार को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था, कि रूस-यूक्रेन संघर्ष की शुरुआत के बाद कुछ महीनों में भारत के कुल तेल आयात टोकरी में रूसी तेल की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत हो गई। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीतारमण ने कहा कि, रूसी तेल के आयात को छूट पर बढ़ाने का निर्णय लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिससे आयात बिलों को कम करने में मदद मिली है। उन्होंने कहा कि, भारी छूट पर रूसी तेल का आयात करने का फैसला भारत का 'महंगाई मैनेजमेंट' है। वहीं, भारतीय विदेश मंत्री भी रूसी तेल को भारत के लिए बेस्ट डील बता चुके हैं।
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