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Explained: क्या है Mosaic Strategy? जो बनी ईरान की ताकत, Trump से पहले ये देश भी टेक चुका है घुटने

Explained: ईरान दशकों से अपनी Mosaic Defence (मोजेक डिफेंस) स्ट्रेटजी पर भरोसा करता है। इस रणनीति का आधार मिलिट्री कमांड और कंट्रोल को अलग-अलग करना है। इसका मतलब यह है कि सेना के फैसले केवल एक जगह से नहीं लिए जाते, बल्कि अलग-अलग यूनिट्स को भी काफी हद तक फैसले लेने की छूट होती है। इसी वजह से अमेरिका और इजरायल जैसे देशों द्वारा किए जाने वाले लीडरशिप टारगेट या डिकैपिटेशन स्ट्राइक का असर कम हो जाता है। इसके साथ ही ईरान युद्ध को लंबा खींचने के लिए आर्थिक दबाव और बेहिसाब लागत जैसी रणनीतियों का भी इस्तेमाल करता है।

'हम मोजेक स्ट्रेटजी तय करेगी कब खत्म होगा युद्ध'

1 मार्च 2026 से अमेरिका और इजरायल द्वारा चलाए गए Operation Epic Fury के दौरान ईरान के विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट किया। उन्होंने लिखा कि ईरान ने पिछले दो दशकों में अमेरिकी सेना की हार का गहराई से अध्ययन किया है। उनके मुताबिक, "कैपिटल पर बमबारी हमारी युद्ध क्षमता को खत्म नहीं कर सकती। हमारी टुकड़ों में बंटी मोज़ेक डिफेंस स्ट्रेटजी हमें यह तय करने देती है कि युद्ध कब और कैसे खत्म होगा।"

Explained

कैसे काम करती है ये स्ट्रेटजी?

अराघची के मुताबिक इस रणनीति के दो हिस्से होते हैं। पहला, अमेरिकी सैन्य कमजोरियों का लगातार अध्ययन करना और उसके मुताबिक अपनी रणनीति बदलना। दूसरा, कमांड और कंट्रोल को पूरी तरह से अलग-अलग कर दिया जाता है ताकि अगर नेतृत्व पर हमला भी हो जाए तो युद्ध जारी रह सके। यही मोज़ेक डिफेंस स्ट्रेटजी ईरान को अली खामेनेई की मौत के बाद तक लड़ने की हालत में बनाए हुए।

थकाऊ युद्ध और 'सैलामी स्लाइसिंग' रणनीति

ईरान की यह रणनीति थकाऊ युद्ध यानी Attrition War पर भी आधारित है। इसका लक्ष्य दुश्मन को धीरे-धीरे आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर करना है। इसी के साथ ईरान सैलामी स्लाइसिंग स्ट्रेटज का भी उपयोग करता है। इसका मतलब है छोटे-छोटे लेकिन लगातार कदमों से दुश्मन को नुकसान पहुंचाना, ताकि युद्ध की लागत बढ़े और अंततः अमेरिका या इजरायल की जनता के लिए यह युद्ध गले की फांस बन जाए।

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इराक युद्ध का एक्सपीरियंस आया काम

इस रणनीति की जड़ें 1980-88 के Iran‑Iraq War और लेबनान में इजरायली हमलों के अनुभवों में हैं। इन घटनाओं ने ईरान और उसके प्रमुख सहयोगी संगठन Hezbollah के लिए आधुनिक युद्ध की रणनीति को आकार दिया। इन अनुभवों से ईरान ने ये बात अच्छे से समझ ली कि सीधे युद्ध के बजाय बैकडोर या इन डायरेक्ट तरीकों से लड़ना उसे बचा कर रख सकता है।

प्रॉक्सी और मिसाइल दोनों से हमला

एक्सपर्ट्स की मानें तो इन युद्धों के अनुभवों ने ईरान को प्रॉक्सी समूहों, असममित युद्ध और बैलिस्टिक मिसाइलों पर आधारित रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया। ईरान-इराक युद्ध के दौरान जब इराक ने ईरानी शहरों पर मिसाइल हमले किए, तब से ही ईरान अपनी मिसाइल क्षमता को बढ़ाता रहा है।

IRGC और मोज़ेक डिफेंस मॉडल

2005 में इस रणनीति को और औपचारिक रूप दिया गया, जब Islamic Revolutionary Guard Corps ने जनरल Mohammad Ali Jafari की देखरेख में मोज़ेक डिफेंस मॉडल का ऐलान किया। इसमें अलग-अलग कमांड और कंट्रोल सिस्टम बनाए, ताकि हर क्षेत्र में लोकल लेवल पर भी जवाबी कार्रवाई की जा सके। न की हमला होने के बाद एक ही सेंटर से आदेश आने का इंतजार किया जाए।

कितने हिस्सों में है ईरान की फौज?

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि इस मॉडल के तहत IRGC की सैन्य स्ट्रक्चर को 31 अलग-अलग कमांडों में बांटा गया। ये यूनिट्स जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र रूप से विद्रोह या जवाबी कार्रवाई शुरू कर सकती थीं, जिससे दुश्मन के लिए पूरे देश को एक साथ कंट्रोल करना बेहद मुश्किल हो जाता है।

मल्टी लेवल डिफेंस सिस्टम

इस मॉडल में हर इकाई के पास अपनी खुफिया क्षमता, हथियारों का भंडार और कमांड-कंट्रोल सिस्टम होता है। संकट की स्थिति में ये यूनिट्स स्थानीय लड़ाकों और सेल्फ डिफेंस फोर्सेस को भी एक्टिव कर सकती हैं। इससे एक ऐसा सिस्टम तैयार हो जाता है जिसे समझ पाना भी मुश्किल है और उसका काट निकालना उससे भी ज्यादा मुश्किल।

डिफेंस के लिए क्या है ईरान की तैयारी?

ईरान की रक्षा रणनीति चार तरीकों पर आधारित है- अलग-अलग फैसले लेने की क्षमता वाला युद्ध, प्रॉक्सी नेटवर्क, बैलिस्टिक मिसाइलें और मोज़ेक सिस्टम। अमेरिका और इजरायल के खिलाफ मौजूदा जंग में यही चारों तरीके साफ तौर पर दिखाई दे रहे हैं।

मिसाइल क्षमता बनी ताकत

हालांकि पिछले साल चले 12-दिनों युद्ध के दौरान इजरायल के हमलों से ईरान की मिसाइल क्षमता कुछ हद तक कमजोर हुई थी, लेकिन जून से ईरान ने उत्पादन फिर बढ़ा दिया। इजरायली सेना के मुताबिक ऑपरेशन एपिक फ्यूरी की शुरुआत में ईरान के पास लगभग 2,500 मिसाइलों का भंडार था।

कहां निशाना लगा रहा अमेरिका?

अमेरिकी रक्षा सचिव Pete Hegseth ने कहा कि मौजूदा अभियान का लक्ष्य केवल मिसाइलों के स्टॉक को कम करना नहीं बल्कि जहां वे बन रही हैं उन फैक्ट्रियों को भी नष्ट करना है। वहीं Brad Cooper ने कहा कि मिसाइल हमलों अब उतने नहीं हो रहे जितने शुरुआत में हो रहे थे, लेकिन ईरान अब भी अपने हमलों के जरिए अमेरिका को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है।

सस्ती तकनीक से महंगे डिफेंस सिस्टम की टक्कर

एक Shahed drone की कीमत लगभग 20,000 से 50,000 डॉलर होती है, जबकि उसे रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली Patriot missile system की एक इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत करीब 4 मिलियन डॉलर तक होती है। इस तरह की सस्ती टेक्नोलॉजी जिनका काट महंगा है, ईरान ने इसी को हथियार बना लिया।

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स्लीपर सेल का खतरा

ईरान के पास दुनिया के कई देशों में कथित प्रॉक्सी और स्लीपर सेल भी मौजूद हैं। The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने हाल के दिनों में संभावित हमलों की योजना से जुड़ी असामान्य गतिविधियों की जानकारी मिलने की बात कही है। हालांकि अभी तक किसी स्पष्ट साजिश की पुष्टि नहीं हुई है। यहां तक कि 2017 में पकड़ा गया एक शख्स हिज्बुल्लाह की आउटर यूनिट का हिस्सा निकला था। जो अमेरिका में मौजूद ईरानी खतरे को बताता है। इसीलिए टुकड़ों-टुकड़ों में बनी युद्ध रणनीति को मोजेक स्ट्रेटजी कहते हैं।

आपकी इस एक्सप्लेनर पर क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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