कोरोना महामारी के खिलाफ कोवैक्सीन 77.8% प्रभावी, इससे लोगों में दम आएगा: ब्रिटिश जर्नल का दावा
लंदन। भारत में सरकार की चिकित्सा अनुसंधान एजेंसी और भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड द्वारा तैयार की गई "कोवैक्सीन" कोरोना महामारी से निपटने में काफी असरदार है। इस बात को अब दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे प्रसिद्ध चिकित्सा-पत्रिकाओं में से एक "द लैंसेट" की स्टडी में भी कहा गया है। "द लैंसेट" की स्टडी के मुताबिक, कोविड-19 के खिलाफ कोवैक्सीन 77.8% प्रभावकारी है। ऐसे में इसे लोगों को देना आवश्यक है, ताकि मौजूदा समय में लोगों को खतरनाक वायरस से बचाया जा सके।
Recommended Video

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की स्टडी
"द लैंसेट" एक ब्रिटिश साप्ताहिक-पत्रिका है, और ब्रिटेन वह देश भी है जिसने भारतीयों को वैक्सीनेशन के बावजूद अपने यहां क्वारंटाइन कराया था। ब्रिटेन और कुछ पश्चिमी देशों में भारतीय वैक्सीन को प्रभावी नहीं माना जाता, इसलिए विदेशों में जा रहे भारतीयों को परेशानी उठानी पड़ रही है। ऐसे समय में "द लैंसेट" भारत के लिए मायने रखती है। "द लैंसेट" में प्रकाशित लंबे समय से प्रतीक्षित विश्लेषण में कहा गया है कि, जो व्यक्ति कोवैक्सिन के डोज ले रहा है, उसके शरीर में "एक मजबूत एंटीबॉडी" डेवलप होती है, जो कोरोना वायरस से बचाए रखती है। "लैंसेट" ने एक बयान में कहा, ''कोवैक्सिन की दो खुराक दिए जाने के दो सप्ताह बाद व्यक्ति में "एक मजबूत एंटीबॉडी प्रतिक्रिया चलती है।"

कोवैक्सीन से लोगों में मजबूत एंडीबॉडी विकसित हुई
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ने कहा कि, भारत में नवंबर 2020 और मई 2021 के बीच 18-97 वर्ष की आयु के 24,419 लोगों को, जिन्हें वैक्सीन दी गई थी, उनमें कोई वैक्सीन से जुड़े गंभीर-असर नहीं देखे गए, और न ही इससे मौतें या प्रतिकूल घटनाएं दर्ज की गईं। इस वैक्सीन को लेकर भारत बायोटेक और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की ओर से एक टेस्ट के बाद कहा गया था कि, लोगों को कोवैक्सीन दी जा सकती है...यह वाकई वायरस से बचाएगी। इस बारे में आंशिक रूप से दोनों निकायों के अधिकारियों द्वारा लिखा गया था कि, कंपनी की पहले की प्रभावकारिता और सुरक्षा घोषणाओं को देखते हुए इसे अप्रूव करना चाहिए।

बहुत से देशों ने नहीं दी थी मान्यता
जिस वक्त भारत में लोगों को कोवैक्सीन की खुराकें देना शुरू किया गया था, तब सरकार ने इसके उत्पादन को बढ़ाकर 100 मिलियन से अधिक करवाया। वहीं, पिछले हफ्ते विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इनोक्यूलेशन को आपातकालीन उपयोग के लिए अधिकृत कोविड टीकों की अपनी सूची में जोड़ा। फिर भी कुछ देशों के अपने विश्लेषण के दौरान, इस वैक्सीन को पास नहीं किया गया, लिहाजा भारतीयों को विदेश पहुंचने की प्रक्रिया में काफी रुकावटें आईं।

आखिरकार डब्ल्यूएचओ ने माना लोहा
वैक्सीन की स्टडी करने वाले डब्ल्यूएचओ के स्वतंत्र तकनीकी निकाय ने इस वैक्सीन को डेवलप करने वाली कंपनी से आगे की जानकारी के लिए बार-बार पूछा, वहीं, कई देशों में इसे मान्यता भी नहीं दी गई..यह मोदी सरकार के लिए निराशाजनक रहा। बावजूद इसके, भारत में लोगों को इसके डोज देना जारी रहा और अब तक करोड़ों लोगों को कोवैक्सीन के डोज दिए जा चुके हैं। भारत बायोटेक के अध्यक्ष कृष्णा एला ने पहले कोवैक्सिन पर सवाल उठाने वालों पर निशाना साधा था, और इस हफ्ते भी एक सम्मेलन में उन्होंने कहा कि जब तक डब्ल्यूएचओ की मंजूरी मिली, तब तक हुई आलोचना के कारण हमारी छवि को काफी ठेस पहुंची।

भारत में इसके 10 करोड़ से ज्यादा खुराक दिए गए
द लैंसेट के अनुसार, इस वैक्सीन में लोगों की दीर्घकालिक सुरक्षा और प्रभावशीलता के साथ-साथ गंभीर बीमारी से निपटने के गुण हैं..हालांकि इस पर और अधिक शोध की आवश्यकता होगी। बहरहाल, यह बड़ी बात है कि एक प्रतिष्ठित विदेशी मेडिकल-जर्नल यह दावा करती है कि, कोविड-19 से निपटने में भारत की कोवैक्सिन 77.8% प्रभावी है।












Click it and Unblock the Notifications