• search

बेमौसम बरसात की वजह से हारा था 'यूरोप का बादशाह'

Subscribe to Oneindia Hindi
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS
For Daily Alerts

    अगर आप सैन्य मामलों के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं, तब भी शायद आपने वाटरलू की लड़ाई के बारे में सुना होगा.

    यह इतिहास में सबसे मशहूर लड़ाइयों में से एक है. 19वीं सदी की शुरुआत में अधिकांश यूरोप को जीतने वाले फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट की हार हुई थी.

    नेपोलियन को देश निकाला देकर एल्बा द्वीप पर भेजा गया था. 1815 में नेपोलियन ने 70 हज़ार की फ़ौज के साथ नीदरलैंड्स पर हमला करने का फैसला किया.

    वहां नेपोलियन को उखाड़ फेंकने का मंसूबा लिए एक गठबंधन तैयार खड़ा था.

    उस वर्ष 18 जून को, नेपोलियन की सेना का सामना, ब्रिटिश, डच, बेल्जियम और जर्मन सेनाओं के गठबंधन से हुआ.

    गठबंधन सेना की कमान वेलिंग्टन के ड्यूक और प्रशिया की सेना मार्शल गेभार्ड वॉन ब्लूचर के नेतृत्व में लड़ी थी.

    वाटरलू की ये लड़ाई भारी बारिश में लगभग दस घंटे चली.

    वो सुरंग जिसका सपना नेपोलियन ने देखा था

    नेपोलियन के बाद फ्रांस के सबसे युवा 'प्रशासक' होंगे मैक्रों

    कई इतिहासकारों का मानना है कि बारिश और कीचड़ ने नेपोलियन की हार में भूमिका निभाई जिसने बाद के यूरोप का इतिहास बदल गया.

    वे तर्क देते हैं कि महान फ्रांसीसी रणनीतिकार नेपोलियन ने अपनी भारी घुड़सवार सेना के इस्तेमाल में देरी की, क्योंकि ज़मीन बहुत गीली थी और इससे उनके प्रतिद्वंद्वियों को फ़ायदा मिला.

    नेपोलियन की ऐतिहासिक हार के दो सौ साल बाद एक और थ्यौरी सामने आई है.

    इसके मुताबिक़ नेपोलियन की हार के पीछे 1815 में यूरोप में गर्मियों के दौरान हुई बारिश के कारणों को माना गया है.

    ज्वालामुखी की राख
    Reuters
    ज्वालामुखी की राख

    ज्वालामुखी

    वाटरलू की लड़ाई से दो महीने पहले इंडोनेशिया में माउंट तंबोरा नाम के एक ज्वालामुखी में विस्फोट हुआ था.

    ज्वालामुखी से निकलने वाली भारी राख ने लगभग एक लाख लोगों की जान ले ली.

    लेकिन यूरोप में नेपोलियन की हार, और इंडोनेशिया में ज्वालामुखी फटने के बीच क्या संबंध है?

    इंपीरियल कॉलेज लंदन के भूविज्ञानी मैथ्यू येंज की ओर से प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक ज्वालामुखी की राख से आयनोस्फ़ेयर (वायुमंडल की ऊपरी तह) में "शॉर्ट सर्किट" बन गया. आयनोस्फ़ेयर में ही बादल बनते हैं.

    इसकी वजह से यूरोप में भारी बारिश हुई. और इसी बारिश ने नेपोलियन की हार में योगदान दिया.

    जर्नल जियोलॉजी में प्रकाशित मैथ्यू येंज के रिसर्च में ये भी बताया गया कि ज्वालामुखियों में होने वाला विस्फोट, विद्युतीकृत राख को इतनी ऊपर भेज सकता है, जितना पहले सोचा भी नहीं गया था.

    मैथ्यू येंज बताते हैं, "जियोलॉजिस्ट पहले सोचते थे कि ज्वालामुखी की राख वायुमंडल की निचली परत में फंस जाती है क्योंकि ज्वालामुखी से उठा धुआं भी वहाँ तैरता है, हालांकि, मेरा शोध दिखाता है कि इलेक्ट्रिक फोर्स राख को ऊपरी वायुमंडल में भी भेज सकती है. "

    वाटरलू की लड़ाई
    Getty Images
    वाटरलू की लड़ाई

    बदल गया इतिहास

    कई प्रयोगों और कंप्यूटर के ज़रिए येंज ने साबित किया कि ज्वालामुखी के चार्ज कण, जो गोलाई में एक मीटर के 0.2 मिलियन से भी कम हैं, उन्हें बड़े विस्फोट से आयनोस्फ़ेयर में भेजा जा सकता है.

    वहां वे आयनोस्फ़ेयर के इलेक्ट्रिक करंट में बाधा डालते हैं जिससे असामान्य बादल बनते हैं और बारिश होती है.

    साल 1991 में फिलीपींस में माउंट पिनातुबू ज्वालामुखी के विस्फोट के बाद इसी प्रकार की गड़बड़ी दिखाई दी थी.

    येंज अपनी खोज के ऐतिहासिक प्रभावों के बारे में कहते हैं, "लेस मिज़राबल उपन्यास में विक्टर ह्यूगो ने वाटरलू की लड़ाई के बारे में कहा है-असामान्य बादलों से भरा आकाश दुनिया के पतन के लिए काफ़ी था."

    अगर वाकई एक ज्वालामुखी के फटने से नेपोलियन ने वाटरलू की जंग हारी होगी, तो ये इतिहास और मौसम के बीच संबंधों पर एक अनोखी खोज साबित हो सकती है.

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    BBC Hindi
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    English summary
    Due to uneasy rain was defeated by the King of Europe

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    X