इंडियन नेवी के पूर्व अधिकारियों को फांसी की सजा, कतर के साथ मोदी सरकार की कौन सी डील बचा सकती है जान?
Qatar Indian Navy News: कतर में आठ पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारियों को मौत की सजा दी गई है। फैसले को "चौंकाने वाला" बताते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है, कि वह "कार्यवाही की गोपनीय प्रकृति" को देखते हुए कोई टिप्पणी नहीं करेगा, लेकिन आश्वासन दिया, कि वह फैसले का विरोध करेगा।
जिन लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई है, उनमें भारतीय नौसेना के कुछ पूर्व अधिकारी शामिल हैं, जिन्होंने कभी प्रमुख भारतीय युद्धपोतों की कमान संभाली थी और कतर में डहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज के लिए काम कर रहे थे, जो एक निजी कंपनी है और जो कतर के सशस्त्र बलों को प्रशिक्षण और संबंधित सेवाएं प्रदान करती थी।

अपनी इस रिपोर्ट में आपको हम बताने वाले हैं, कि मोदी सरकार के हाथ में इन पूर्व अधिकारियों की जान बचाने के लिए कौन-कौन से विकल्प हैं?
एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों ने कहा है, कि उनमें से कुछ अत्यधिक संवेदनशील परियोजना पर काम कर रहे थे, जो इटली की टेक्नोलॉजी से कतर में बनने वाली छोटे आकार की पनडुब्बियों को लेकर थी और रिपोर्ट्स में दावा किया गया है, कि पूर्व अधिकारियों पर जासूसी का आरोप लगाया गया था।
क्या है पूरा मामला, विस्तार से समझिए
ये आठ भारतीय नागरिक नौसेना का पूर्व अधिकारी हैं, जो कतर के जाहिरा अल आलमी नाम की सुरक्षा कंपनी में काम कर रहे थे और कतर मीडिया ने कहा है, कि इस साल इन भारतीय नागरिकों को उनके परिजनों से मिलने की इजाजत दी गई थी।
इन नागरिकों को पिछले साल सितंबर में गिरफ्तार किया गया था और कतर की मीडिया ने दावा किया था, कि इन लोगों के खिलाफ जासूसी के जो आरोप लगाए गये हैं, उसके लिए कतर में मृत्युदंड का प्रावधान है।
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, इन आठ भारतीयों को कतर में अकेले में रखा गया है। वहीं, बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, जिन कंपनी में ये आठों भारतीय काम करते थे, उनके परिजनों को उनसे मिलाने के लिए उनकी कंपनी ने टिकट और वीजा की व्यवस्था की थी।
कतर में जिन नौसेना के पूर्व अधिकारियों को फांसी की सजा दी गई है, उनके नाम कैप्टन नवतेज सिंह गिल, कैप्टन बीरेंद्र कुमार वर्मा, कैप्टन सौरभ वशिष्ठ, कमांडर अमित नागपाल, कमांडर पूर्णेंदु तिवारी, कमांडर सुगुनकर पाकला, कमांडर संजीव गुप्ता और नाविक रागेश हैं। यानि, इनमें से ज्यादातर बड़े स्तर के अधिकारी रह चुके हैं, लिहाजा भारत सरकार के लिए ये मामला आसान नहीं है।
जासूसी कांड का खुलासा होने के बाद दोहा से संचालित होने वाली कंपनी ने 31 मई को अपना कामकाज बंद करने का ऐलान किया था और उसने सभी भारतीय कर्मचारियों को कंपनी के बंद होने की जानकारी दी थी। कतर की मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि कंपनी जाहिरा अल आलमी ने सभी भारतीय कर्मचारियों से इस्तीफा मांगने की पुष्टि की थी।
कतर ने की थी अहम सबूत मिलने का दावा
कतरा की मीडिया ने दावा किया था, कि कतर सरकार के पास इन अधिकारियों के खिलाफ इलेक्ट्रॉनिक सबूत हैं।
नौसेना के इन पूर्व अधिकारियों पर आरोप है, कि इन्होंने कतर की पनडुब्बियों के निर्माण के संबंधित अहम और गोपनीय जानकारियां, इजरायल तक पहुंचाई। आधिकारिक भारतीय सूत्रों का हवाला देते हुए, एएनआई ने अपनी एक रिपोर्ट में मई महीने में कहा था, कि "मामले को भारतीय एजेंसियों द्वारा उच्चतम संभव स्तर पर उठाया गया है, लेकिन कतरी सरकार ने इस मुद्दे पर भरोसा करने का कोई संकेत नहीं दिखाया है।"
सूत्रों ने समाचार एजेंसी को बताया, कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों द्वारा भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारियों को "फंसाए" जाने की संभावना है।
इन आठ नौसेना के पूर्व अधिकारियों के अलावा, ओमान वायु सेना के पूर्व अधिकारी खमीस अल-अजमी सहित दो कतरियों के खिलाफ भी जासूसी के आरोप हैं, जो दाहरा ग्लोबल के कंपनी के सीईओ थे। द ट्रिब्यून के अनुसार, कतर के अंतर्राष्ट्रीय सैन्य संचालन प्रमुख, मेजर जनरल तारिक खालिद अल ओबैदली, वो कतरी नागरिक हैं, उन पर भी जासूसी का आरोप लगाया गया है।

भारत के पास क्या कानूनी विकल्प हैं?
भारत सरकार ने गुरुवार को कहा कि वह इस मामले पर करीब से नजर रख रही है और इसे कतर के अधिकारियों के समक्ष उठाएगी।
भारत के लिए सबसे अच्छी बात ये है, कि मोदी सरकार और कतर ने 2015 में अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी की नई दिल्ली की यात्रा के दौरान सजायाफ्ता कैदियों के हस्तांतरण पर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
यानि, इस समझौते के तहत, दोषियों के प्रत्यर्पण किया जा सकता है। समझौते के मुताबिक, कतर में सजा पाए भारतीय नागरिकों को जेल की शेष सजा काटने के लिए उनके गृह देश भेजा जा सकता है। यह देखना बाकी है कि क्या नई दिल्ली उन आठ व्यक्तियों के प्रत्यर्पण की मांग के लिए इन प्रावधानों को लागू करेगी और क्या कतर इस पर सहमत होगा।
ऐसा करने के लिए सबसे पहले इस बात को स्वीकार करना होगा, कि आठो पूर्व अधिकारियों ने वाकई में जासूसी की है।
दूसरा, अगर भारत को लगता है, कि उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा है तो वह इस मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भी ले जा सकता है। कतर ने अभी तक इन लोगों के खिलाफ आरोपों का ब्योरा नहीं दिया है, जिससे पारदर्शिता की कमी को लेकर चिंताएं पैदा हो रही हैं।
फिलहाल, नई दिल्ली कतरी न्यायिक व्यवस्था के भीतर फैसले के खिलाफ अपील करने पर जोर दे सकती है और तत्काल राहत की मांग कर सकती है। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा, कि कतर सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर सहयोग के भारत के अनुरोध पर क्या प्रतिक्रिया देती है।
क्या भारत बना सकता है आर्थिक प्रेशर?
भारत तरलीकृत प्राकृतिक गैस के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है, और कतर भारत के साथ एक नया दीर्घकालिक एलएनजी कॉन्ट्रैक्ट डील फाइनल करने की लंबे समय से कोशिश कर रहा है, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था को नये पंख लग सके।
इसके अलावा, गल्फ कॉपरेशन काउंसिल (जीसीसी) भी भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर हस्ताक्षर करने के लिए लालायित है। जीसीसी एक क्षेत्रीय संगठन है, जिसमें छह सदस्य हैं: बहरीन साम्राज्य, कुवैत राज्य, ओमान सल्तनत, कतर राज्य, सऊदी अरब साम्राज्य और संयुक्त अरब अमीरात।
इस लाभ का उपयोग करते हुए, नई दिल्ली कतर से महत्वपूर्ण रियायतें मांग सकती है।
खासकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भारत के काफी अच्छे दोस्त हैं, लिहाजा भारत डिप्लोमेटिक बातचीच के लिए इन दोनों देशों का इस्तेमाल भी कर सकता है।
कौन हैं वो 8 पूर्व भारतीय नौसेना के अधिकारी, जिनको कतर में मिली मौत की सजा












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