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कोरोना: क्या चीन की वैक्सीन का प्रभाव कम हो रहा है?

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पूरे एशिया के टीकाकरण अभियान में चीनी टीकों ने अहम भूमिका निभाई है. लाखों लोगों को चीन में बनी साइनोवैक या साइनोफार्म की वैक्सीन दी गई है.

लेकिन ये टीके कितने प्रभावी हैं, इसे लेकर हाल के हफ़्तों में काफ़ी चिंताएं ज़ाहिर की गई हैं. अब कई एशियाई देश जिनके टीकाकरण का अहम हिस्सा चीनी वैक्सीन हैं, उन्होंने दूसरे टीकों के इस्तेमाल का एलान किया है.

इस कदम ने चीनी वैक्सीन पर तो सवाल उठाए ही हैं, चीन की वैक्सीन डिप्लोमेसी पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.

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थाईलैंड और इंडोनेशिया में क्या हो रहा है?

पिछले हफ़्ते थाईलैंड ने अपनी वैक्सीन पॉलिसी में बदलाव किए. अब सिनोवैक की दो डोज़ के बदले वहां के लोगों को एक डोज़ साइनोवैक की और दूसरी डोज़ एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन की दी जाएगी.

स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों को भी दूसरी वैक्सीन की बूस्टर डोज़ दी जाएगी.

इंडोनेशिया ने भी ऐसा ही कदम उठाने का एलान किया है. वहां भी स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों को दूसरी डोज़ मॉडर्ना वैक्सीन की दी जाएगी. ये फ़ैसला वैक्सीन की दोनो डोज़ ले चुके सैंकड़ों हेल्थ वर्कर्स के कोरोना संक्रमित होने के कई मामलों के सामने आने के बाद लिया गया.

थाईलैंड में दो और इंडोनेशिया में 30 हेल्थ वर्कर्स की वैक्सीन लेने के बाद भी मौत हो गई.

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दोनों देशों में टीकाकरण अभियान की शुरुआत धीमी हुई और अब वो नए प्रकोपों से जूझ रहे हैं. थाईलैंड से रिकॉर्ड संख्या में संक्रमण और मौतों की ख़बरें आ रही हैं, जबकि इंडोनेशिया एशिया में कोविड का नया केंद्र बन गया है. अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है और कई जगहों पर ऑक्सीजन की कमी देखी जा रही है.

दोनों देशों ने कहा कि वो एहतियात के तौर पर टीके बदल रहे हैं.

थाई अधिकारियों ने स्थानीय अध्ययनों का हवाला दिया, जिनके मुताबिक़ अलग-अलग टीके देने से प्रतिरक्षा प्रणाली मज़बूत होती है.

इंडोनेशिया के पर्यटन मंत्री सैंडियागा ऊनो ने हाल ही में बीबीसी को बताया कि सिनोवैक वैक्सीन "काफ़ी प्रभावी" है.

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के ग्लोबल आउटब्रेक अलर्ट और रिस्पांस नेटवर्क के प्रमुख डेल फिशर ने कहा कि टीकों को बदलने का विकल्प चुनकर, थाई और इंडोनेशियाई सरकारें इस ओर इशारा कर रही हैं कि "वे टीके की विफलता के बारे में चिंतित हैं."

हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि स्वास्थ्य कर्मियों के संक्रमण और मौतों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है और अधिकारियों से "पूरी तरह से जांच" करने का आग्रह किया है.

सिनोवैक की तरफ़ से इस मुद्दे पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं आई है.

इसके बाद मलेशिया ने घोषणा की कि उसने सिनोवैक की वैक्सीन की आपूर्ति समाप्त होने बाद फाइज़र के टीके का इस्तेमाल शुरू कर दिया है.

लेकिन फिलीपिंस और कंबोडिया जैसे अन्य देश चीन के टीकों का उपयोग जारी रखे हुए हैं.

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क्या चीन के टीके प्रभावी हैं?

दुनिया भर में क्लिनिकल परीक्षणों में, सिनोवैक और सिनोफार्म के टीकों को कोविड संक्रमण को रोकने में 50% से 79% तक प्रभावी बताया गया है.

लेकिन क्या ये टीके गंभीर बीमारी या मौतों को रोकने में अत्यधिक प्रभावी हैं? अध्ययनों में पाया गया कि सिनोवैक ब्राजील में 100% प्रभावी बताया गया और इंडोनेशियाई चिकित्साकर्मियों के बीच 96 से 98% प्रभावी.

हांगकांग विश्वविद्यालय के महामारी विज्ञान के प्रोफ़ेसर बेंजामिन काउलिंग का कहना है कि पूरी तरह से टीका लगाए गए लोगों में अभी भी कई तरह के संक्रमण हैं, जो कई कारणों से हो सकते हैं.

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एक कारण ये हो सकता है कि चीनी टीकों का कई अन्य टीकों की तरह, समय के साथ प्रभाव कम हो रहा हो. इस सप्ताह जारी एक थाई अध्ययन में पाया गया कि सिनोवैक के साथ पूरी तरह से टीका लेने वाले लोगों में एंटीबॉडी हर 40 दिनों में आधी हो जाती है.

एक और कारण ये हो सकता है कि परीक्षण, वास्तविक दुनिया के संक्रमणों की तुलना में छोटे डेटासेट पर किए जाते हैं, ख़ासतौर पर इंडोनेशिया में, जहां हर दिन हजारों की संख्या संक्रमण के नए मामले आ रहे हैं.

ये डेल्टा वैरिएंड के कारण भी हो सकता है, जो इंडोनेशिया में हाल के मामलों का 60 प्रतिशत और थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में कुल मामलों का 26 प्रतिशत है.

प्रो. काउलिंग के मुताबिक चीनी टीकों के प्रभाव से जुड़ा कोई सार्वजनिक डेटा मौजूद नहीं है. लेकिन शुरुआती अध्ययनों में ये सामने आई थी कि निष्क्रिय वायरस के बने टीके डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ 20 प्रतिशत तक कम सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं.

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उन्होंने कहा कि कोई भी टीका कोविड संक्रमण को रोकने में पूरी तरह प्रभावी नहीं है, इसी तरह चीनी टीके भी "100% प्रभावी नहीं हैं, फिर भी वे कई लोगों की जान बचा रहे हैं."

विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि संक्रमण हो जाने का मतलब यह नहीं है कि टीके व्यर्थ हैं, क्योंकि टीकाकरण लोगों को कोविड -19 से गंभीर रूप से बीमार होने से रोकने में मदद करता है.

ये भी बात ध्यान देने योग्य है कि चीन में अभी तक बड़े स्तर पर संक्रमण की कोई रिपोर्ट नहीं है, वहां 63 करोड़ से अधिक लोगों ने चीनी वैक्सीन का कम से कम एक शॉट लिया है. कितने लोगों को दूसरी डोज़ भी मिल गई है, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है.

लेकिन माना जा रहा है कि वायरस चीन में नियंत्रण में है, वहां दैनिक संक्रमण की दर कम है और वहां बड़े स्तर पर किसी इलाके में संक्रमण के फैलने की ख़बर नहीं है.

चीन की वैक्सीन कूटनीति पर क्या पड़ेगा प्रभाव

एशिया चीन की वैक्सीन कूटनीति का अहम हिस्सा है, इसी क्षेत्र में चीन की वैक्सीन सबसे अधिक मात्रा में पहुंची है.

30 से अधिक एशियाई देशों ने ये टीके खरीदे हैं या उन्हें दान में मिले हैं. इंडोनेशिया दुनिया में सिनोवैक के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है, जिसने 12.5 करोड़ खुराक का ऑर्डर दिया है.

सिंगापुर के राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में चीन विशेषज्ञ इयान चोंग ने कहा कि टीके बेचने या दान करने की चीन की उत्सुकता "इस बात को गलत साबित करने का प्रयास है कि संक्रमण पहली बार वुहान में पाया गया था, और यह दिखाने का अवसर भी है कि वो विज्ञान का पावरहाउस है."

दूसरे टीकों पर अमीर देशों ने एकाधिकार बना लिया था, तब एशिया के कई देशों, ख़ासतौर पर गरीब देशों ने चीन का रुख किया.

डॉ चोंग के मुताबिक, "सोच यह थी कि 'कुछ सुरक्षा बिना सुरक्षा से बेहतर है', भले ही उस समय वैक्सीन के प्रभाव को लेकर बहुत अच्छा डेटा उपलब्ध नहीं था."

उदाहरण के लिए, थाईलैंड ने शुरू में अपने टीकों के थोक उत्पादन के लिए राजा के स्वामित्व वाली एक स्थानीय फर्म पर भरोसा किया था, लेकिन धीमी डिलीवरी और इस साल कोविड के बढ़ते प्रकोप के बाद, वो दूसरे स्रोतों की तलाश करने के लिए मजबूर हो गया.

देश में निर्मित एस्ट्राजेनेका टीकों के अलावा, वो ज्यादातर सिनोवैक के टीकों पर निर्भर हैं, क्योंकि चीनी फर्म सबसे पहले टीका मुहैया कराने वालों में से है.

आम लोग कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं?

थाईलैंड और इंडोनेशिया दोनों सरकारों को उनके धीमे टीकाकरण रोलआउट और बिगड़ती कोविड स्थितियों के कारण आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.

थाईलैंड में, स्वास्थ्य मंत्रालय के लीक हुए दस्तावेज़ के कारण नाराजगी और बढ़ गई है, जिसमें एक अधिकारी ने स्वास्थ्य सेवा से जुड़े लोगों को फ़ाइज़र का बूस्टर शॉट देने का विरोध किया था क्योंकि यह "इस बात को मानने जैसा होगा कि सिनोवैक सुरक्षा नहीं देता."

चुलालोंगकोर्न विश्वविद्यालय में चीनी अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ आर्म तुंगनिरुन ने कहा, "थाई जनता में बहुत गुस्सा है, वे कह रहे हैं कि 'आप स्वास्थ्य कर्मियों की परवाह क्यों नहीं करते', 'यह एक कारण नहीं होना चाहिए', कई लोगों को सरकार की बातों और सिनोवैक की निर्भरता को लेकर गहरी चिंता है.

"अभी सिनोवैक को ख़ारिज करने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो मानते हैं कि यह प्रभावी नहीं है. थाई सरकार में एक बड़ा अविश्वास है, और वैक्सीन के मुद्दे का राजनीतिकरण हो गया है."

रविवार को, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री के इस्तीफे का आह्वान करते हुए बैंकॉक में मार्च किया, और फ़ाइजर या मॉडर्ना जैसे टीके लगाने की मांग की.

ऐसी आशंकाएं हैं कि संक्रमण के नए मामलों की रिपोर्ट टीकों को लेकर संदेह को बढ़ावा देगी. इंडोनेशिया में, धार्मिक प्रभुत्व वाले लोग और कॉन्सिपिरेसी थ्योरी बनाने वाले लोग पहले ही सोशल मीडिया पर चीन के टीकों का विरोध कर रहे हैं.

कई विशेषज्ञ गलत सूचनाओं को ऑनलाइन फैलने से रोकने की कोशिश में लगे हुए हैं.

प्रो काउलिंग कहते हैं: "यह बहुत अच्छा है कि हम (चीनी टीकों) का उपयोग कर रहे हैं लेकिन हम बहुत अधिक उम्मीद नहीं रख सकते."

"हमें यह समझना होगा कि संक्रमण फैलेगा और उनसे निपटने के लिए हमें तैयार रहना होगा, क्योंकि इससे वैक्सीन पर विश्वास कम होने का डर है."

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