FC-31, J-2O.. चीन के पास होगी दुनिया की सबसे बड़ी वायुसेना, होंगे सबसे ज्यादा लड़ाकू विमान, समझें ताकत
World's Largest Air Force: अमेरिका के एक टॉप रैंक सैन्य अधिकारी ने माना है, कि दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना बनाने के बाद अब चीन दुनिया की सबसे बड़ी एयरफोर्स के निर्माण के करीब पहुंच गया है और अब चीन, दुनिया की सबसे बड़ी वायु सेना के खिताब अपने नाम करने का दावा कर सकता है।
यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड के प्रमुख, नेवी एडमिरल जॉन सी. एक्विलिनो ने अमेरिकी संसद की एक कमेटी में एक हालिया गवाही में इस जानकारी का खुलासा किया है। उनकी टिप्पणी उस वक्त आई है, जब चीन लगातार अपनी सेना को आधुनिक बनाने के लिए अरबों डॉलर खर्च कर रहा है और दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

चीन के पास सबसे विशाल एयरफोर्स!
नेवी एडमिरल जॉन सी. एक्विलिनो ने 21 मार्च को सीनेट सशस्त्र सेवा समिति के सामने दिए गये गवाही में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को लेकर दावा किया है, कि "दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना के बाद अब चीन के पास दुनिया की सबसे विशाल वायुसेना होगी।"
अमेरिकी अधिकारी ने कहा, कि "चीन की इस ताकत के दायरे और पैमाने को कम करके नहीं आका जा सकता है, क्योंकि इससे सभी के लिए एक चुनौती उत्पन्न हो रही है।
जॉन सी. एक्विलिनो की इस टिप्पणी में ज्यादातर देशों के पास कितने लड़ाकू विमान हैं, उनकी क्षमता पर आधारित थी।
चीन के पास कितने फाइटर जेट्स हैं?
चीन की सैन्य शक्ति पर पेंटागन की 2023 की रिपोर्ट में कहा गया है, कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की वायुसेना और नौसेना के पास मिलाकर 3, 150 से ज्यादा लड़ाकू विमान हैं, जिनमें ट्रेनर वेरिएंट, मानव रहित विमान प्रणाली (UAS) शामिल नहीं हैं। इन आंकड़ों से पता चलता है, कि चीन ने कितनी बड़ी सेना का निर्माण कर लिया है।
जबकि, अमेरिकी एयरफोर्स के पास करीब 4 हजार गैर-प्रशिक्षक फाइटर जेट्स हैं। हालांकि, अमेरिकी नौसेना, मरीन कोर और सेना की अलग अलग शाखाओं में कई हजार फाइटर जेट्स हैं। इसकी ठीक ठीक संख्या की जानकारी सार्वजनिक नहीं हैं।
लिहाजा, चीन इस वक्त तो लड़ाकू विमानों की संख्या में अमेरिका को पीछे नहीं छोड़ सकता है, लेकिन एडवांस फाइटर जेट्स, फिफ्थ जेनरेशन फाइटर जेट्स के उत्पादन में वृद्धि कर, पीएएल एयरफोर्स अमेरिका को तगड़ी चुनौती देने के साथ साथ अगले कुछ सालों में पीछे भी छोड़ सकता है।
जबकि, अमेरिकी एयरफोर्स ने अपना दायरा पूरी दुनिया में फैला रखा है और उस दायरे में आने वाली चुनौतियों को पूरा करने और अपने आकार को बनाए रखने के लिए उसे लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
वहीं, अमेरिकी सेना की नई स्ट्रैटजी से ऐसा मालूम होता है, कि उसकी रणनीति लड़ाकू विमानों की संख्या कमके एडवांस मिसाइल डिफेंस सिस्टे में भारी भरकम निवेश करने की है, ताकि दुश्मन की वायुशक्ति क्षमता को ही ध्वस्त कर दिया जाए। इसके अलावा, छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के डिजाइन करने के साथ साथ अमेरिका, पांचवी पीढ़ी के विमानों से अपने बेड़े के पुराने विमानों को रिप्लेस करने की योजना बना रहा है। जिससे इसकी ओवरऑल क्वालिटी और पावर बढ़ जाए।
लेकिन, कई एक्सपर्ट्स इस स्ट्रैटजी पर सवाल उठाते हैं और कहते हैं, कि फाइटर जेट्स की संख्या में कमी आने से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो सकता है, क्योंकि अमेरिका का दायरा काफी विशाल है।
लेकिन, अमेरिका के पास दिक्कत ये है, कि वो आर्थिक दिक्कतों से गुजर रहा है और अमेरिकी संसद ज्यादा डॉलर्स आवंटित करने के मूड में नहीं है। इस बात की भी संभावना काफी कम है, कि अमेरिकी कांग्रेस, छठी पीढ़ी के विमानों के निर्माण के लिए पर्याप्त धनराशि जारी करेगी। क्योंकि, छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की कीमत खरबों डॉलर में होगी। जबकि चीन पानी की तरह पैसे बहा रहा है और उसका मकसद साफ है, कि उसे अगले कुछ दशकों में वैश्विक शक्ति बनना है और जिन क्षेत्रों पर वो दावे करता है, उन्हें अपना हिस्सा बनाना है।
क्वालिटी बनाम क्वांटिटी पर बहस
कई एक्सपर्ट लड़ाकू विमानों या युद्धपोतों की संख्या ज्यादा हो, या वो अच्छी क्वालिटी की हों, इसपर भी बहस करते हैं और अपनी बातों के समर्थन में अलग अलग तर्क देते हैं।
जैसे चीन का दावा है, कि उसकी नौसेना के पास अब 340 से ज्यादा प्रभावशाली युद्धपोत हैं और वो उसकी नेवी अब दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना बन चुकी है। हाल के वर्षों में चीनी नौसेना ने अपने बेड़े में युद्धपोतों, फ्रिगेट्स, विध्वंसक जहाजों, उभयचर आक्रमण जहाजों और एयरक्राफ्ट कैरियर की संख्या में भारी इजाफा किया है।
चीन के पास फिलहाल 3 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं और वो इस संख्या को अगले 2 से 3 सालों में 6 कर लेगा। जबकि, अमेरिका के पास इस वक्त 12 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं और भारत के पास 2 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं।
लेकिन, विशालकाय संख्या होने के बाद भी एक्सपर्ट्स का तर्क है, कि अमेरिकी नौसेना की जो क्षमता है, उसकी तुलना में चीन कहीं नहीं ठहरता है। जबकि, जहाजों और पनडुब्बियों की संख्या के हिसाब से चीन अमेरिका से आगे निकल जाता है। अमेरिका के नौसैनिक बेड़े का टन भार चीन के मुकाबले 2-से-1 के अनुपात में कम है।
इसके पीछे की एक बड़ी वजह अमेरिकी जहाजों का आकार भी है, जो चीनी जहाजों की तुलना में काफी ज्यादा बड़े और विशालकाय क्षमताओं से लैस हैं। इनकी मारक क्षमता भी चीनी जहाजों के मुकाबले काफी ज्यादा है। लिहाजा, युद्ध की परिस्थितियों में अमेरिकी नौसेना के पास जबरदस्त बढ़त हासिल हो जाती है, लेकिन दूसरे देश चीनी नौसेना के आगे उस स्थिति में नहीं आ सकते हैं।
उसी तरह से चीन ने अपने J-20 स्टील्थ फाइटर जेट्स की संख्या में भी जबरदस्त इजाफा किया है। हालांकि, इस फाइटर जेट को लेकर कई रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि चीन भले ही इसे पांचवी पीढ़ी का लड़ाकू विमान बताता है, लेकिन ये भारतीय राफेल के सामने भी नहीं ठहरता है। लेकिन, रिपोर्ट है कि चीन के पास 2022 में 50 J-20 फाइटर जेट्स थे, जो 2023 में 100 हो चुके हैं और इस संख्या को 300 के करीब ले जाने की योजना है।
यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में भारतीय वायु सेना के रिटायर्ड एयर मार्शल अनिल चोपड़ा ने, जे-20 के AESA (एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे) रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट के प्रदर्शन पर संदेह जताया है, जो एवियोनिक्स टेक्नोलॉजी में चीन की कमजोरी को उजागर करता है। चोपड़ा ने भी इस फाइटर जेट के पांचवी पीढ़ी के विमान होने पर शंका जताई है। लेकिन, इसके बावजूद चीन लगातार J-20 फाइटर जेट के प्रोडक्शन को बढ़ा रहा है। जाहिर तौर पर, चीन की सोच कुछ और हो सकती है।

चीन की सोच क्या हो सकती है?
एक्सपर्ट्स इस बात से सहमत हैं, कि चीन की कोशिश अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के साथ साथ अपनी मिसाइल क्षमता से उन्हें बेअसर करने की योजना पर काम कर रहा है, जहां से F-22 और F-35 पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान ऑपरेट किए जाते हैं।
चीन की रणनीति अमेरिका के महत्वपूर्ण हवाई अड्डों को निष्क्रीय बनाकर उसके पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट्स को उड़ने ही नहीं देने पर है, ताकि शक्ति संतुलन उसके पक्ष में आसानी से आ जाए। अगर ताइवान युद्ध होता है, तो अमेरिका अपने पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट्स से चीन की वायुसेना को काबू में करने की कोशिश करेगा और चीन इसी स्थिति से निपटने के लिए काम कर रहा है।
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