Explainer: धीरे-धीरे बैठती जा रही है चीन की अर्थव्यवस्था, अमेरिका बना रहेगा सुपरपावर, भारत अगली शक्ति?

China vs US vs India Economy: लाख कोशिशों के बाद भी चीन की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने का नाम नहीं ले रही है और अमेरिका के साथ जारी व्यापार युद्ध का परिणाम अब चीन महसूस करने लगा है और इसी का नतीजा है, चीन की आक्रामकता है।

दुनिया का ज्यादातर हिस्सा, जब इस वक्त महंगाई का सामना कर रहा है, चीन में उल्टा हो रहा है। चीन में वस्तुओं की कीमत काफी ज्यादा कम हो गई है। जहां दुनियाभर के केन्द्रीय बैंक ब्याज दरों को बढ़ा रहे हैं, चीनी सेन्ट्रल बैंक मौद्रिक नीति में और ढील दे रहा है।

China vs US vs India Economy

चीन के वास्तविक हालात जानिए

भारत जैसे देशों में, जहां शेयर-बाज़ार में उछाल है, शंघाई कंपोजिट सूचकांक 2009 की तुलना में काफी कम है। चीन के बिजली संयंत्रों में औद्योगिक उत्पादन, कोविड संकट से पहले के उत्पादन से काफी कम चल रहा है। चीन का क्रेडिट ग्रोथ भी गिर रहा है और डॉलर के मुकाबले, चीन की करेंसी युआन की वैल्यू में भी लगातार गिरावट आ रही है।

इन तमाम संकेतों ने चीन की अर्थव्यवस्था में दुनियाभर के निवेशकों का विश्वास काफी कर दिया है और अमेरिका के साथ चल रहे ट्रेड वार ने, चीन के बाजार को लेकर अनिश्चितता का माहौल बना दिया है, जिससे चीन में होने वाला निवेश भी काफी गिर गया है।

पिछले वित्तीय वर्ष में चीन का विकास दर 5.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद थी, लेकिन वो 3 प्रतिशत से भी कम रह गई और इस वित्त वर्ष चीन ने आर्थिक विकास का अनुमान फिर से 5 प्रतिशत लगाया हुआ है और पूरी संभावना है, की चीन का विकास दर इस साल भी कम रहेगा। चीनी बाजार को लेकर हर महीने एक नई अनिश्चितता का माहौल बनता है।

चीन में हाउसिंग सेक्टर 20 प्रतिशत और चीनी निर्यात 6 प्रतिशत गिर चुका है। चीन का आयात कम हो चुका है, और चीन की अर्थव्यवस्था, जो बाजार और निर्यात से ऑपरेट होती है, उसके ये दोनों इंजन धीरे धीरे फेल होते जा रहे हैं। जिसका मतलब ये हुआ, कि चीन की मुद्रास्फीति, यानि महंगाई दर 3 प्रतिशत से भी नीचे चली जाएगी। इसका मतलब ये हुआ, कि चीन में सामान काफी ज्यादा मात्रा में हैं, लेकिन उन्हें खरीदने वालों की संख्या काफी कम है।

दूसरी तरफ, चीन में युवाओं (16 से 24 वर्ष) में बेरोजगारी दर बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और 35 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को कंपनियां नौकरी से निकाल रही हैं, लिहाजा लोग सामानों की खरीददारी से बच रहे हैं।

पश्चिम से पंगा लेने का नतीजा

चीन की अर्थव्यवस्था इस वक्त करीब साढ़े 17 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है और विशालकाय अर्थव्यवस्था बनने के बाद चीन ने अमेरिका के साथ साथ पश्चिमी देशों से पंगा लेना शुरू किया है। लेकिन, चीन की जीडीपी पूरी तरह से मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पर निर्भर है।

अभी तक अमेरिका के साथ साथ पश्चिमी देशों से चीन को ऑर्डर आता था और चीन उन सामानों को बनाकर सप्लाई करता था, लेकिन अब जब चीन ने इसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, तो पश्चिम ने चीनी विनिर्माण पर अपनी निर्भरता कम करनी शुरू कर दी है। वहीं, चीन की टेक्नोलॉजी अमेरिका की कॉपी रही है, लिहाजा अब जब अमेरिकी कंपनियों ने चीन से बाहर निकलना शुरू कर दिया है, तो इसका सीधा असर चायनीज टेक्नोलॉजी पर पड़ रहा है। उदाहरण के तौर पर, चीन की चिप इंडस्ट्री बुरी तरह से चरमरा गई है और उसने बदले की कार्रवाई में दुर्लभ धातुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है।

हालांकि, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ तत्काल डी-कपलिंग संभव नहीं है, लेकिन प्रक्रिया तो शुरू हो चुकी है। अब निवेश चीन की तरफ से शिफ्ट होकर दूसरे देशों की तरफ से जा रहा है और भारत को इसका फायदा मिल रहा है।

कुल मिलाकर अमेरिका की बादशाहत बरकरार रहने वाली है, जबकि अमेरिका अपने सुपरपावर का रूतबा बरकरार रखने वाला है। लेकिन, आने वाला वक्त भारत का रहने वाला है, इसमें कोई शक या संदेह नहीं है।

आने वाली शक्ति है भारत?

भारतीय स्टेट बैंक के रिसर्च से पता चलता है, कि साल 2027 तक भारत, जर्मनी को छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी और साल 2029 तक जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

1990 के दशक में चीन की अर्थव्यवस्था, भारत की जीडीपी से थोड़ी ही बड़ी थी, लेकिन आज भारत के मुकाबले चीन की अर्थव्यवस्था करीब 5.5 गुना ज्यादा है। हालांकि, अगर फौरन ये सवाल पूछा जाए, कि क्या चीन को भारत पीछे छोड़ पाएगा, तो ये असंभव लक्ष्य लगता है और कई एक्सपर्ट्स का मानना है, कि कम्युनिस्ट चीन ने जितनी क्रूरता से व्यापारिक मॉडल को लागू किया, वैसा करना भारत के लिए संभव नहीं है।

भारतीय लोकतंत्र, सरकारों को किसी भी रिफॉर्म को चीन की तरह आसानी से लागू करने की इजाजत नहीं देता है, लेकिन भारत में क्षमता का कोई अभाव नहीं है।

मोदी सरकार ने साल 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य है, जब भारत अपनी आजादी के सौ साल पूरे करेगा, लेकिन उस वक्त तक भारत के लिए चीन से आगे निकलना संभव नहीं है। अगर चीन की अर्थव्यवस्था यहीं ठहर जाए और भारत का विकास दर हर साल 7 से 7.5 प्रतिशत हो, तो 2047 तक भारत की जीडीपी 20 ट्रिलियन डॉलर की होगी, लेकिन ये विकास दर 25 सालों तक लगातार जारी रखना असंभव सा जान पड़ता है।

लेकिन, आईएमएफ से लेकर वर्ल्ड बैंक ने भी भारत के विकास दर के 7 प्रतिशत के आसपास रहने की संभावना जताई है। कई एक्सपर्ट्स का कहना है, कि भारत 2047 तक भले ही चीन के पीछे ना छोड़े, लेकिन भारत, अमेरिका और चीन के बाद तीसरी सबसे बड़ी शक्ति जरूर बन जाएगा और चीन, भारत को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानने लगेगा, क्योंकि दोनों एशियाई देश हैं और चीन कभी नहीं चाहेगा, कि भारत उसके बराबर आए।

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