चीता प्रोजेक्ट को लेकर गहरी चिंताएं, हमें अंधेरे में रखा गया... विदेशी एक्सपर्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट को बताया

Cheetah project India: दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया के विशेषज्ञों ने भारतीय सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर कहा है, कि 20 चीतों को भारत में ट्रांसफर करने को लेकर उन्हें अंधेरे में रखा गया। ये विदेशी एक्सपर्ट्स 'नेशनल चीता प्रोजेक्ट स्टीयरिंग कमेटी' के सदस्य हैं, जिनकी देखरेख में ही विदेशों से 20 चीते भारत में लाए गये थे और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को चिट्ठी लिखकर परियोजना के मैनेजमेंट को लेकर अपनी पीड़ा जताई है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया है, कि "कुछ चीतों की मौत को बेहद कड़ी निगरानी और अधिक उचित, और समय पर मेडिकल सुविधाएं देकर रोका जा सकता था, यदि समय पर विशेषज्ञ डॉक्टरों को बुलाया जाता और स्थिति को 'अनदेखा' नहीं किया जाता और सिर्फ विंडो ड्रेसिंग नहीं की जाती।

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सुप्रीम कोर्ट को एक्सपर्ट्स ने लिखी चिट्ठी

आपको बता दें, कि नामीबिया से आठ चीतों का पहला सेट पिछले साल 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मध्य प्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ा गया था और अन्य 12 चीते इस साल फरवरी में दक्षिण अफ्रीका से लाए गये थे।

11 मार्च को पहले दो चीतों को जंगल में छोड़े जाने के बाद से कूनो नेशनल पार्क में अभी तक पांच वयस्क चीतों और तीन शावकों की मौत हो गई है।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा दायर एक याचिका पर, जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने चीता परियोजना पर 2013 में लगाए गए प्रतिबंध को हटा दिया था। हालांकि, अदालत चीता परियोजना की निगरानी अभी भी कर रही है।

वहीं, दक्षिण अफ्रीका से लाए गये दो चीतों तेजस और सूरज की मौत के बाद, जिनकी मौत की वजह रेडियो कॉलर इन्ज्यूरी थी, दक्षिण अफ़्रीकी पशु चिकित्सा वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. एड्रियन टॉर्डिफ़ ने अपने सहयोगियों की ओर से एक पत्र पर हस्ताक्षर किए और उस चिट्ठी को भारतीय सुप्रीम कोर्ट भेजा।

इस पत्र पर चीता विशेषज्ञ विंसेंट वैन डेर मेरवे, वन्यजीव पशुचिकित्सक डॉ. एंडी फ़्रेज़र और डॉ. माइक टॉफ़्ट के भी हस्ताक्षर हैं।

करीब-करीब उसी समय, नामीबिया के चीता संरक्षण कोष के कार्यकारी निदेशक डॉ लॉरी मार्कर ने भी भारतीय सुप्रीम कोर्ट को एक और पत्र लिखा, जिसमें टॉर्डिफ़ के पत्र के समान मुद्दों को ही दर्शाया गया था।

इंडियन एक्सपर्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूछे जाने पर, कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की थी, एक्सपर्ट मार्कर ने बताया, कि "विशेषज्ञों के साथ बेहतर कम्युनिकेशन, विशेषज्ञों पर भरोसा करने की जरूरत, बेहतर अवलोकन (निगरानी) और नियमित रूप से विशेषज्ञों के साथ उन चीतों की स्थिति को लेकर रिपोर्ट शेयर करने की जरूरत है।"

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों ने अपने पत्र में चीतों की मौत की समीक्षा की है और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया है, कि "कैसे चीता प्रोजेक्ट के मौजूदा मैनेजमेंट में "बहुत कम या कोई वैज्ञानिक प्रशिक्षण नहीं है", कैसे विदेशी विशेषज्ञों की "राय" को "अनदेखा" किया जा रहा है, क्यों उन्हें "जानकारी के लिए भीख मांगनी पड़ी है" और कैसे वे इस परियोजना के लिए "महज दिखावटी बनकर रह गए हैं।"

वहीं, सरकारी सूत्रों ने कहा है, कि एक्सपर्ट वैन डेर मेरवे और फ्रेजर ने पत्र से खुद को अलग कर लिया है।

हालांकि, जब द इंडियन एक्सप्रेस ने इन दोनों एक्सपर्ट्स से संपर्क किया, तो वैन डेर मेरवे ने कहा, कि वह इस चिट्ठी लिखने में "शामिल नहीं थे" और टॉर्डिफ़ ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

टॉर्डिफ़ के पत्र में कहा गया है, कि "कूनो से चीतों और उनकी देखभाल के संबंध में बहुत कम जानकारी प्राप्त हुई है। यद्यपि, हमें चीता परियोजना संचालन समिति में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, लेकिन उनके द्वारा हमसे कभी परामर्श नहीं किया गया या उनकी किसी बैठक में आमंत्रित नहीं किया गया।"

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क्या लापरवाही से हुई चीतों की मौत?

सुप्रीम कोर्ट को विशेषज्ञों ने जो चिट्ठी लिखी है, उसमें उन्होंने ये भी बताया है, कि कैसे लापरवाही की गई है और इस लापरवाही के क्या अंजाम हुए हैं।

इस पत्र में विशेषज्ञों ने विस्तार से बताया है, कि कैसे कुनो फील्ड टीम ने गलत तरीके से मान लिया, कि 11 जुलाई को सुबह लगभग 11 बजे, गर्दन के पीछे घावों के साथ देखा गया नर चीता, एक मादा चीता द्वारा घायल किया गया था, जो कि "बेहद दुर्लभ परिदृश्य" है।

यानि, एक्सपर्ट्स ने कहा है, कि नर चीते के गर्दन पर आया घाव, मादा चीते की वजह से होने का कोई दृश्य ही नहीं बनता था, लेकिन कुनो के अधिकारियों ने ऐसा ही माना।

आगे कहा गया है, कि ""कुनो के कर्मचारियों ने घायल नर चीते को बिना इलाज के छोड़ दिया, इसके बजाय उन्होंने मादा चीते का पता लगाने का फैसला किया, ताकि यह जांचा जा सके, कि क्या वह भी घायल है। उस दौरान नर चीते की हालत बिगड़ गई और बिना इलाज के दोपहर करीब 2 बजे उसकी मौत हो गई।"

विशेषज्ञों ने दावा किया है, कि उन्हें कूनो नेशनल पार्क से चीते की मौत के बारे में अगली सुबह जानकारी हासिल हुई, जब उन्हें चीते की पोस्टमार्टम रिपोर्ट और कुछ तस्वीरें भेजी गईं।

एक्सपर्ट्स ने लिखा है, कि "गर्दन के ऊपर की त्वचा की सूजन या फोटो में साफ तौर से दिखाई देने वाली बड़ी संख्या में कीड़ों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की गई।"

उन्होंने कहा, चीते का जो रेडियो कॉलर जख्म था, उसका इलाज वो कर सकते थे, लेकिन चीते की मौत के बाद उन्हें उसका वीडियो क्लिप दिया गया और इस बीच, 14 जुलाई को एक और चीते की मौत हो गई।

एक्सपर्ट्स ने लिखा है, कि "यदि उन्हें घायल चीते की तस्वीरें पहले दिखाई गई होतीं और उनके जख्म के बारे में पहले ही जानकारी दी गई होती, तो वो अधिकारियों को उन जोखिमों को लेकर पहले ही सचेत कर दिए होते।"

उन्होंने लिखा, कि "इसके बजाय, हमें काफी हद तक इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया और जो कुछ हुआ था उसे समझने के लिए हमें जानकारी मांगनी पड़ी थी।"

चीता प्रोजेक्ट फेल हुआ, तो होंगे परिणाम

विशेषज्ञों ने अपने पत्र में लिखा है, कि अगर ये प्रोजेक्ट फेल होता है, तो आने वाले कई सालों तक भारत में जंगली जानवरों को लाने की पहल पर नकारात्मक असर पड़ेगा। एक्सपर्ट्स ने इंडियन सुप्रीम कोर्ट से अपील की है, कि अब उन्हें बचे हुए चीतों के बारे में तमाम मेडिकल से संबंधित जानकारियां उपलब्ध करवाई जाएं, ताकि प्रत्येक जानवर के इलाज के तरीके पर सामूहिक निर्णय लिया जा सके।"

इसके साथ ही एक्सपर्ट ने मांग की है, कि उन्हें संचालन समिति की गतिविधियों में सक्रिय तौर पर शामिल किया जाए।

कुनो में कई चीतों की मौत से उठते सवाल

आपको बता दें, कि कुनो नेशनल पार्क में पहली चीता की मौत 27 मार्च को हुई थी, जब नामीबिया से लाए गये साशा नाम के चीते की किडनी की बीमारी से मृत्यु हो गई।

वहीं, दक्षिण अफ़्रीकी नर चीता उदय की 24 अप्रैल को अज्ञात कारणों से मृत्यु हो गई।

जबकि, 9 मई को, दक्षिण अफ्रीका से लाई गई एक मादा चीता, दक्ष, की संभोग के प्रयास के दौरान दो नर चीतों के साथ "हिंसक झड़प" के बाद मृत्यु हो गई।

वहीं, नामीबियाई से लाई गई मादा चीता ज्वाला से पैदा हुए तीन शावकों की महीने के अंत में निर्जलीकरण और कमजोरी से मृत्यु हो गई।

टॉर्डिफ़ के पत्र में यह भी दावा किया गया है, कि विशेषज्ञों को तब से दरकिनार कर दिया गया है, जब से व्यापक रूप से परियोजना के वास्तुकार माने जाने वाले, डॉ वाई वी झाला को पिछले साल "रिटायर्ट होने के लिए मजबूर" किया गया था।

इंडियन एक्सप्रेस की अक्टूबर महीने की एक रिपोर्ट में कहा गया था, कि कैसे प्रसिद्ध जीव विज्ञानी और भारतीय वन्यजीव के डीन डॉ वाई वी झाला, जो पिछले 13 सालों से ज्यादा समय से चीता प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे और जिनकी देखरेख में नामीबिया से चीतों का पहला बैच लाया गया था, उन्हें सरकार के नये चीता टास्क फोर्स से बाहर कर दिया गया।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी एक्सपर्ट्स के दोनों ही पत्रों को अब पर्यावरण मंत्रालय ने विस्तार से विचार विमर्श के लिए चीता संचालन समिति के सामने रखने का फैसला लिया है।

मई में बनाए गये, चीता संचालन समिति के अध्यक्ष, प्रोजेक्ट टाइगर के पूर्व प्रमुख डॉ. राजेश गोपाल हैं और इसमें भारतीय वन्यजीव संस्थान (वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट) के पूर्व निदेशक डॉ. पी. आर. सिन्हा, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक क़मर क़ुरैशी और अहमदाबाद स्थित सामाजिक कार्यकर्ता मित्तल पटेल शामिल हैं।

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