पूरब की ओर झुक गई धरती, बेतहाशा भूजल खींचने का असर, भारत से क्या है कनेक्शन? जानिए
इंसान की जरूरतों के लिए भूजल का अप्रत्याशित दोहन कितना खतरनाक साबित हो सकता है, वह एक शोध से पता चला है। इसके मुताबिक इंसान ने इतनी ज्यादा मात्रा में भूजल निकाला है कि 17 वर्षों में पृथ्वी पूरब की ओर 80 सेंटीमीटर झुक गई है।
इस शोध के मुताबिक पृथ्वी का यह झुकाव 1993 से 2010 तक के अनुमानों तक पर आधारित है। शोधकर्ताओं ने इसकी वजह से भी जलवायु के प्रभावित होने की संभावना जताई है। यह रिसर्च जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुई है।

भारत से क्या है कनेक्शन?
इस शोध के अनुसार इन वर्षों में धरती के अंदर से जितना भी भूजल खींचा गया, उसमें से ज्यादातर हिस्सा पश्चिमी उत्तर अमेरिका और उत्तर-पश्चिमी भारत की ओर पुनर्वितरित किया गया। इससे पहले वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था, इंसान ने 1993 से 2010 के बीच 2,150 गीगाटन भूजल निकाला है। यह मात्रा इस अवधि में समुद्र स्तर में 6 मिलीमीटर से अधिक की वृद्धि के बराबर है। हालांकि, इस अनुमान की पुष्टि करना मुश्किल है।
'भूजल का पुनर्वितरण झुकाव को सबसे अधिक प्रभावित करता है'
दक्षिण कोरिया के सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के भूभौतिकी वैज्ञानिक और इस रिसर्च के लीडर कि-वेयोन सियो ने कहा, 'पृथ्वी का घूर्णन ध्रुव वास्तव में काफी बदल गया है।' उनका कहना है, 'हमारा शोध दिखाता है कि भूजल का पुनर्वितरण वास्तव में घूर्णी ध्रुव के झुकाव पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है। '
पहले सिर्फ बर्फ की चादरों और ग्लेशियर पर हुआ था विचार
शोधकर्ताओं ने बताया है कि पृथ्वी के घूर्णन को प्रभावित करने की पानी की क्षमता का पता 2016 में ही चल गया था। लेकिन, अभी तक इसके घूर्णन में इसकी वजह से हुए विशेष बदलाव का पता नहीं चल पाया था। पहले इसके लिए सिर्फ बर्फ की चादरों और ग्लेशियरों पर ही विचार किया गया था, लेकिन बदले हुए परिदृश्यों में वैज्ञानिकों ने भूजल के पुनर्वितरण के प्रभाव को समझा है।
वास्तविक स्थिति और बदल चुकी होगी!
जब शोधकर्ताओं ने 2150 गीगाटन भूजल के पुनर्वितरण को मॉडल में शामिल किया तब इसकी वजह से ध्रुवीय झुकाव का पता चला। इसके बिना जो मॉडल था, वह 78.5 सेंटीमीटर या 4.3 सेंटीमीटर प्रति साल वाला था। लेकिन, सबसे गंभीर बात ये है कि वैसे ही जलवायु संकट की वजह पृथ्वी की परेशानी बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर इंसान की इस हरकत की वजह से जलवायु संकट का अतिरक्त जोखिम बढ़ रहा है। इस शोध के लिए इस्तेमाल सैंपल के एक दशक से ज्यादा बीत चुके हैं। ऐसे में मौजूदा स्थिति तो ज्यादा बदली हो सकती है।
भूजल संरक्षण की कोशिशों पर क्या कहते हैं वैज्ञानिक?
शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनिया भर में, खासकर संवेदनशील क्षेत्रों में, भूजल की कमी की दर को धीमा करने के लिए जो कोशिशें हो रही हैं उससे पृथ्वी के झुकाव को सैद्धांतिक रूप से ही टाला जा सकता है। वह भी तब जब इस तरह के भूजल संरक्षण के काम लगातार दशकों तक चलाए जाएं।
पृथ्वी के लिए बढ़ सकता है अतिरिक्त संकट
शोधकर्ताओं का कहना है कि एक साल में घूर्णी ध्रुव (rotational pole) में सामान्यतौर पर कई मीटर तक बदलाव आ जाता है। इसलिए भूजल की निकासी से मौसम के इधर-उधर होने का जोखिम नहीं है। लेकिन, भूवैज्ञानिक समय के पैमाने पर ध्रुवीय झुकाव जलवायु को प्रभावित कर सकता है। (इनपुट-पीटीआई)












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