Diplomacy: रूस से गले लगे, चीन से बातचीत, US के पार्टनर बने: नये वर्ल्ड ऑर्डर को कैसे संतुलित कर रहा भारत?

Diplomacy: भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हाल की रूस यात्रा ने कई देशों में चिंता बढ़ा दी है और रणनीतिक समुदाय, खास तौर पर पश्चिमी देशों की ओर से इस पर कई टिप्पणियां की गई है। उन्हें भारत के एक अस्थिर शक्ति होने का डर तो है, लेकिन वे भारत की रणनीतिक संतुलनकारी शक्ति होने की वास्तविकता को नहीं समझ पा रहे हैं, जिसका लक्ष्य और मकसद विकसित भारत 2047 है।

हालांकि, जबकि रणनीतिक बहस का मुद्दा एक नई विश्व व्यवस्था (या अव्यवस्था) को लेकर है, लेकिन गहराई से देखने पर इसके कई मायने निकलते दिखते हैं। आज, हम कई आदेशों का एक व्यापक एजेंडा देखते और महसूस करते हैं, जिनमें एक नया व्यापार आदेश, नई ऊर्जा व्यवस्था, नई वित्तीय व्यवस्था, नई आर्थिक व्यवस्था, नई पर्यावरण व्यवस्था, नई मानवाधिकार व्यवस्था शामिल हैं।

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इसलिए बदलता ग्लोबल ऑर्डर महत्वपूर्ण हो जाता है, जो सिर्फ युद्ध की स्थिति नहीं, बल्कि वैश्विक शांति का आधार क्या होगा, वो भी निर्धारित करता है। और यहीं पर आकार भारत खुद को एक संतुलित और परिपक्व लोकतंत्र के तौर पर दुनिया के सामने नया मॉडल पेश करता है, जो दुनिया में शांति, हर किसी के लिए लाभ, हर किसी की सुरक्षा और हर किसी का विकास चाहता है।

भारत की शांति का मार्ग, कहीं और पर अशांति फैलाकर लाना नहीं है, जैसा अमेरिका, रूस या फिर चीन का सिद्धांत रहा है, बल्कि भारत ने निरंतर डिप्लोमेसी पर जोर दिया है, एक दुनिया पर जोर दिया है, बातचीत पर जोर दिया है और मोदी के शब्दों में 'आज का युग युद्ध का युग नहीं है' के सिद्धांत को जन्म दिया है।

21वीं शताब्दी में इंटरनेशनल रिलेशन

21वीं सदी की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिम का एकतरफावाद, चीन की आक्रमकता, रूस का फिर से उदय (सोवियत संघ के विघटन के बाद) और ग्लोबल ऑर्डर में भारत के अभूतपूर्व ताकत बनकर उदय को माना गया है। नये ग्लोबल ऑर्डर में बहुध्रुवीय रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, बहुपक्षवाद और राष्ट्रीय हित से प्रेरित द्विपक्षीय संबंधों के बीज बोए गये हैं।

इससे राज्यों के बीच अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (International Relation) में तीव्र बदलाव और अस्थिरता आ गई है। इंटरनेशनल रिलवेशन 2.0 में देशों का मकसद राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए भू-राजनीतिक अवसरों का फायदा उठाना है, और दुनिया की मकसद की जगह अपने मकसद को आगे रखना है। हालांकि, अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीति हमेशा से यही रही है, लेकिन अब जबकि दूसरे देशों ने भी अपने हितों को पहचानना शुरू किया है, तो पश्चिमी देशों के पेट में दर्द होना निश्चित है।

आज के इंटरनेशनल रिलेशन में आर्थिक प्रतिस्पर्धा, टकराव और व्यापार विवाद शामिल हैं, जो वैश्विक आर्थिक विकास और रणनीतिक सुरक्षा को प्रभावित करते हैं। और इस तरह से एक जटिल ग्लोबल ऑर्डर का निर्माण होता है, जिसे अपने आधार पर चलाने, नियंत्रित करने या फिर उस जटिल व्यवस्था से तालमेल बिठाना आसान नहीं है।

और इस ग्लोबल ऑर्डर में भारत का हित अपने आर्थिक विकास, नेशनल सिक्योरिटी, अलग अलग देशों से जुड़ाव के साथ साथ जियो-पॉलिटिक्स में अपनी शक्ति का अहसास कराने में है।

इसलिए वर्तमान दुनिया में भारत की विदेश नीति की कुशलता रूस, चीन और अमेरिका के साथ रणनीतिक संतुलन बनाए रखने, विरोधाभासों को न्यूनतम करने, प्रतिस्पर्धा को संतुलित करने और सहयोग को बढ़ावा देने में ही है, जो भारत कर रहा है।

भारत का स्ट्रैटजिक बैलेंस

भारत-रूस संबंध: रूस के साथ भारत के संबंध ऐतिहासिक विश्वास, साझा राष्ट्रीय हित, गहरे रक्षा संबंधों और गहरे होते ऊर्जा संबंधों के आधार पर स्थायी और रणनीतिक रूप से विकसित हुए हैं, जिसमें लगातार विकास ही देखा गया है।

हालांकि यूक्रेन युद्ध ने रूस को अलग-थलग कर दिया है, इससे रूस कमजोर हो गया है और चीन के करीब चला गया है, जिससे भारत की नेशनल सिक्योरिटी प्रभावित होती है। लेकिन रूस और चीन के बीच नए सिरे से बने रिश्तों के बीच उनकी प्राथमिकताएं भारत से अलग हैं, जो भारत को असहज करने वाली हैं। मौजूदा हालात में भारत को रूस से 'हाई ग्राउंड' वाली स्ट्रैटजिट पार्टनरशिप की उम्मीद करना अवास्तविक होगा, क्योंकि पश्चिमी देशों की अकड़ और बेलगाम प्रतिबंधों ने चीन और रूस को 'बिना सीमा वाली' साझेदारी करने पर मजबूर कर दिया है, जिसे भारत समझता है।

और यही वजह है, कि इंडो-पैसिफिक में हिमालय में चीन की आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए, अपनी नेशनल सिक्योरिटी के वास्ते और चीन की शक्ति को बैलेंस करने के लिए भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपने राजनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य संबंधों को मजबूत किया है।

इससे भारत की रूस पर निर्भरता कम हुई है, फिर भी दोनों देशों के बीच आपसी सम्मान और समझ कायम है। रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत का तटस्थ रुख रूस और अमेरिका के बीच संतुलन बनाने की उसकी नाज़ुक नीति को दर्शाता है, जिसका मकसद किसी को नाराज किए बिना अपने हितों को सुरक्षित रखना है।

भारत और अमेरिका के बीच स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप: भारत और अमेरिका ने हाल ही में अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करते हुए उसे स्ट्रैटजिक संबंधों में बदला है, जिसका मकसद साफ तौर पर आक्रामक चीन के उदय को रोकने के लिए रास्ता बनाना है। भारत और अमेरिका, दोनों के चीन के साथ प्रतिकूल संबंध हैं, और दोनों ही देश, चीन को वैश्विक स्थिरता के लिए सबसे गंभीर खतरा मानते हैं।

और इसी मकसद के साथ दोनों ने अपने व्यापारिक संबंधों को नये आयाम पर पहुंचाया है, इंडो-पैसिफिक में QUAD को मजबूत किया है। जहां भारत अपनी मल्टी एलायनमेंट स्ट्रैटजी में अमेरिका को एक रणनीतिक भागीदार के तौर पर देखता है, वहीं अमेरिका, भारत को चीन के प्रति संतुलन और अपने पक्ष में संतुलन बनाने वाले देश के तौर पर देखता है। और यही वजह है, कि दोनों देशों के बीच विरोधाभासी संबंध देखने को मिलते हैं, क्योंकि अगर भारत-अमेरिका संबंध से चीन को हटा दिया जाए, तो अमेरिका की नीति भारत के लिए कुछ अच्छी नहीं दिखेगी।

चीन के साथ भारत के संबंध: भारत और चीन के बीच संबंध अविश्वास और अस्थिरता से लबालब भरे हुए हैं, जो मुख्य रूप से चीनी आधिपत्यपूर्ण डिजाइन की वजह से है। एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित करने के लिए सबसे आवश्यक तत्व ये है, कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट हासिल करे और इस मकसद के लिए ना चाहते हुए भी, भारत को चीन के साथ अपने संबंध को स्थिर करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

पाकिस्तान-चीन की मिलीभगत और अमेरिका-चीन तनाव में रूस की भागीदारी, इस संबंध को और जटिल बनाती है और भारत के लिए ये हालात अनुकूल और मुश्किल दोनों बनाते हैं। भारत, चीन को नियंत्रित करने के लिए रूस और अमेरिका के साथ अपने संबंधों का लाभ उठाता है, दोनों वैश्विक शक्तियों के साथ अपने हितों को संतुलित करने की कोशिश करता है।

भारत की विदेश नीति के लिए स्ट्रैटजिक चुनौतियां

भारत की जियो-पॉलिटिकल अवसरवादिता और स्ट्रैटजिक बैलेंसिग एक्ट, भारत की विदेश नीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। RIC, BRICS और SCO जैसे संगठनों के माध्यम से रूस और चीन के साथ जुड़ाव के साथ साथ भारत QUAD, G-20 और JAI के जरिए अमेरिका के साथ भी अपने संबंधों मजबूत कर रहा है, जो भारत की सूक्ष्म विदेश नीति का उदाहरण है।

यह स्ट्रैटजिक बैलेंसिग एक्ट, भारत के लिए INSTC और IMEC जैसी कनेक्टिविटी व्यापारिक मार्गों के लिए भी महत्वपूर्ण है। और भारत ने अपने इस स्ट्रैटजिक बैलेंस में अपनी विचारधारा, शांति और वसुधैव कुटुंबकम को आधार बनाया हुआ है और इसीलिए चाहे कोविड संकट हो, या यूक्रेन युद्ध या फिर गाजा युद्ध, भारत ने जटिल जियोपॉलिटिकल हालात से खुद को बाहर निकाला है।

भारत ने लोकतंत्र (अमेरिका) और तानाशाही शासन (चीन और रूस) के बीच संतुलन बनाया है और वैचारिक सिद्धांत के आधार पर ही भारत इसे संतुलित संतुलित करता है।

आज के ग्लोबल ऑर्डर में हथियार जमा करने की रेस काफी तेज हो चुकी है। QUAD, चीन के लिए एक चिढ़ पैदा करने वाला संगठन बन गया है, जो चीन के हिंद-प्रशांत के विचार को सिरे से खारिज करता है और इसे चीन हर हाल में की रोकना चाहता है। अमेरिका भी चीन-रूस-ईरान के उदय को लेकर चिंतित है, जो अमेरिका को टक्कर देने और उसकी वैश्विक शक्ति की स्थिति को कमजोर करने के लिए एक ध्रुव के रूप में उभर रहा है। और ये हालात, भारत को एक ऐसी स्थिति में लाता है, जहां से वो अपने हिसाब से खुद को ग्लोबल ऑर्डर में फिट कर सके और ज्यादातर समय अपनी शर्तों पर संबंधों को विकसित कर सके।

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