क्या है इजरायल-फिलिस्तीन विवाद, क्यों गाजापट्टी-यरूशलम रहते हैं चर्चा में
जानिए क्या है फिलिस्तीन और इजरायल का विवाद, आखिर क्यों गाजापट्टी, यरूशलम और फिलिस्तीन रहते हैं चर्चा में
जिस तरह से हमास ने इजराइल पर हमला किया उसके बाद इजराइल ने पूरी ताकत से इस हमले का जवाब दिया। ऐसा पहली बार है जब इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद फेल हो गई और एक हजार से अधिक हमास के आतंकियों ने इजराइल में घुसकर तबाही मचाई। फिलहाल दोनों देशों के बीच जंग चल रही है।
ऐसे में लोगों के भीतर कई तरह के सवाल होंगे कि आखिर यह पूरा विवाद है क्या और क्यों दोनों देश हमेशा एक दूसरे के खिलाफ रहते हैं। इजराल-फिलिस्तीन से जुड़े हम मसले को आप आसान और सरल भाषा में यहां समझ सकते हैं।

इजरायल हमेशा से ही कई विवादों में रहता है, यहां लंबे समय से अरब और यहूदियों के बीच संघर्ष चल रहा है, गाजा पट्टी हमेशा से ही खबरों में रहता है, जबकि यरूशलम दुनिया के सबसे विवादित शहरों में गिना जाता है।
एक तरफ जहां इजरायल यरूशलम को अपनी राजधानी बताता है तो वहीं दुनिया का कोई भी देश यरूशलम को इजरायल की राजधानी नहीं मानता है। लिहाजा हमें इजरायल को समझने के लिए इसके इतिहास को खंगालना होगा। इजराइल को कनान, अल शाम, लेवांत या द प्रॉमिस लैंड के नाम से भी जाना जाता है।

इजराइल और फिलिस्तीन के बीच का इतिहास
ऑटमन साम्राज्य ने 14वीं शताब्दी तक पूरे मिडिल ईस्ट पर अपना कब्जा कर लिया था और 19वीं सदी तक यह कमजोर होने लगा था। 19वीं सदी में पूरे यूरोप में राष्ट्रवाद की बहार आ गई, जिसमें इटली, जर्मनी अहम हैं, ये तमाम देश छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे थे, लेकिन एकीकरण के इस दौर में यह देश 1950 के आस-पास एक होना शुरु हो गए। इसी एकीकरण के दौर में थियोडोर हर्जल ने यहूदी राष्ट्र की बात शुरु की, इसे जाइनिस्ट आंदोलन का नाम दिया गया। जाइनिस्ट आंदोलन उसे कहते हैं जिसमें यहूदी एक बार फिर से अपनी पवित्र धरती पर जाना चाहते हैं, जहां से यहूदी धर्म की शुरुआत हुई थी, यह तकरीबन तीन हजार साल पहले फिलिस्तीन में इसकी शुरुआत हुई थी। यहूदियों के इजरायल जाने की एक और बड़ी वजह यह थी कि पूरे यूरोप में यहूदियों का संहार किया जा रहा था, जिसमें सिर्फ जर्मनी या हिटलर नहीं आता है, बल्कि पूरे यूरोप में फ्रांस, रूस, इटली, पोलैंड के देशों में यहूदियों पर काफी अत्याचार किया गया, इनके धर्म को कई जगहों पर बैन कर दिया गया। इन अत्याचारों के चलते यहूदियों ने अपनी धरती पर वापस जाने की शुरुआत की।

विवाद के पीछे ब्रिटेन की भूमिका
1917 में जब प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था, तभी ऑटमन साम्राज्य हारने की कगार पर था, तभी ब्रिटेन के विदेश मंत्री सर आर्थर बैलफॉर ने कहा कि हम यहूदियों को युद्ध खत्म होने के बाद फिलिस्तीन में स्थापित करने की पूरी कोशिश करेंगे। लेकिन इसी दौरान ब्रिटेन ने गुपचुप तरीके से एक साइक्स पीको करार किया, इसे फ्रांस और रूस के साथ किया गया था, जिसमें यह कहा गया था कि प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद कौन सा देश किस देश पर अपना कब्जा करेगा। इस करार के तहत ब्रिटेन में फिलिस्तीन को अपने हिस्से में रखा था, जबकि सीरिया, जार्डन को फ्रांस को दे दिया गया था, जबकि टर्की के कुछ इलाकों को रूस को दे दिया गया था। इसके साथ ही अरब देशों को ब्रिटेन ने भरोसा दिया कि युद्ध के बाद वह फिलिस्तीन को आपको दे देंगे, अगर आप ऑटमन साम्राज्य के खिलाफ हमारा साथ दें।

ब्रिटेन सरकार के खिलाफ विद्रोह
पहले विश्व युद्ध के बाद फिलिस्तीन में एक नई सरकार का गठन हुआ, इस दौरान बड़ी संख्या में फिलिस्तीन में यहूदी शरण लेने लगे, यहां इस समय यहूदियों की कुल आबादी सिर्फ 3 फीसदी थी, लेकिन अगले तीस साल में यह बढ़कर 30 फीसदी तक पहुंच गई। यहूदियों ने यहां आकर अरब लोगों से जमीन खरीदनी शुरू कर दी और यहां यहूदी बस्तियों की स्थापना करनी भी शुरू कर दिया। इसी दौरान 1936 में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अरब ने बगावत शुरू कर दी, इस बगावत को खत्म करने के लिए ब्रिटेन की सरकार ने यहूदी लड़ाकों का साथ दिया। इस बगावत के बाद ब्रिटेन की सरकार ने यहूदियों के फिलिस्तीन आने पर कुछ पाबंदी लगा दी, जैसे अब हर साल 10 हजार से अधिक यहूदी यहां नहीं आ सकते हैं, ताकि अरब लोगों की बगावत को थोड़ा रोका जा सके। जिसके बाद यहूदी लड़ाके ब्रिटेन की सरकार के खिलाफ शुरू कर दिया और गुरिल्ला लड़ाई करने लगे।

दूसरे विश्वयुद्ध में लाखों यहूदियों को गैस चैंबर में मार दिया गया
फिलिस्तीन में इस समय चल रहे विवाद के बीच ही 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ, इस वक्त यूरोप में बड़ी त्रासदी हुई थी जिसे होलोकास्ट कहते हैं इसका मतलब होता है यहूदियों का जनसंहार, जर्मनी में लाखों की संख्या में यहूदियों को गैस चैंबर में डालकर मार दिया गया था। कहते हैं कि इस दौरान 40 लाख यहूदियों को गैस चैंबर में डालकर मार दिया गया। इस अत्याचार के दौर में यहूदी फिलिस्तीन की ओर भागने लगे, क्योंकि उन्हें लगने लगा था अगर जीवित रहना है तो हमें अपने ही देश जाना होगा।

मध्यस्थता के लिए यूएन पहुंचा मामला
1947 में यूएन में एक नया रिजोल्यूशन हुआ कि क्या यहूदियों को अपना एक देश मिलना चाहिए, जिसपर इजराइल को समर्थन मिला। इस रिजोल्यूशन के बाद इजरायल को दो भाग में बांट दिया गया, एक हिस्सा था यहूदी राज्य और एक था अरब राज्य। लेकिन बड़ी समस्या थी जेरूसलम क्योंकि यहां आधी आबादी यहूदियों की थी और आधी आबादी मुसलमानों की थी। इसलिए यूएन ने फैसला दिया कि जेरूसलम को अंतर्राष्ट्रीय सरकार के द्वारा चलाया जाएगा।

इजरायल ने दिखाया अपना दम
लेकिन इस घोषणा के तुरंत बाद इजराइल के आस-पास के देशों ने इजराइल पर हमला कर दिया। मिश्र, सीरिया, इऱाक, जॉर्डन ने इजरायल पर हमला कर दिया, इसे 1948-49 का अरब इजराइल युद्ध कहते हैं। इस युद्ध में इजरायल ने अपनी ताकत का परिचय देते हुए इन देशों को पीछे ढकेलकर अपनी जमीन में इजाफा किया, यानि कि जो जमीन इजराइल को यूएन की द्वारा दी गई थी अब वह इस युद्ध के बाद और बढ़ गई थी। इस लड़ाई के दौरान बड़ी संख्या में शरणार्थियों की समस्या खड़ी हो गई, , इजरायल से तकरीबन सात लाख लोग विस्थापित हो गए, इस लड़ाई के बाद गाजा पट्टी का नियंत्रण इजरायल के पास चला गया और पश्चिमी घाट पर जार्डन ने कब्जा कर लिया था।

पहली बार मिश्र ने दी इजरायल को मान्यता
मिश्र, सीरिया और जॉर्डन से इजरायल के रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे थे, इनके बीच में आपसी तनाव काफी ज्यादा था, 1967 में मिश्र ने अपनी सेना इजरायल की सीमा पर तैनात कर दी, लेकिन इजरायल ने मिश्र के हमले से पहले ही हमला कर दिया और इस लड़ाई में इजरायल ने मिश्र, जॉर्डन और सीरिया को बुरी तरह से हराया और कई इलाकों को इन देशों से इजरायल ने अपने कब्जे में कर लिया, जिसमें गाजा और वेस्ट बैंक आज भी इजरायल के कब्जे में है। 1978 में इजरायल को मिश्र ने पहली बार एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी थी जिसपर काफी विवाद हुआ था। उस वक्त मिश्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सदाक कुछ साल बाद हत्या तक कर दी गई थी।

फिलिस्तीन और इजरायल के बीच संघर्ष
इन तमाम संघर्ष के बाद फिलिस्तीन और इजरायल के बीच विवाद शुरू हुआ, इजरायल के खिलाफ पीएलओ यानि पैलेस्टाइन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन ने इजरायल के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू की, जिसके काफी चर्चित नेता थे यासिर अराफात। फिलिस्तीन के लोगों ने इजरायल सरकार के खिलाफ अपना विरोध शुरू कर दिया, क्योंकि इन लोगों को इनके अधिकार नहीं मिले और वेस्ट बैंक पर इजरायल की सेना तैनात थी। यह विवाद हिंसा में तब्दील हो गई और तकरीबन 100 यहूदी और 1000 अरब की मौत हो गई। इसी दौरान हमास का जन्म हुआ, जोकि पीएलओ से भी ज्यादा खतरनाक थी। पीएलओ इजरायल से समझौते के पक्ष में था, जबकि हमास का मानना था कि इजरायल देश का अस्तित्व ही नहीं है, हम इसे राष्ट्र नहीं मानते हैं। 1993 में ओस्लो करार के तहत इजरायल और फिलिस्तीन या यूं कहें इजरायल के पीएम येट्सचाक राबिन और पीएलओ के नेता यासिर अराफात के बीच समझौता हुआ, इन दोनों ही नेताओं को नोबेल पीस अवॉर्ड मिला था। इस समझौते के तहत पीएलओ ने इजरायल को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी और इजरायल की सरकार ने पीएलओ को मान्यता दी। इससे पहले पीएलओ को आतंकी संगठन माना जाता था। समझौते के तहत पांच साल के लिए हिंसा को रोकने पर करार हुआ।

आतंकी संगठन हमास ने जीता चुनाव
वर्ष 2000 में एक बार फिर से इजरायल और फिलिस्तीन के बीच संबंध खराब हो गए, इसकी बड़ी वजह थी उस वक्त इजरायल के राष्ट्रपति एहूद बराक 1000 सुरक्षा गार्ड को लेकर टेंपल माउंट पर चले गए, इसे यहूदियों और मुस्लिम दोनों का पवित्र स्थान कहा जाता है। इसके चलते फिलिस्तीन के लोग भड़क गए और हिंसा शुरू हो गई, इस दौरान तकरीबन 1000 यहूदी और 3200 फिलिस्तिनियों को मार दिया गया, कई बसों को उड़ा दिया गया और कई जगह पर धमाके किए गए। इस हिंसा के बाद इजरायल की सरकार इस विवाद का समाधान निकालने की बजाए इसे रोकने पर ध्यान लगाने लगी। इसके तहत इजरायल की सरकार ने गाजा पट्टी से यहूदियों को हटा दिया, इसके अलावा सेना को भी यहां से हटा लिया गया। इसके कुछ समय बाद यहां चुनाव होता है और हमास ने यहां का चुनाव जीत लिया। लेकिन पीएलओ की पार्टी फताह ने हमास को सरकार में लेने से इनकार कर दिया। जिसके बाद 2007 में हमास ने गाजापट्टी पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया और फतह को यहां से खदेड़ दिया और इसके बाद काफी ताकतवर बन गया।

हमास ने शुरू किया इजरायल पर हमला
इस विवाद के बाद हमास ने इजरायल पर हमला करना शुरू कर दिया, हमास ने रिहायशी इलाकों में हमला करना शुरू कर दिया, ऐसे में इजरायल ने गाजापट्टी की घेराबंदी कर दी, इसके तहत अब गाजा में किसी भी तरह का सामान नहीं जा सकता, कई जगह पर चेकपोस्ट बना दिया गया, कोई भी बाहर का जहाज गाजा में नहीं आ सकता है। इजरायल का कहना है कि इरान जैसे कई देश यहां रॉकेट को भेजता है। लेकिन इस नाकेबंदी के चलते अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से मिलने वाली मदद यहां नहीं पहुंच पाती, जिसकी वजह से पिछले 10 सालों में गाजा की स्थिति काफी खराब हो गई है। यहां 40 फीसदी तक बेरोजगारी है, लोगों के घर में बिजली-पानी नहीं है। गाजा में हमास और इजरायल के बीच कई बार युद्ध हुए, जिसमें हजारों लोगों की मौत हो चुकी है, इस लड़ाई में दोनों ही गुट स्थानीय नागरिकों को भी निशाना बनाते हैं।

यरूशलम शहर विवाद
यरूशलम बहुत बड़ा शहर है, यह इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म के लिए काफी अहम है। यह यहूदियों का दुनिया में सबसे पवित्र स्थान है, इस्लाम में मक्का और मदीना के बाद यह तीसरा सबसे पवित्र स्थान है। ईसाई धर्म के लिए भी यह काफी अहम स्थान है क्योंकि यहां जीसस क्राइस को सूली पर चढ़ाया गया था। तीनों धर्म को अब्राहम धर्म कहा जाता है। पूर्वी यरूशलम में ज्यादातर मुस्लिम आबादी है, जबकि पश्चिमी हिस्से में यहूदी आबादी है, जबकि इनके बीचो-बीच यह पवित्र स्थान मौजूद है। यहां अल अक्सा मस्जिद में इजरायल 18-50 वर्ष के लोगों को जाने से रोकता है क्योंकि ये लोग अक्सर यहां प्रदर्शन करते हैं। यरूशलम को पूरी दुनिया में आज भी इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता नहीं मिली है। इजरायल यरूशलम को अपनी राजधानी मानता है, जबकि दुनिया के अन्य देश अभी भी तेलावीव है, लिहाजा सारे दूतावास यहीं स्थित हैं।












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