Crude Oil: बजट से पहले इंटरनेशनल मार्केट में धड़ाम से गिरे कच्चे तेल के दाम, क्या आम लोगों को मिलेगा लाभ?
Crude Oil Price: यूक्रेन युद्ध से भारत को सबसे बड़ा फायदा कच्चे तेल को लेकर हुआ, क्योंकि रूस ने भारी डिस्काउंट पर भारत को कच्चा तेल बेचना शुरू कर कर दिया और इस वक्त भी भारत 60 डॉलर प्रति बैरल से कम कीमत पर रूस से कच्चा तेल खरीदता है, क्योंकि G7 देशों ने रूसी कच्चे तेल की कीमत पर प्राइस कैप लगा रखी है।
वहीं, अब संभावना है, कि इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमत और गिरने की संभावना है, जिसके बाद सवाल उठ रहे हैं, कि क्या इसका लाभ भारत के आम लोगों को मिलेगा?

आज मंगलवार को तेल की कीमतों में गिरावट देखी गई है और माना जा रहा है, कि इसके पीछे चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी की वजह से चीनी मार्केट में तेल की डिमांड कम होने को लेकर उपजी चिंता है। हालांकि इस बात पर आम सहमति बन रही थी, कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व सितंबर में ही अपनी प्रमुख ब्याज दर में कटौती शुरू कर देगा, जिससे ये गिरावट सीमित हो गई है।
आज ब्रेंट ऑयल की कीमत 0.1 प्रतिशत गिरकर 84.76 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि यूएस वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 13 सेंट यानि 0.2% गिरकर 81.78 डॉलर पर आ गया है।
चीन में छाई आर्थिक मंदी का असर
रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की अर्थव्यवस्था दूसरी तिमाही में अपेक्षा से बहुत धीमी गति से बढ़ी है, जो लंबे समय से चल रही प्रॉपर्टी सेक्टर में आई मंदी और नौकरी की असुरक्षा से बाधित रही है। माना जा रहा है, कि चीन अभी आर्थिक मंदी में फंसा रहेगा, क्योंकि अमेरिका के साथ उसका ट्रेड वार बना हुआ है और अगर डोनाल्ड ट्रंप की 5 नवंबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में वापसी होती है, तो ये ट्रेड वार खतरनाक दिशा में मुड़ जाएगा।
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी कैम्पेन में चीनी सामानों पर भारी-भरकम टैरिफ लगाने की धमकी दी है और अगर ऐसा होता है, तो चीन का निर्यात बुरी तरह से गिरेगा, क्योंकि चीन अपना सबसे ज्यादा सामान अमेरिका को ही बेचता है। यानि, संभावना यही है, आने वाले महीनों में भी चीनी बाजार में तेल की डिमांड कम ही रहने वाली है।
आधिकारिक आंकड़ों से पता चला है, कि अप्रैल-जून में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था 4.7% बढ़ी है, जो 2023 की पहली तिमाही के बाद से सबसे कम है और रॉयटर्स के 5.1% के पूर्वानुमान से भी कम है। यह पिछली तिमाही के 5.3% विस्तार से भी कम है। सोमवार को आधिकारिक आंकड़ों से पता चला है, कि चीन के रिफाइनरी उत्पादन में जून में एक साल पहले की तुलना में 3.7% की गिरावट आई है, जो कि नियोजित रखरखाव के कारण तीसरे महीने भी कम है, जबकि कम प्रोसेसिंग मार्जिन और ईंधन की कम मांग ने स्वतंत्र संयंत्रों को उत्पादन में कटौती करने के लिए मजबूर कर दिया है।
इस बीच, फेड के अध्यक्ष जेरोम पॉवेल ने सोमवार को कहा है, कि इस वर्ष की दूसरी तिमाही में अमेरिका में मुद्रास्फीति के तीन आंकड़े "कुछ हद तक विश्वास बढ़ाते हैं" कि मूल्य वृद्धि की गति स्थायी रूप से केंद्रीय बैंक के लक्ष्य की ओर लौट रही है, जिसके बाद बाजार का अनुमान है, कि अमेरिकी फेडरल बैंक को ब्याज दरों में कटौती की दिशा में आगे बढ़ने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
अगर फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती करता है, तो कम ब्याज दरों से उधार लेने की लागत कम हो जाती है, जिससे आर्थिक गतिविधि और तेल की डिमांड बढ़ सकती है।
हालांकि, दुनिया में चल रहे युद्ध की वजह से तेल की सप्लाई भी बाधित हो रही है। गाजा में चल रहे युद्ध का जवाब हूती विद्रोगी लाल सागर में हमला करके दे रहे हैं। पिछले दिनों भी लाल और भूमध्य सागर में बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन और बम से भरी नावों से तीन जहाजों को निशाना बनाया, जिसमें एक तेल टैंकर भी शामिल था। लाल सागर में जहाजों पर हमलों ने जहाजों को लंबे रास्ते से गुजरने के लिए मजबूर किया है, जिसका अर्थ है कि तेल से भरे जहाजों को गंतव्य स्थान तक पहुंचने में काफी समय लगेगा।
वहीं, रूसे के उप प्रधान मंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने सोमवार को कहा है, कि पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन और उसके सहयोगियों, जिन्हें सामूहिक रूप से OPEC+ के रूप में जाना जाता है, उसके बीच उत्पादन समझौते के कारण वर्ष की दूसरी छमाही में और उसके बाद वैश्विक तेल बाजार संतुलित रहेगा।
उम्मीद की जानी चाहिए, कि तेल बाजार संतुलित रहेगा, लेकिन सवाल ये है, कि मौजूदा समय में तेल की कीमतों में जो कमी आ रही है, क्या उसका लाभ आम उपभोक्ताओं पर होगा? भारतीय संसद में अगले हफ्ते बजट पेश होना है और उससे पहले डिमांड की जा रही है, कि तेल को भी GST के दायरे में लाया जाए। अगर ऐसा होता है, तो तेल की कीमत काफी कम हो सकती है, लेकिन इससे सरकार को मिलने वाले राजस्व में भारी कमी आ जाएगी, तो क्या सरकार अपने खजाने पर असर डालने के लिए तैयार है?












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