चीनी रॉकेट ने स्पेस में एक सैटेलाइट को उठाकर कूड़े में फेंक दिया, पकड़ा गया

अंतरिक्ष में बेकार हुए सेटेलाइटों का कचरा बढ़ता जा रहा है.

वुहान, 12 फरवरी। पिछले महीने धरती की कक्षा में स्टार वॉर्स फिल्म जैसा नजारा देखने को मिला. जनवरी के आखिर में एक चीनी उपग्रह एक दूसरे लंबे समय से निष्क्रिय सैटेलाइट को दबोचता दिखा था. कुछ दिन बाद 300 किलोमीटर दूर वो उसे कक्षा के क्रबगाह कहे जाने वाले हिस्से में फेंकता हुआ देखा गया. उस हिस्से में मलबे की किसी अंतरिक्षयान से टकराने की संभावना नहीं के बराबर होती है.

सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक ऐंड इंटरनेशनल स्टडीज ऐंड सिक्योर वर्ल्ड फाउंडेशन के पिछले महीने हुए एक वेबिनार में डॉ. ब्रायन फ्लुवेलिंग ने ये दुर्लभ जानकारी पेश की. वो एक निजी अमेरिकी कंपनी एक्सोएनालिटिक सॉल्यूशंस में चीफ स्पेस सिचुएश्नल अवेयरनेस आर्किटेक्ट हैं. यह कंपनी विशाल ऑप्टिक दूरबीनों के एक व्यापर वैश्विक नेटवर्क का उपयोग करते हुए उपग्रहों की स्थिति को ट्रैक करती है.

22 जनवरी को चीनी अंतरिक्ष यान एसजे-21 अपनी निर्धारित जगह से हटकर निष्क्रिय किए जा चुके उपग्रह कम्पास-जी2 की ओर बढ़ता हुआ देखा गया था. कुछ दिन बाद कम्पास-जी2 से जुड़ा एसजे-21, उसकी कक्षा को बदलता पाया गया. चीनी अधिकारियों ने अभी तक किसी ऐसे अंतरिक्षी ठेले यानी एक उपग्रह को खींचकर ले जाने वाले दूसरे उपग्रह के होने की पुष्टि नहीं की है.

ईएसए का सेटेलाइट सेंंटिनल-6 जो समुद्र का स्तर नापता है.

एक्सोएनालिटिक के वीडियो में दिखाया गया कि अगले कुछ दिनों में दोनों अंतरिक्षयान डोलते हुए पश्चिमी दिशा की ओर जाने लगे. 26 जनवरी को दोनों अलग हुए और जी2 गहन अंधकार में फिंकवा दिया गया. कम्पास-जी2 या बाइडो-2 जी2, चीन की बाइडू-2 संचालन उपग्रह प्रणाली का अंतरिक्षयान है. वो 2009 में अंतरिक्ष भेजे जाने के कुछ ही समय बाद बेकार हो गया था. दस साल से भी अधिक समय से धातु का वो पिंजर पृथ्वी की कक्षा के चारों ओर भटकता रहा है जहां और भी लाखों करोड़ो की संख्या में मलबा बिखरा हुआ है.

एसजे-21, अक्टूबर 2021 में लॉन्च किया गया था. अब वो कॉन्गो बेसिन से जरा ऊपर एक भूस्थैतिक कक्षा (जीईओ) में लौट चुका है. जीईओ तब घटित होता है जब भूमध्यरेखा के ऊपर, एक उपग्रह धरती के घूमने की समान गति से उसका चक्कर काटता है. धरती के लिहाज से देखें तो जीईओ में घूमते उपग्रह स्थिर प्रतीत होंगे. इक्का-दुक्का ही जरा सा हिलते-डुलते दिखेंगे. ऐसी कक्षा को कभी-कभी क्लार्क ऑर्बिट यानी क्लार्क ग्रह-पथ भी कहा जाता है.

इसका ये नाम ब्रिटेन के मशहूर लेखक आर्थर सी क्लार्क के नाम पर पड़ा है. उन्होंने 1945 के अपने एक पर्चे में दूरसंचार के क्षेत्र में क्रांति कर देने की संभावना वाले जीईओ की कल्पना की थी. उसके बाद दो दशक भी नहीं बीते थे कि पहला जियो स्टेश्नरी सैटेलाइट यानी भूस्थैतिक उपग्रह लॉन्च कर दिया गया था.

चीन का मलबा हटानाः जरूरत या खतरा?

मलबा हटाने में तो कुछ भी गलत नहीं है. अंतरिक्ष के कबाड़ की सफाई के लिए दूसरे देशों ने भी ऐसी प्रौद्योगिकियां या तो लॉन्च कर दी हैं या वे उन्हें तैयार कर रहे हैं. जापान ने मार्च 2021 में ईएलएसए-डी मिशन लॉन्च किया था. वो अंतरिक्ष में बिखरे मलबे को पकड़ने और हटाने की प्रौद्योगिकियों के परीक्षण का मिशन था. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) भी अंतरिक्ष कचरे के निस्तारण का अपना अभियान 2025 में लाने की तैयारी कर रही है.

कचरा निस्तारण की प्रौद्योगिकी तैयार करने और अमल में लाने की चौतरफा कोशिशों के बावजूद कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने एसजे-21 जैसे चीनी उपग्रहों को लेकर चिंता जताई है. अमेरिकी अंतरिक्ष कमान के कमांडर जेम्स डिकन्सन ने अप्रैल 2021 मे कहा था कि चीन के एसजे-21 जैसी टेक्नोलॉजी, "भविष्य की किसी प्रणाली के तहत दूसरे उपग्रहों को दबोचने में इस्तेमाल की जा सकती है."

अंतरिक्ष में उपग्रहों का कचरा बढ़ता जा रहा है.

लेकिन वाकई कोई खतरा है भी?

2021 में अपनी काउंटरस्पेस रिपोर्ट में द सिक्योर वर्ल्ड फाउंडेशन ने कहा था कि इस बात के पक्के सबूत है कि चीन और रूस, काउंटरस्पेस यानी प्रतिअंतरिक्ष क्षमताओं वाली प्रौद्योगिकी पर काम कर रहे हैं. आशय अंतरिक्ष प्रणालियों को नष्ट करने की क्षमता से है. रिपोर्ट के मुताबिक वैसे चीन के आधिकारिक बयान अंतरिक्ष में शांतिपूर्ण उद्देश्यों को पूरा करने से ही जुड़े रहे हैं. इस बात के कोई सबूत नहीं है कि किसी विनाशकारी या काउंटरस्पेस अभियानों को उनसे हवा मिली हो.

अमेरिकी वायुसेना से जुड़े एक थिंक टैंक, चाइनीज एयरोस्पेस स्टडीज इंस्टीट्यूट (सीएएसआई) की 2021 की एक रिपोर्ट के मुताबिक एसजे-21 का इस्तेमाल, अंतरिक्ष कबाड़ को हटाने के तरीकों का परीक्षण करने तक ही महदूद रहने की संभावना है.

अंतरिक्ष में मरम्मत का काम

सीएएसआई की रिपोर्ट में बताय गया कि बहुत संभव है कि एसजे-21, चीन के ऑन-ऑरबिट सर्विसिंग, असेम्बली और मैनुफैक्चरिंग (ओएसएएम) यानी ओसाम उपग्रहों में से एक हो. दशकों से कई अंतरिक्ष एजेंसियां ओएसएएम अभियान तैयार करती रही हैं. मिसाल के लिए, इन अभियानों के तहत निर्मित अंतरिक्ष यान मौजूदा उपग्रहों की मरम्मत या उनमें ईंधन भरने के काम आ रहे हो सकते हैं या अंतरिक्ष का कबाड़ हटाने के.

अमेरिकी अंतरिक्ष सर्विलांस नेटवर्क के मुताबिक, 20वीं सदी के 60 के दशक में अंतरिक्ष गतिविधियों की शुरुआत से 6,000 से अधिक अंतरिक्ष अभियानों के जरिए कक्षा में 50,000 उपग्रह भेजे गए हैं. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के अंतरिक्ष मलबे पर केंद्रित विभाग के मुताबिक 30,000 से ज्यादा कृत्रिम उपग्रह हमारी धरती का चक्कर काट रहे हैं, और इनमें से करीब 5,000 ही चालू हालत में हैं.

स्पेस सटल कोलंबिया का कचरा टेक्सस के टाइलर शहर के आकाश में

और ये तो सिर्फ वे उपग्रह हैं जो इतने बड़े हैं कि ट्रैक के जरिए गिनती में आ जाते हैं. अमेरिका, रूस, चीन और भारत- सभी ने अंतरिक्ष में अपने बेकार हो चुके उपग्रहों को उड़ाया है जिससे और ज्यादा बड़ी तादाद में धातुओं और अन्य चीजों के बहुत सारे छोटे छोटे टुकड़े अंतरिक्ष में यहां से वहां बिखरे हुए हैं. ईएसए के आंकड़े दिखाते हैं कि 30 करोड़ से ज्यादा छोटी छोटी चीजें, 30,000 किलोमीटर प्रति घंटे यानी दुनिया की सबसे तेज गोली से करीब पांच गुना ज्यादा की अविश्वसनीय रफ्तार से अंतरिक्ष में तैर रही हैं.

ईएसए ने 1990 में, जियोस्टेश्नरी सर्विसिग व्हीकल (जीएसवी) प्रोग्राम के साथ ओएसएएम परियोजनाओं का परीक्षण शुरू किया था. उसका मकसद था जीईओ में यानी भूस्थैतिक कक्षा में टूटे हुए उपग्रहों को पकड़कर उनकी मरम्मत करना. ओएसएएम अभियान का एक प्रसिद्ध और सफल उदाहरण, हबल अंतरिक्ष दूरबीन की दिसंबर 1993 में हुई मरम्मत का है.

नासा ने और भी बहुत सारे ओएसएएम अभियानों की योजना बनाई है. इसमें ओसाम-1 और ओसाम-2 भी शामिल हैं. ओसाम-2 अंतरिक्ष में ही उपग्रहों के हिस्सों के 3डी प्रिंट करने के लिहाज से डिजाइन किया गया है, उससे उम्मीद है कि किसी रॉकेट के अंदर फिट न हो पाने वाले बड़े हिस्से, एक दिन सीधे अंतरिक्ष में ही तैयार किए जा सकेंगे.

Source: DW

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