यूरोपीय कोर्ट ने पोलैंड पर लगाया नौ करोड़ रुपये रोजाना का जुर्माना
वारसॉ, 28 अक्टूबर। यूरोपीय संघ के कोर्ट ऑफ जस्टिस (ECJ) ने पोलैंड पर एक मिलियन यूरो यानी लगभग नौ करोड़ रुपये प्रतिदिन का जुर्माना लगाया है. ऐसा पोलैंड द्वारा कुछ विवादित कानून पास करने के कारण किया गया. माना जाता है कि यूरोपीय संघ के किसी सदस्य पर अब तक का यह सबसे बड़ा जुर्माना है.

जब तक पोलैंड अदालत के फैसले का पालन नहीं करता, तब तक उस पर लगीं पाबंदियां जारी रहेंगी. ये पाबंदिया बीती जुलाई में लगाई गई थीं क्योंकि पोलैंड ने अपने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए एक व्यवस्था बनाई है. आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था राजनीतिक आधार पर जजों को हटाने का रास्ता है.
क्यों लगा जुर्माना?
जुलाई में यूरोपीय कोर्ट ने पोलैंड को यह व्यवस्था खत्म करने का आदेश दिया था. कोर्ट का कहना था कि यह व्यवस्था निष्पक्ष न्याय के रास्ते में बाधा है. चूंकि पोलैंड ने आदेश का पालन नहीं किया, इसलिए कोर्ट ने अब उस पर जुर्माना लगाया है.
बुधवार को जारी एक बयान में यूरोपीयन यूनियन कोर्ट ऑफ जस्टिस ने कहा, "यूरोपीय संघ की न्याय व्यवस्था और कानून के राज पर आधारित यूरोपीय संघ के मूल्यों को गंभीर और स्थायी नुकसान से बचाने के लिए यह जुर्माना लगाया जाना जरूरी था."
यूरोपीय आयोग ने 9 सितंबर को पोलैंड पर जुर्माने की सिफारिश की थी. यूरोपीय संघ के अन्य सदस्यों का कहना है कि संघ के सिद्धांतों की अनदेखी करने वाले पोलैंड को ईयू से मिलने वाली सब्सिडी बंद होनी चाहिए. बेल्जियम के प्रधानमंत्री आलेक्जांडर डे क्रू ने बुधवार को इस बात का जिक्र किया किया कि पोलैंड यूरोपीय संघ से फंड पाने वाले सबसे बड़े दशों में से है. उन्होंने कहा, "आपको पैसा तो चाहिए पर मूल्यों को खारिज कर देंगे, ऐसा नहीं चल सकता. पोलैंड यूरोपीय संघ को कैश मशीन समझकर नहीं चल सकता."
नाराज हैं यूरोपीय देश
पोलैंड को यूरोपीय संघ से सालाना 12 अरब यूरो का फंड मिलता है. पोलैंड की सत्ताधारी दक्षिणपंथी पार्टी के प्रवक्ता रादोस्लाव फोगिएल ने दावा किया पोलैंड जितना यूरोपीय संघ से पाता है, उससे ज्यादा का योगदान करता है. देश, यूरोप के बर्ताव को ब्लैकमेल बता रहा है. ट्विटर पर पोलैंड के न्याय उप-मंत्री सेबास्टियान कालेटा ने जुर्माने को 'वसूली और ब्लैकमेल' बताया. लेकिन इस बात का विरोध करने वाले देश के अंदर भी बहुत से लोग हैं.
डॉयचे वेले से बातचीत में यूरोपीय संसद में पोलैंड के सदस्य रादोस्लाव सिकोरस्की सरकार के रुख का विरोध करते हैं. वह कहते हैं कि सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कुछ नियम होते हैं जिन्हें तोड़े जाने पर सजा भी हो सकती है. उन्होंने कहा, "मैं उम्मीद करता हूं कि पोलैंड न्यायालय के फैसले का पालन करेगा. इसका कोई विकल्प नहीं है. हमने अपनी इच्छा से यूरोपीय न्याय व्यवस्था पर दस्तखत किए थे."
सिकोरस्की ने कहा कि पोलैंड की सत्ताधारी पार्टी देश की संवैधानिक अदालत पर पहले ही लगाम लगा चुकी है और अब वह बाकी अदालतों पर भी नकेल कसना चाहती है.
विवाद की जड़
पोलैंड ने देश के सुप्रीम कोर्ट में अनुशासनात्मक चैंबर 2018 में शुरू किया था. इसके तहत जजों और वकीलों को बर्खास्त किया जा सकता है. ईसेजे को डर है कि इस चैंबर की ताकतों का इस्तेमाल निष्पक्षता बरतने वालों और राजनेताओं की मर्जी के आगे ना झुकने वालों के खिलाफ किया जा सकता है. तभी से यह चैंबर विवाद की जड़ बना हुआ है.
जानें, यूरोपीय यूनियन की कहानी
इसी महीने की शुरुआत में पोलैंड की संवैधानिक अदालत ने फैसला दिया कि विवाद की स्थिति में देश का कानून यूरोपीय कानून से बड़ा माना जाएगा. पिछले हफ्ते पोलिश प्रधानमंत्री मातेउश मॉरुविएत्सकी ने यूरोपीय संसद को भरोसा दिलाया था कि चैंबर को खत्म कर दिया जाएगा. लेकिन उन्होंने कोई समयसीमा नहीं बताई.
यूरोपीयी देश पहले भी पोलैंड पर न्यायालयों और मीडिया की आजादी पर हमले करने के आरोप लगाते रहे हैं. यूरोपीय संघ का कहना है कि पोलैंड ने न्यायपालिका का राजनीतिकरण कर दिया है और उन जजों जो नियुक्त कर दिया है जो सत्ताधारी लॉ ऐंड जस्टिस पार्टी के प्रति निष्ठावान हैं.
वीके/एए (एपी, डीपीए, रॉयटर्स)
Source: DW
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