कमजोर वादों के साथ खत्म हो गया G-20 सम्मेलन, जानिए भारत के लिए कितना रहा अहम?

जलवायु परिवर्तन पर कमजोर वादों के साथ जी-20 सम्मेलन खत्म हो गया है। जानिए जी-20 सम्मेलन में भारत का क्या योगदान रहा है।

रोम, नवंबर 01: दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेता जब रोम में जुटे, तो यही माना गया कि, विश्व की सबसे बड़ी चिंता जलवायु परिवर्तन को लेकर किसी ठोस नतीजे पर आक्रामक रणनीति बनाते हुए पहुंचने की कोशिश की जाएगी, लेकिन जी-20 बैठक खत्म होने के साथ ही फिर साबाति हो गया कि, विश्व के तमाम बड़े नेता क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर सिर्फ बड़ी बड़ी बातें ही करने वाले हैं, हकीकत में सिर्फ कमजोर कदम उठाए जाएंगे, जबकि जलवायु परिवर्तन के खतरनाक परिणाम दिखने शुरू हो चुके हैं।

जलवायु परिवर्तन पर उदासीन दुनिया

जलवायु परिवर्तन पर उदासीन दुनिया

दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेता जलवायु परिवर्तन से अधिक आक्रामक तरीके से निपटने के प्रति पूरी तरह से उदासीन नजर आए। हालांकि, कोरोना वैक्सीन से संबंधित मुद्दों को सुलझाने पर तमाम बड़े नेता करीब करीब एकमत थे, जिसमें तेज डब्ल्यूएचओ की वैक्सीन को स्वीकृति देने की प्रक्रिया और अधिक वैश्विक उत्पादन बढ़ाना मुख्य बिंदु में शामिल रहा। सबसे खास बात ये रही कि, वैक्सीन उत्पादन का हब भारत ही बनेगा।

कोल प्लांट पर फैसला

कोल प्लांट पर फैसला

जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में जी-20 शिखर सम्मेलन के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में विदेशों में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण को समाप्त करने पर सहमति व्यक्त की गई। हालांकि, इसके लिए कोई घरेलू समय सीमा भा लक्ष्य भी तय नहीं किया गया है और भारत जैसे प्रमुख कोयला-निर्भर देशों को दूसरे वित्तपोषण विकल्पों के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दी गई है। भारत के ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि, "हेल्थ सेक्शन के तहत एक बहुत ही मजबूत संदेश में इस बात पर सहमति जताई गई है कि कोरोना वायरस इम्यूनिटी बढ़ाने और सुरक्षित समझे जाने वाले टीकों को पारस्परिक रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए।"

ऊर्जा बाजार में स्थिरता पर क्या?

ऊर्जा बाजार में स्थिरता पर क्या?

ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि को स्वीकार करते हुए पीयूष गोयल ने कहा कि, जी-20 देशों में ऊर्जा उत्पादों में स्थिरता लाने की बात पर जोर दिया है और उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच बातचीत को सुविधाजनक बनाने पर सहमति व्यक्त की गई है। जी-20 ने 12.7 अरब डॉलर की ऋण राहत के विस्तार पर अपनी स्वीकृति की मुहर भी लगा दी, जिससे 50 देशों को मदद मिलेगी। गोयल ने कहा, "कुछ अर्थों में विकासशील देशों की ओर से भारत ने नेतृत्व की भूमिका निभाने वाले बहुत सारे एजेंडे को जी-20 देशों ते मुख्या हिस्से में लाया है।"

जलवायु परिवर्तन पर जी-20 में क्या?

जलवायु परिवर्तन पर जी-20 में क्या?

जलवायु परिवर्तन को लेकर पिछले कई महीनों से देखा जा रहा है कि, तमाम वैश्विक नेता बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, लेकिन विश्व के शीर्ष 20 बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों की बैठक में जलवायु परिवर्तन को लेकर की गई घोषणा में सिर्फ इतना कहा गया है कि, ''औद्योगिक क्रांति से पहले के तापमान को लाने के लिए जी-20 तत्पर है और इसके लिए प्रयास किए जाएंगे''। कहा गया है कि, ''जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए साल 2025 तक सवाला 100 अरब डॉलर जुटाने की प्रतिबद्धता की पुष्टि की गई है''। हालांकि, भारतीय प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन को लेकर इटली और फ्रांस के राष्ट्राध्यक्ष से तो बात की ही, इसके अलावा भी पीएम मोदी ने शनिवार की देर रात फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जो विकोडो और सिंगापुर के पीएम ली सीन लूंग से मुलाकात की। जिसमें भारतीय पीएम ने वैश्विक भलाई पर भारत की बात रखी है।

एक शताब्दी में कोयला खत्म

एक शताब्दी में कोयला खत्म

जी-20 सम्मेलन में वैश्विक नेताओं ने जीरो कार्बन उत्सर्जन को लेकर प्रतिबद्धता तो जरूर जताई है, लेकिन अगले 100 सालों में कोयला के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगाने का संकल्प लिया है। वहीं, दुनिया में कोयला के सबसे बड़ा उत्सर्जक देश चीन ने 2060 तक कोयला उत्सर्जन पर पूरी तरह से नियंत्रण हासिल करने का लक्ष्य रखा है। वहीं, रूस और सऊदी अरब ने भी 2060 का तक का लक्ष्य रखा है। जी-20 सम्मेलन में बताया गया है कि, भारत, ब्राजील, जर्मनी और अमेरिका जैसे देश 80 फीसदी से ज्यादा ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन करते हैं।

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