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'वुहान लैब से ही निकला था कोरोना, मानव-निर्मित वायरस है', वहां काम कर चुके वैज्ञानिक ने खोली चीन की पोल

चीन के वुहान लैब में काम कर चुके एक वैज्ञानिक एंड्रयू हफ ने अपनी नई किताब में दावा किया है कि कोविड-19 एक मानव-निर्मित वायरस है, जो चीन के लैब से निकला था। उनके मुताबिक चीन को पहले दिन से सब पता था।

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Covid-19 Origin and History: कोरोना वायरस को इंसान ने ही बनाया है और यह प्रयोगशाला से निकलकर पिछले तीन साल से दुनिया भर में कहर बरपा रहा है। चीन के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में काम कर चुके एक वैज्ञानिक के खुलासे ने उसकी अबतक की झूठ की पोल खोल दी है। सवालों के घेरे में विश्व स्वास्थ्य संगठन भी आ सकता है, जिसपर शुरू से ही चीन के दबाव में इसे वैश्विक महामारी घोषित करने में देर करने के आरोप लग रहे थे। अमेरिका में रह रहे जिस शोधकर्ता ने अपनी नई किताब में यह बातें उजागर की हैं, उन्होंने अमेरिका पर भी आरोप लगाए हैं कि उसी से मिलने वाले फंड की वजह से ही चीन ने इतनी बड़ी लापरवाही बरती, जिससे पूरी मानवता पर संकट मंडराने लगा था।
वुहान लैब से ही निकला कोरोना वायरस- वुहान लैब के पूर्व वैज्ञानिक

वुहान लैब से ही निकला कोरोना वायरस- वुहान लैब के पूर्व वैज्ञानिक

अमेरिका में रहने वाले एक वैज्ञानिक ने कोरोना वायरस की पैदाइश को लेकर यह खुलासा किया है कि यह एक मानव-निर्मित वायरस और चीन के वुहान लैब से ही निकला है। गौरतलब है कि इस बात की आशंका शुरुआत से ही जताई जाती रही है और आरोप भी लगते रहे हैं, लेकिन इसकी पुष्टि कभी नहीं हो पाई थी। और ना ही चीन कभी यह मानने के लिए तैयार हुआ था। लेकिन, अब वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में काम कर चुके वैज्ञानिक एंड्रयू हफ ने ब्रिटिश अखबार द सन को दिए एक बयान में यह दावा किया है, जो खबर के तौर पर न्यूयॉर्क पोस्ट ने भी छापी है।

'द ट्रुथ अबाउट वुहान' से खुली चीन की पोल

'द ट्रुथ अबाउट वुहान' से खुली चीन की पोल

एपिडेमियोलॉजिस्ट एंड्रयू हफ ने अपनी एक नई किताब 'द ट्रुथ अबाउट वुहान' में दावा किया है कि यह महामारी चीन को अमेरिकी सरकार की ओर से कोरोना वायरसों के लिए मिली फंडिंग की वजह से पैदा हुई थी। 'द सन' में उनकी किताब के कुछ अंश भी प्रकाशित किए गए हैं। न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक हफ न्यूयॉर्क स्थित इकोहेल्थ अलायंस नाम के एक नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन के पूर्व वाइस प्रेसिडेंट भी हैं, जो संक्रामक बीमारियों पर रिसर्च करता है।

'वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से लीक हो गया'

'वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से लीक हो गया'

रिपोर्ट के अनुसार हफ ने अपनी किताब में दावा किया है कि चीन में अपर्याप्त सुरक्षित तरीके से प्रयोग हुए, जिसके चलते वुहान लैब से लीक हुआ। तीन साल पहले लगभग इसी समय जब कोरोना वायरस की शुरुआत हुई थी, तब से वुहान लैब विवादों के केंद्र में रहा है और वहीं से वायरस के लीक होने की आशंका जताई जाती रही है, लेकिन चीन की सरकार और वुहान लैब की ओर से लगातार इसका खंडन किया जाता रहा। हफ ने अपनी किताब में लिखा है, 'विदेशी प्रयोगशाला में उचित बायोसेफ्टी, बायोसिक्योरिटी और रिस्क मैनेजमेंट को लेकर पर्याप्त नियंत्रण उपायों की व्यवस्था नहीं थी, आखिरकार वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से लीक हो गया।'

अमेरिकी फंडिंग को माना जिम्मेदार

अमेरिकी फंडिंग को माना जिम्मेदार

वह संगठन एक दशक से ज्यादा समय से चमगादड़ों में होने वाले कई कोरोना वायरस पर रिसर्च कर रहा है, जिसकी फंडिंग नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) ने किया है और उसके वुहान लैब के साथ भी नजदीकी संबंध रहे हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ बायोमेडिकल और जन स्वास्थ्य पर रिसर्च के लिए अमेरिका की एक प्रमुख सरकारी एजेंसी है। हफ 2014 से 2016 तक इकोहेल्थ अलायंस के साथ काम कर चुके हैं। उनके मुताबिक यह संगठन वर्षों तक 'चमगादड़ों वाले कोरोना वायरसों को दूसरे प्रजातियों पर हमला करने के लिए बेहतरीन मौजूदा तरीके की डिजाइन' विकसित करने में वुहान लैब की सहायता कर रहा था।

चीन को पहले दिन से सब पता था- एंड्रयू हफ

चीन को पहले दिन से सब पता था- एंड्रयू हफ

उन्होंने साफ तौर पर लिखा है कि 'चीन पहले दिन से जानता था कि यह एक आनुवंशिक रूप से तैयार एजेंट था....' उन्होंने कहा है कि 'चीन को खतरनाक बायोटेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने का जिम्मेदार अमेरिकी सरकार को ठहराया जा सकता है।' उन्होंने कहा कि 'मैंने जो देखा उससे मैं डर गया।' उनके मुताबिक, 'हम उन्हें सिर्फ जैव हथियार प्रॉद्योगिकी सौंप रहे थे।'

बहुत ही खतरनाक लगता है चीन का मंसूबा

बहुत ही खतरनाक लगता है चीन का मंसूबा

न्यूयॉर्क पोस्ट ने यह भी कहा है कि प्रोपब्लिका/वैनिटी फेयर में हाल में छपे अनुसंधान के मुताबिक वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी चीन का सबसे खतरनाक कोरोना वायरस रिसर्च का घर है। वहां की सत्ताधारी चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से इसपर बहुत ज्यादा दबाव रहता है कि वह ऐसे वैज्ञानिक खोज करके दे, जिससे कम संसाधन के बावजूद उसकी वैश्विक हैसियत में बढ़ोतरी होती रहे।


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