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चीन के पूर्व राजदूत ने कहा, मसूद अजहर पर अपने रुख में बदलाव करे चीन

कोलकाता में रहे चीन के पूर्व काउंसल जनरल माओ सिवेई ने लिखा ब्‍लॉग। सिवेई के ब्‍लॉग से साफ कि जैश-ए-मोहम्‍मद कमांडर मौलाना मसूद अजहर के मुद्दे पर चीन सरकार के अंदर ही हो सकते हैं मतभेद।

बीजिंग। चीन ने एक बार फिर जैश-ए-मोहम्‍मद कमांडर और पठानकोट आतंकी हमले के मास्‍टरमाइंड मौलाना मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने के भारत के प्रस्‍ताव के खारिज कर दिया है। इसके बाद चीन के एक पूर्व राजदूत का मानना है कि चीन को अब इस मुद्दे पर अपना रुख बदलना चाहिए।

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रुख से पड़ता एक सकारात्‍मक असर

कोलकाता के कांसुलेट जनरल के तौर पर रहे माओ सिवेई ने एक ब्‍लॉग लिखकर चीन के मसूद अजहर के रुख के बारे में लिखा है। सिवेई के इस ब्‍लॉग के बाद इस बात की तरफ भी इशारा मिलता है कि आतंकवाद के मुद्दे और हर मसले पर पाकिस्‍तान को समर्थन देने के मुद्दे पर चीन के अंदर ही मतभेद हो सकते हैं। सिवेई ने इस बात का जिक्र खासतौर से किया है कि मसूद अजहर के मुद्दे ने वर्ष 2016 में चीन और भारत के रिश्‍तों पर खासा असर डाला है। माओ ने पाकिस्‍तान का समर्थन तो किया लेकिन यह भी कहा कि चीन पाक को इस बात को समझाए कि कुछ मसलों में इसे चीन की अहमियत समझनी होगी। उन्‍होंने लिखा, 'चीन हमारे 'आयरन बॉर्डर' के साथ रणनीतिक रिश्‍तों का आनंद उठाता है लेकिन कृपया मुद्दों को और न गर्माएं।' उन्‍होंने जिक्र भी किया कि चीन अगर अजहर को यूनाइटेड नेशंस के यूएन 1267 लिस्‍ट में शामिल करने के रास्ते में नहीं आता तो पाकिस्‍तान और भारत के अलावा बाकी दुनिया पर इसका कितना सकरात्‍मक असर होता? पढ़ें-चीन ने फिर अजहर को आतंकी घोषित करने के प्रस्‍ताव पर डाला अड़ंगा

पीएम मोदी की लाहौर यात्रा का जिक्र

वर्ष 1999 में यूनाइटेड नेशंस सिक्‍योरिटी काउंसिल (यूएनएससी) का रेजोल्‍यूशन 1267 आया था जिसका मकसद अफगानिस्‍तान में अल-कायदा और तालिबान पर प्रतिबंध लगाना था। भारत ने इसके तहत ही मौलाना मसूद अजहर को बैन करने का प्रस्‍ताव पेश किया हुआ है। इस पर चीन दो बार अड़ंगा लगा चुका है। अपने आर्टिकल में माओ ने पठानकोट आतंकी हमले की टाइमिंग और इसके प्रभाव की ओर भी ध्‍यान दिलाया है। उन्‍होंने लिखा है कि हमला ठीक उस एक हफ्ते के बाद हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्रिसमस के मौके पर अपने समकक्ष नवाज शरीफ के जन्‍मदिन और उनकी नवासी की शादी पर लाहौर से होकर आए थे। उन्‍होंने लिखा है कि पीएम मोदी का यह कदम दोनों देशों के बीच रिश्‍तों को नए सिरे से शुरू कर सकता था। पठानकोट हमले ने पूरी प्रक्रिया को ही पटरी से उतार दिया।

चीन का नकरात्‍मक प्रभाव

माओ ने यूएन 1267 कमेटी में चीन के नकरात्‍मक असर का भी जिक्र किया है। उन्‍होंने लिखा, 'फरवरी 2016 को भारत ने यूएनएससी में अप्‍लाई किया जो आईएसआईएस और अल कायदा को प्रतिबंध करने वाली कमेटी है, उमें जैश के मिलिट्री चीफ मौलाना मसूद अजहर को इस प्रतिबंध लिस्‍ट में शामिल करने की अपील की। मार्च के अंत तक भारत का प्रस्‍ताव अमल में आता इससे पहले चीन ने हस्‍तक्षेप कर दिया। आधा वर्ष बीत जाने के बाद चीन ने एक बार फिर इस प्रस्‍ताव में टेक्निकल वजहों से अड़ंगा डाल दिया। भारत चीन के प्रयासों से काफी असंतुष्‍ट है।' माओ ने उन तीन घटनाओं का भी जिक्र किया जिसकी वजह मसूद अजहर था। उन्‍होंने, वर्ष 1994 में कश्‍मीर में पांच विदेशी पर्यटकों को बंधक बनाने, फिर वर्ष 1999 में इंडियन एयरलाइंस के प्‍लेन को हाईजैक करने की वजह से उसकी रिहाई और फिर वर्ष 2001 में कश्‍मीर की विधानसभा पर आतंकी हमले के बारे में लिखा है।

26/11 के बाद हाफिज सईद पर बदला रवैया

उन्‍होंने यह भी बताया कि यूएन 1267 में पाक से जुड़े प्रतिबंधों के तीन केसेज का जिक्र किया जिनमें कम से कम तीन बार चीन की भूमिका रही। माओ ने उन मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला दिया जिनमें अप्रैल 2006 और फिर मई 2008 में चीन ने अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम के अलावा फ्रांस के उस प्रस्‍ताव में अड़ंगा डाला था जिसमें लश्‍कर-ए-तैयबा के चीफ को यूएन1267 की लिस्‍ट में शामिल करने का जिक्र था। हालांकि बाद में चीन ने अपना रुख बदला और हाफिज सईद के अलावा जमात-उद-दावा के नेता जकी-उर-रहमान लखवी को इस लिस्‍ट में शामिल किया गया। चीन ने यह कदम मुंबई में हुए खतरनाक 26/11 आतंकी हमलों के बाद उठाया था।

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